MP का वो शहर, जहां दो बार पहुंचे थे बापू, घंटाघर चौक से जुड़ा है गांधीजी का इतिहास

MP का वो शहर, जहां दो बार पहुंचे थे बापू, घंटाघर चौक से जुड़ा है गांधीजी का इतिहास


Mahatma Gandhi Khandwa Visit 1921-1933: मध्य प्रदेश का खंडवा भले ही आज एक छोटा शहर नजर आता हो, लेकिन देश की आजादी की लड़ाई से इसका गहरा जुड़ाव रहा है. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान खंडवा में भी लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई थी. इसी इतिहास से जुड़ी एक खास बात यह है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी खंडवा में दो बार आए थे. स्थानीय इतिहास से जुड़े लोगों के अनुसार गांधीजी का पहला दौरा 1921 में और दूसरा दौरा 1933 में हुआ था. उस दौर में गांधीजी को देखने और सुनने के लिए सिर्फ शहर के लोग ही नहीं, बल्कि आसपास के गांवों और दूर-दराज के इलाकों से भी लोग खंडवा पहुंचते थे. कई लोग बैलगाड़ियों में सवार होकर गांधीजी की सभा में पहुंचते थे. बताया जाता है कि गांधीजी की एक झलक पाने और उनके विचार सुनने के लिए रास्तों पर लोगों की भीड़ दिखाई देती थी.

घंटाघर चौक को कभी कहा जाता था गांधी चौक
खंडवा के हृदय स्थल घंटाघर चौक का संबंध भी गांधीजी के खंडवा आगमन से जोड़ा जाता है. स्थानीय लोगों के अनुसार, एक समय इस जगह को गांधी चौक कहा जाता था. यहीं गांधीजी ने लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ने और देश के लिए काम करने का संदेश दिया था. बाद में इस स्थान का नाम बदलकर घंटाघर चौक हो गया. आज भी इस क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन की यादों से जुड़े स्मारक मौजूद हैं. यहां बना मिट्टी संग्रहण स्मारक उस दौर की यादों को संजोए हुए है. स्थानीय लोगों का कहना है कि यह स्थान खंडवा के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है.

बैलगाड़ियों से संदेश पहुंचाते थे स्वतंत्रता सेनानी
Local18 से बातचीत में इतिहास और स्थानीय विरासत से जुड़े लव जोशी बताते हैं कि खंडवा ने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उनके अनुसार, गांधीजी के मार्गदर्शन और उनके खंडवा आगमन से यहां के लोगों में आजादी की लड़ाई को लेकर नई ऊर्जा आई.उस दौर में संचार के साधन आज जैसे नहीं थे. स्थानीय इतिहास से जुड़े लोगों के अनुसार, स्वतंत्रता सेनानी कई बार रात के समय एक-दूसरे तक संदेश पहुंचाने के लिए बैलगाड़ियों का इस्तेमाल करते थे. यह काम भी काफी सावधानी से किया जाता था, ताकि अंग्रेजी हुकूमत को इसकी जानकारी न हो.

गांधीजी को सुनने उमड़ पड़ा था खंडवा
बताया जाता है कि जब गांधीजी खंडवा पहुंचे तो उनकी सभा को सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटे थे. आसपास के गांवों से लोग बैलगाड़ियों और पैदल खंडवा पहुंचे थे. शहर में जगह-जगह लोगों की भीड़ नजर आ रही थी. उस समय खंडवा आज की तरह बड़ा शहर नहीं था. ऐसे में गांधीजी का यहां आना और हजारों लोगों का उन्हें सुनने के लिए पहुंचना अपने आप में बड़ी घटना मानी जाती थी. लोगों में गांधीजी को देखने और उनके विचार सुनने को लेकर खास उत्साह था.

माखनलाल चतुर्वेदी समेत कई सेनानी जुड़े थे
गांधीजी के खंडवा आगमन के दौरान स्थानीय स्वतंत्रता सेनानियों और नेताओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही. स्थानीय जानकारी के अनुसार राष्ट्रकवि पंडित माखनलाल चतुर्वेदी, पंडित भगवंतराव मंडलोई, रायचंद्र नागड़ा सहित निमाड़ और मालवा क्षेत्र के कई स्वतंत्रता सेनानी इस आंदोलन से जुड़े हुए थे. इन लोगों ने अपने-अपने स्तर पर लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने और देश की आजादी के लिए जागरूक करने का काम किया. गांधीजी के खंडवा आने से इस अभियान को और मजबूती मिलने की बात स्थानीय इतिहासकार और जानकार बताते हैं.

आज भी इतिहास की गवाही देता है यह स्थान
आज घंटाघर क्षेत्र में आने वाले बहुत से लोगों के लिए यह सामान्य शहर का हिस्सा है, लेकिन इसके पीछे आजादी के आंदोलन की एक लंबी कहानी जुड़ी हुई है. मिट्टी संग्रहण स्मारक और इस क्षेत्र से जुड़ी गांधीजी के आगमन की यादें खंडवा के इतिहास का हिस्सा हैं. लव जोशी का कहना है कि 2 अक्टूबर, 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर लोगों को ऐसे ऐतिहासिक स्थानों पर पहुंचकर स्वतंत्रता सेनानियों को याद करना चाहिए. उनका कहना है कि जिस स्थान से आजादी के आंदोलन की अलख जगाने का इतिहास जुड़ा है, उसे धरोहर के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए. वे इस स्थान के सामने लगी डीपी हटाकर स्मारक और ऐतिहासिक स्थल को स्पष्ट रूप से दिखाई देने की बात भी कहते हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियां खंडवा के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े इस इतिहास को जान सकें.

खंडवा के घंटाघर की पहचान आज भले बदल गई हो, लेकिन यहां से जुड़ी गांधीजी के आगमन और स्वतंत्रता आंदोलन की यादें आज भी शहर के इतिहास का अहम हिस्सा हैं. बैलगाड़ियों से दूर-दूर से लोगों का गांधीजी को सुनने पहुंचना उस दौर की तस्वीर सामने रखता है, जब आजादी सिर्फ एक सपना नहीं, बल्कि हर भारतीय के संघर्ष का हिस्सा बन चुकी थी.



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