सरगुजा में तीन दिन की बारिश-आंधी ने मक्के की फसल की चौपट, किसान को 50 हजार से ज्यादा का नुकसान

सरगुजा में तीन दिन की बारिश-आंधी ने मक्के की फसल की चौपट, किसान को 50 हजार से ज्यादा का नुकसान


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आंधी-बारिश से बर्बाद हुई मक्के की फसल, सरगुजा के किसान पर आर्थिक संकट

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Surguja: सरगुजा में तीन-चार दिन की भारी बारिश और तूफान से मक्के की फसल बर्बाद हो गई. किसान सुरेंद्र टोप्पो को तीन एकड़ की खेती में 50 हजार रुपये से अधिक का नुकसान हुआ.

Agri: छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में लगातार तीन से चार दिनों तक हुई भारी बारिश और तेज तूफान के कारण किसानों को भारी नुकसान हुआ है. कुदरत के इस कहर से मक्के की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई है, जिससे किसानों की मेहनत और लागत एक झटके में खत्म हो गई.

किसान सुरेंद्र टोप्पो की फसल बर्बाद
किसान सुरेंद्र टोप्पो ने बताया कि उन्होंने 50 हजार रुपये से अधिक खर्च कर तीन एकड़ में मक्के की खेती की थी. फसल लगभग तैयार हो चुकी थी और भुट्टों में दूध भर चुका था, लेकिन तेज हवाओं और बारिश के कारण मक्के के पेड़ से फल गिर गए. इससे उनकी सारी मेहनत बर्बाद हो गई और अब उन्हें अगली फसल के लिए भी आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ेगा.

15 जून के आसपास की थी बुआई
सुरेंद्र टोप्पो ने लोकल 18 को बताया कि उन्होंने लगभग 15 जून के आसपास तीन एकड़ जमीन में मक्के की बुआई की थी. शुरुआत में मौसम अनुकूल था और फसल की स्थिति भी अच्छी थी. धीरे-धीरे मक्के के पौधों में फल आने लगे और फसल पकने की स्थिति में पहुंच गई थी.

भुट्टों में भर चुका था दूध
सुरेंद्र टोप्पो के अनुसार, मक्के के पौधों में भुट्टे पूरी तरह विकसित हो चुके थे और उनमें दूध भी भर गया था. इसी दौरान तीन से चार दिनों तक दिन-रात बारिश के साथ तेज तूफान आया. तेज हवाओं के कारण मक्के के पौधे खेत में गिर गए और कई भुट्टे पौधों से टूटकर नीचे गिर गए.

50 हजार से ज्यादा की लागत
किसान ने बताया कि तीन एकड़ मक्के की खेती में उनकी 50 हजार रुपये से अधिक की लागत लगी थी. फसल तैयार होने के करीब थी, जिससे उन्हें अच्छी पैदावार और आमदनी की उम्मीद थी. लेकिन प्राकृतिक आपदा के बाद खेत में मक्के की फसल बर्बाद हो गई, जिससे किसान को बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है.

जैविक और रासायनिक खाद का उपयोग
सुरेंद्र टोप्पो ने बताया कि उन्होंने मक्के की खेती की शुरुआत जैविक तरीके से की थी और खेत में गोबर की खाद का इस्तेमाल किया. फसल की जरूरत के अनुसार बाद में रासायनिक खाद का भी समय-समय पर इस्तेमाल किया गया. मेहनत और खर्च के बाद जब फसल तैयार हुई, तभी मौसम ने किसान की उम्मीदों पर पानी फेर दिया.



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