चना बोने का सही समय! कम पानी में मिलेगी अच्छी फसल, बस किसान इन बातों का रखें ध्यान

चना बोने का सही समय! कम पानी में मिलेगी अच्छी फसल, बस किसान इन बातों का रखें ध्यान


सतना. विंध्य और बघेलखंड के किसानों के लिए अक्टूबर का महीना चने की खेती की तैयारी का समय है. यहां अक्टूबर के मध्य से नवंबर की शुरुआत तक चने की बुवाई की जा सकती है. खास बात यह है कि चने की फसल को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं पड़ती, इसलिए कम सिंचाई वाले खेतों में भी किसान इसे आसानी से उगा सकते हैं. काली और दोमट मिट्टी चने के लिए अच्छी मानी जाती है. अगर किसान सही समय पर बुवाई, बीज उपचार और सिंचाई का ध्यान रखें, तो कम लागत में अच्छी फसल ली जा सकती है. सतना के किसान अंशुमान सिंह ने लोकल 18 से बातचीत में कहा कि क्षेत्र की मिट्टी और मौसम चने की खेती के लिए काफी अनुकूल हैं और सही तरीके से खेती करने पर यह किसानों के लिए अच्छी आमदनी वाली फसल बन सकती है.

एक्सपर्ट के मुताबिक, विंध्य और बघेलखंड में चने की बुवाई अक्टूबर के मध्य से शुरू कर देना बेहतर रहता है. इसे नवंबर की शुरुआत तक पूरा किया जा सकता है. ज्यादा देर से बुवाई करने पर फसल का विकास प्रभावित हो सकता है, इसलिए किसान मौसम और खेत की नमी को देखते हुए समय पर तैयारी शुरू कर दें. चने के लिए खेत में पानी रुकना ठीक नहीं होता, इसलिए ऐसे खेत का चयन करें, जहां जल निकासी अच्छी हो.

इन किस्मों का कर सकते हैं चुनाव
क्षेत्र के किसान अपनी जमीन और बाजार की जरूरत के हिसाब से जेजी-11, जेजी-14 और काबुली चने की किस्मों का चुनाव कर सकते हैं. काली और दोमट मिट्टी में चने की फसल अच्छी तरह तैयार हो सकती है. काबुली चने की बाजार में अलग मांग रहती है जबकि सामान्य चना दाल और दूसरे खाद्य उत्पादों में इस्तेमाल होता है. बीज का चुनाव करते समय स्वस्थ और अच्छी गुणवत्ता वाले बीज लेना जरूरी है.

बुवाई से पहले खेत और बीज की तैयारी
चने की अच्छी फसल के लिए बुवाई से पहले खेत की दो से तीन बार जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा कर लें. खेत तैयार करते समय अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाई जा सकती है. बीज को बोने से पहले ट्राइकोडर्मा या राइजोबियम कल्चर से उपचारित करने की सलाह दी जाती है. इससे पौधों की जड़ें मजबूत बनाने और उकटा रोग से बचाव में मदद मिलती है. बुवाई के दौरान कतार से कतार की दूरी करीब 30 से 35 सेंटीमीटर रखें.

कम पानी में भी तैयार हो जाती है फसल
चने की खेती की खासियत इसकी कम पानी की जरूरत है. आमतौर पर बुवाई के करीब 30 से 35 दिन बाद जब पौधों में शाखाएं निकलने लगें, तब पहली सिंचाई की जा सकती है. इसके बाद दाना बनने के समय जरूरत के हिसाब से दूसरी सिंचाई करें. फूल आने के समय सिंचाई करने से बचना चाहिए क्योंकि इससे फूल गिरने का खतरा बढ़ सकता है और उत्पादन पर असर पड़ सकता है. खेत में पानी जमा होने की स्थिति भी नहीं बनने दें.

शाखाएं बढ़ाने के लिए ये काम करें
बुवाई के करीब 40 से 45 दिन बाद पौधों की ऊपरी फुंगी या खूंटी तोड़ देना चाहिए. इससे पौधे में ज्यादा शाखाएं निकल सकती हैं और फलियों की संख्या बढ़ने में मदद मिलती है. हालांकि यह काम फसल की स्थिति देखकर ही करना चाहिए. साथ ही किसान खेत की नियमित निगरानी करते रहें ताकि किसी बीमारी या कीट का प्रकोप समय रहते पहचाना जा सके. चना फसल में फली छेदक इल्ली किसानों के लिए परेशानी बन सकती है. इससे बचाव के लिए खेत में टी आकार की खूंटियां लगाई जा सकती हैं. इन पर बैठने वाले पक्षी खेत में मौजूद इल्लियों को खा लेते हैं. इसके अलावा प्रकोप दिखाई देने पर नीम के तेल या उचित कीटनाशक का इस्तेमाल किया जा सकता है.

110 से 120 दिन में तैयार होगी फसल
सामान्य तौर पर चने की फसल करीब 110 से 120 दिन में तैयार हो जाती है. जब पौधों की पत्तियां पीली पड़कर झड़ने लगें और फलियां सूख जाएं, तब फसल की कटाई की जा सकती है. इसके बाद मड़ाई करके चने को अच्छी तरह सुखाकर सुरक्षित रखा जाता है. भंडारण से पहले दानों में नमी नहीं रहनी चाहिए ताकि लंबे समय तक फसल सुरक्षित रहे.

दाल और बेसन के लिए बनी रहती है मांग
बाजार में चने की दाल के साथ-साथ बेसन बनाने के लिए भी मांग रहती है. यही वजह है कि किसान इसे अपनी रबी फसल में शामिल कर सकते हैं. चना दलहनी फसल होने के कारण जमीन के लिए भी फायदेमंद माना जाता है. इसकी जड़ें मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाने में मदद करती हैं, जिससे आगे वाली फसल के लिए जमीन की उर्वरता बेहतर हो सकती है. किसानों को बस समय पर बुवाई, सही सिंचाई, जल निकासी और कीट नियंत्रण का ध्यान रखना चाहिए.



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