एशियन गेम्स 2026: पिता करते हैं मजदूरी, बेटी संजू देवी ने कबड्डी में जीता गोल्ड, गर्व से चौड़ा हुआ छत्तीसगढ़

एशियन गेम्स 2026: पिता करते हैं मजदूरी, बेटी संजू देवी ने कबड्डी में जीता गोल्ड, गर्व से चौड़ा हुआ छत्तीसगढ़


Kabaddi Player Sanju Devi: छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के छोटे से गांव केराकछार से निकलकर अंतरराष्ट्रीय कबड्डी के मैदान तक पहुंचने वाली संजू देवी ने अपने संघर्ष और शानदार खेल के दम पर प्रदेश का नाम रोशन किया है. जापान में आयोजित एशियन गेम्स में भारतीय महिला कबड्डी टीम का हिस्सा बनकर संजू देवी ने स्वर्ण पदक अपने नाम किया. कभी परिवार की आर्थिक स्थिति के कारण पढ़ाई और खेल में से एक चुनने की चुनौती के बीच खड़ी रहीं संजू ने खेल को अपना जुनून बनाया और लगातार मेहनत करती रहीं. शुरुआती दिनों में पिता के साथ खेतों में काम करने से लेकर चोट और सर्जरी के बाद दोबारा मैदान पर वापसी तक का उनका सफर संघर्ष से भरा रहा है. आज वही संजू देवी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के लिए गोल्ड जीत चुकी हैं और युवा खिलाड़ियों को भी कभी हार न मानने की सीख दे रही हैं.

बचपन से आसपास देखा कबड्डी का खेल, यहीं से बढ़ी रुचि
संजू देवी ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि कबड्डी से उनका जुड़ाव बचपन से ही रहा है. उनके गांव और आसपास के इलाकों में छोटे-बड़े सभी लोग कबड्डी खेलते थे और उन्हें देखकर उनके मन में भी इस खेल के प्रति रुचि पैदा हुई. हालांकि शुरुआत में उन्होंने कबड्डी को गंभीरता से नहीं लिया था. 12वीं के बाद उन्होंने खेल को लेकर गंभीरता से तैयारी शुरू की और पढ़ाई के साथ कबड्डी जारी रखी.

परिवार की आर्थिक स्थिति बनी चुनौती, फिर भी नहीं छोड़ा खेल
संजू ने बताया कि उस समय परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि पढ़ाई और खेल दोनों के खर्च को आसानी से संभाला जा सके. ऐसे में उनके सामने एक रास्ता चुनने की चुनौती थी. इसके बावजूद उन्होंने धीरे-धीरे पढ़ाई के साथ अपना खेल जारी रखा. परिवार ने आर्थिक रूप से सीमित संसाधनों के बावजूद उन्हें बाहर जाकर खेलने और आगे बढ़ने के लिए पूरा सहयोग दिया.

जिला कबड्डी संघ से शुरू हुई ट्रेनिंग, बहतरा स्टेडियम में मिला बेहतर माहौल
संजू देवी ने बताया कि उन्होंने जिला कबड्डी संघ कोरबा में जाकर अपनी बेसिक ट्रेनिंग शुरू की. वहां उनके स्किल और खेल की बारीकियों पर काम किया गया. इसके बाद वह बहतरा स्टेडियम पहुंचीं, जहां उन्हें बेहतर डाइट, फिजियो और खेल से जुड़ी जरूरी सुविधाएं मिलीं. संजू के मुताबिक इन सुविधाओं और लगातार प्रशिक्षण ने उनके खेल को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई.

पिता करते हैं मेहनत-मजदूरी, मां हैं हाउसवाइफ
संजू देवी का परिवार बेहद साधारण पृष्ठभूमि से आता है. उन्होंने बताया कि उनकी मां हाउसवाइफ हैं, जबकि उनके पिता पेंटिंग और ठेकेदारी से जुड़े काम करते हैं. परिवार के पास छोटी सी खेती भी है. सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद माता-पिता ने संजू को खेल में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया.

चोट के बाद सर्जरी, रिकवरी कर फिर मैदान में उतरीं संजू
संजू देवी के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने का सफर आसान नहीं रहा. उन्होंने बताया कि पिछले टूर्नामेंट के दौरान उन्हें चोट लगी थी और उनकी सर्जरी हुई. सर्जरी के बाद उन्होंने रिकवरी पर ध्यान दिया, फिजियो और डाइट के साथ अपनी फिटनेस पर काम किया और दोबारा मैदान पर वापसी की. इसके बाद उन्होंने एशियन गेम्स में भारतीय महिला कबड्डी टीम के साथ गोल्ड मेडल जीता.

भारतीय टीम के कैंप में कोच से लेकर न्यूट्रिशन तक मिला पूरा सहयोग
संजू ने बताया कि भारतीय टीम के कैंप में खिलाड़ियों की ट्रेनिंग से लेकर डाइट, न्यूट्रिशन, फिजियो और कोचिंग तक हर पहलू पर ध्यान दिया गया. कोचों ने खिलाड़ियों के स्किल और खेल की कमियों पर लगातार काम किया. इसी तैयारी का फायदा उन्हें एशियन गेम्स में मिला और भारतीय टीम स्वर्ण पदक जीतने में सफल रही.

युवा खिलाड़ियों को संजू की सीख- मेहनत कभी बेकार नहीं जाती
संजू देवी ने युवा खिलाड़ियों को संदेश देते हुए कहा कि खेल में चोट और मुश्किलें आना इसका हिस्सा है. चोट लगने पर घबराने के बजाय अच्छी तरह रिकवरी करनी चाहिए, डाइट और फिजियो पर ध्यान देना चाहिए और लगातार अपनी स्किल को बेहतर करने की कोशिश करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि कई बार खिलाड़ियों के मन में सवाल आता है कि इतनी मेहनत का क्या होगा, लेकिन मेहनत कभी बेकार नहीं जाती. उसका परिणाम किसी न किसी रूप में जरूर मिलता है.

विश्व कप में भी शानदार प्रदर्शन, अब एशियन गोल्ड से बढ़ाया देश का मान
संजू देवी इससे पहले महिला कबड्डी विश्व कप में भी भारतीय टीम का हिस्सा रह चुकी हैं और शानदार प्रदर्शन कर चुकी हैं. अब एशियन गेम्स में भारतीय महिला कबड्डी टीम के साथ स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने अपनी उपलब्धियों में एक और बड़ा अध्याय जोड़ दिया है. कोरबा के छोटे से गांव से शुरू हुआ उनका सफर आज अंतरराष्ट्रीय कबड्डी के मंच तक पहुंच चुका है. Sanju Devi की कहानी संघर्ष, परिवार के सहयोग और लगातार मेहनत की मिसाल बनकर सामने आई है.



Source link