अमीर से 80 रुपये और गरीब से स‍िर्फ 1 पैसा, महात्‍मा गांधी का चंदा जुटाने वाला यून‍िक मॉडल

अमीर से 80 रुपये और गरीब से स‍िर्फ 1 पैसा, महात्‍मा गांधी का चंदा जुटाने वाला यून‍िक मॉडल


महात्मा गांधी के बारे में आपने आंदोलन, सत्याग्रह और आजादी की लड़ाई से जुड़ी बहुत सी कहानियां सुनी होंगी. लेकिन गांधी का एक रूप ऐसा भी था, जिसके बारे में कम बात होती है. वह था उनका फंड जुटाने का तरीका. गांधीजी जरूरत पड़ने पर अमीर से बड़ी रकम मांगने में भी हिचकते नहीं थे और गरीब के एक पैसे को भी उतनी ही अहमियत देते थे. उनकी सोच साफ थी क‍ि देश के काम में हर व्यक्ति की हिस्सेदारी होनी चाहिए. महात्‍मा गांधी पर ल‍िखी क‍िताब Everyone’s Gandhi में इस क‍िस्‍से का ज‍िक्र है.गांधी जयंती के मौके पर प्रकाश‍ित हो रही खबरों की आख‍िरी कड़ी में आज पढ़‍िए महात्‍मा गांधी का अनोखा चंदा जुटाने का मॉडल…

किस्सा दक्षिण अफ्रीका का है. उस समय गांधी एक संस्था के लिए चंदा जुटाने की जिम्मेदारी संभाल रहे थे. वह एक अमीर व्यक्ति के पास पहुंचे और उनसे 80 रुपये देने को कहा. सामने वाले व्यक्ति ने 80 रुपये देने के बजाय सिर्फ 40 रुपये देने की कोशिश की. गांधी ने इसे स्वीकार नहीं किया. उन्होंने बातचीत और समझाने की कोशिश जारी रखी, लेकिन बात नहीं बनी.

पूरी रात उसके घर के बाहर बैठे रहे

कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. गांधी वहां से लौटे भी नहीं. वह पूरी रात वहीं बैठे रहे. वह थके हुए थे, भूखे भी थे, लेकिन अपने लक्ष्य से पीछे हटने को तैयार नहीं थे. आखिरकार सुबह उस व्यक्ति ने पूरे 80 रुपये दे दिए. यानी गांधी जितनी रकम लेने पहुंचे थे, उतनी लेकर ही वहां से उठे. लेकिन गांधी का फंडरेजिंग मॉडल सिर्फ अमीर लोगों से बड़ी रकम लेने तक सीमित नहीं था. उनकी असली खासियत यह थी कि वह छोटे से छोटे योगदान को भी अभियान का हिस्सा बना देते थे.

यात्राओं के दौरान जब गांधी किसी स्टेशन पर पहुंचते, तो उन्हें देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जमा हो जाते. लोग उनके दर्शन के लिए आते और कई लोग अपनी तरफ से कुछ पैसे भी देना चाहते थे. गांधी इस मौके को सिर्फ भीड़ या लोकप्रियता के तौर पर नहीं देखते थे. वह अपनी खिड़की से हाथ बाहर निकालकर लोगों से योगदान स्वीकार करते थे.

इनमें कई बार तांबे के छोटे सिक्के होते थे. कोई एक पैसा देता, तो कोई कुछ और. एक बुजुर्ग महिला भीड़ को पार करके गांधी तक पहुंचती, उनकी हथेली में एक छोटा सिक्का रखती और वापस चली जाती. गांधी इन छोटे योगदानों को भी स्वीकार करते थे. यहां तक कि उन्हें अलग-अलग भाषाओं में पैसा या पाइस कहने का शब्द भी पता था, ताकि वह जहां जाएं, लोगों से सीधे योगदान मांग सकें.

आंदोलन स‍िर्फ अमीर लोगों का नहीं

यह सिर्फ पैसा इकट्ठा करने की तकनीक नहीं थी. इसके पीछे एक बड़ा विचार था. गांधी के लिए आंदोलन सिर्फ बड़े उद्योगपतियों, व्यापारियों या अमीर लोगों का नहीं था. अगर कोई गरीब व्यक्ति अपनी बचत में से एक पैसा दे रहा है, तो वह भी देश के काम में उतना ही भागीदार है.

ओडिशा के एक गांव का किस्सा भी काफी मशहूर है. वहां बेहद गरीब आदिवासी गांधी से मिलने के लिए दूर-दूर से आए. उनके पास देने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था. कोई एक-दो पैसे लाया था, तो कोई एक-दो आने. गांधी करीब तीन घंटे तक बैठकर हर व्यक्ति का योगदान खुद लेते रहे. उन्होंने कहा कि उनके लिए हर पैसा सोने के बराबर है, क्योंकि इन लोगों ने उसे बड़ी मेहनत और बचत से जमा किया था.

यानी गांधी के फंडरेजिंग मॉडल में दो अलग-अलग तरीके साथ-साथ चलते थे. अमीर से बड़ी रकम मांगो और गरीब को छोटे योगदान से जोड़ो. उनके लिए रकम की मात्रा से ज्यादा महत्वपूर्ण यह था कि देने वाला व्यक्ति खुद को अभियान से जुड़ा हुआ महसूस करे.



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