दोस्त ने खरीदी नई कार, गांधीजी ने बैठने से किया इनकार, बोले- इतना पैसा खर्च करना बेवकूफी है?

दोस्त ने खरीदी नई कार, गांधीजी ने बैठने से किया इनकार, बोले- इतना पैसा खर्च करना बेवकूफी है?


महात्मा गांधी का नाम आते ही सादगी, कम खर्च और जरूरत भर की चीजों का ख्याल आता है. लेकिन गांधीजी खुद ऐसा करते थे, ऐसा भी नहीं था. उनके करीबी दोस्तों को भी वह इसी तरह सादा जीवन जीने के ल‍िए कहते थे. ऐसा ही एक क‍िस्‍सा 1908 का है. उस समय गांधीजी दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह आंदोलन के कारण जेल में थे. जेल से बाहर आने के बाद उनके एक अमीर दोस्त ने खुशी में उनके लिए एक नई कार खरीदी. लेकिन गांधीजी ने उस कार में बैठने से ही मना कर दिया.

यह क‍िस्‍सा गांधीजी के करीबी दोस्त हरमन कैलनबाख से जुड़ी है. कैलनबाख जर्मन मूल के इंजीनियर-आर्किटेक्ट थे और अपने काम से अच्छी कमाई करते थे. वह गांधीजी के विचारों से प्रभावित थे और दक्षिण अफ्रीका में उनके साथ काम भी करते थे. साल 1908 में गांधीजी सत्याग्रह से जुड़े मामले में जेल की सजा पूरी करके बाहर आए. दोस्त को जब पता चला कि गांधीजी जेल से रिहा होने वाले हैं तो वह उन्हें लेने पहुंच गया. लेकिन वह अकेला नहीं आया था. उसने गांधीजी को घर ले जाने के लिए एक नई कार भी खरीद ली थी. कैलनबाख के लिए यह खुशी का मौका था. दोस्त जेल से बाहर आया था, इसलिए उसने सोचा कि उसे कार में बैठाकर घर ले जाएगा. लेकिन गांधीजी ने कार देखी तो उसमें बैठने से साफ इनकार कर दिया.

गांधीजी ने कहा- इसे वापस करो

गांधीजी को यह बात पसंद नहीं आई कि सिर्फ उन्हें घर ले जाने के लिए इतनी महंगी कार खरीदी गई. उन्होंने अपने दोस्त से कहा कि जब समाज में इतने लोग परेशान हैं और जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तब ऐसी चीज पर इतना पैसा खर्च करना सही नहीं है.

‘Everyone’s Gandhi’ में इस घटना को गांधीजी की सादगी और जरूरत के हिसाब से खर्च करने की सोच के उदाहरण के तौर पर बताया गया है. किताब के मुताबिक गांधीजी ने कैलनबाख से कार बेचने वाले को वापस करने के लिए कहा. उनका सवाल सीधा था- अगर कोई चीज जरूरी नहीं है तो सिर्फ दिखावे या सुविधा के लिए उस पर इतना पैसा क्यों खर्च किया जाए? हालांक‍ि इसका मतलब यह नहीं है कि गांधीजी हर तरह की कार या हर महंगी चीज के खिलाफ थे. वे गैरजरूरी चीजों से दूरी बनाकर रखना चाहते थे.

एक महंगी दूरबीन की कहानी भी जुड़ी

कैलनबाख के साथ गांधीजी की ऐसी ही एक और घटना हुई. एक बार दोनों इंग्लैंड से दक्षिण अफ्रीका लौट रहे थे. कैलनबाख के पास बहुत अच्छी और महंगी दूरबीन थी. दूरबीन देखने में अच्छी थी और महंगी भी थी. लेकिन गांधीजी ने उनसे सवाल किया कि क्या यह चीज उनके लिए वास्तव में जरूरी है?

दोनों के बीच इस बात पर चर्चा हुई कि सादा जीवन जीने के लिए इंसान को आखिर कितनी चीजों की जरूरत होती है. अगर कोई सामान जीवन के लिए जरूरी नहीं है तो क्या उसे अपने पास रखना चाहिए?

गांधीजी की बातों से कैलनबाख प्रभावित हुए. आखिरकार उन्होंने वह महंगी दूरबीन समुद्र में फेंक दी. कहानी के मुताबिक बाद में उन्हें इसका अफसोस नहीं हुआ, बल्कि उन्हें हल्का महसूस हुआ.

गांधीजी की सोच में ‘जरूरत’ सबसे ऊपर थी

कार और दूरबीन की ये दोनों घटनाएं एक ही बात की तरफ इशारा करती हैं. गांधीजी के लिए सवाल यह नहीं था कि किसी चीज की कीमत कितनी है. सवाल यह था कि क्या वह चीज सच में जरूरी है?

अगर कोई सामान सिर्फ शौक, दिखावे या अतिरिक्त सुविधा के लिए है और उसके बिना काम चल सकता है, तो गांधीजी उसे छोड़ने के पक्ष में दिखाई देते हैं. उनके करीबी दोस्त कैलनबाख के साथ हुई इन घटनाओं में यही सोच दिखाई देती है.

यही वजह है कि यह छोटी-सी कहानी आज के समय में भी दिलचस्प लगती है. आज लोग कार, मोबाइल, कपड़े, गैजेट, महंगे होटल और दूसरी लग्जरी चीजों पर खूब पैसा खर्च करते हैं. ऐसे में गांधीजी और कैलनबाख की यह कहानी एक अलग सवाल खड़ा करती है- क्या हर महंगी चीज जरूरी भी होती है?

आज के खर्च से कैसे जुड़ती है यह कहानी?

सीख ये है क‍ि कमाई चाहे कम हो या ज्यादा, खर्च करने से पहले यह देखना जरूरी है कि वह खर्च जरूरत है या सिर्फ इच्छा. मान लीजिए किसी परिवार के पास सीमित आमदनी है. अगर वह जरूरी खर्चों के बाद बची रकम को किसी ऐसी चीज पर लगा देता है जिसकी उसे खास जरूरत नहीं है, तो भविष्य के लिए बचत कम हो सकती है. दूसरी तरफ, अगर कोई व्यक्ति अपनी आमदनी के हिसाब से महंगी कार खरीदता है, उसकी ईएमआई आसानी से चुका सकता है और बाकी जरूरी खर्च व बचत भी प्रभावित नहीं होते, तो मामला अलग है.



Source link