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alok ranjan akhilesh yadav rajya sabha election: उत्तर प्रदेश की 10 सीटों पर 16 अक्टूबर 2026 को होने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए सियासी पारा चढ़ गया है. बीजेपी और सपा अपने-अपने समीकरण को साध रहे हैं. सपा ने पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन पर एक बार फिर भरोसा जताया है. साल 1978 बैच के इस रिटायर्ड आईएएस अधिकारी को दिल्ली की बड़ी पंचायत में भेजने के लिए सपा मुखिया अखिलेश ने एक बार फिर पूरा भरोसा जताया है. रंजन 2024 में भी सपा के उम्मीदवार थे. इस बार उनका नाम रामगोपाल यादव के साथ तय माने जा रहे दो चेहरों में है. जानें इसके पीछे की कहानी.
आलोक रंजन को राज्यसभा भेजने पर सपा क्यों अड़ी? IAS अफसर से अखिलेश के भरोसेमंद रणनीतिकार तक जानिए पूरी कहानी(फाइल फोटो).
अखिलेश सरकार में निभाई अहम भूमिका
आलोक रंजन 31 मई 2014 को उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव बनाए गए थे. उन्होंने जावेद उस्मानी की जगह ली थी. वह 1978 बैच के IAS अधिकारी हैं. 31 मार्च को रिटायर होने के बाद उन्हें केंद्र सरकार की मंजूरी से तीन महीने का सेवा विस्तार मिला था. 30 जून को यह अवधि खत्म हुई तो उन्हें मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का मुख्य सलाहकार बनाया गया. उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी दिया गया. उनकी जिम्मेदारी केवल मुख्यमंत्री को सलाह देने तक सीमित नहीं थी. वह सरकार की कई प्राथमिक परियोजनाओं की निगरानी भी करते रहे.
बड़े प्रोजेक्ट की निगरानी करते रहे रंजन
आलोक रंजन के पास अखिलेश सरकार की कई महत्वाकांक्षी परियोजनाओं की निगरानी थी. इनमें लखनऊ-आगरा ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे, समाजवादी पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, लखनऊ IT सिटी और गोमती रिवरफ्रंट जैसे प्रोजेक्ट शामिल थे. इसके अलावा इटावा की लायन सफारी, कन्नौज का परफ्यूम पार्क, लखनऊ मेट्रो, आगरा का मुगल म्यूजियम और आगरा-इटावा साइकिल हाईवे भी उनकी निगरानी वाली प्राथमिक परियोजनाओं में शामिल थे. रंजन ने उस समय कहा था कि वह मुख्यमंत्री को नीतिगत मामलों में सलाह देने के साथ विकास योजनाओं और उनके क्रियान्वयन की निगरानी करते रहेंगे.
UPSC में चौथी रैंक, IIM से MBA
आलोक रंजन की पढ़ाई लिखाई की बात करें तो उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से अर्थशास्त्र में BA ऑनर्स किया है. इसके बाद IIM अहमदाबाद से MBA किया. साल 1978 में UPSC की सिविल सेवा परीक्षा में उन्होंने ऑल इंडिया चौथी रैंक हासिल की. इसके बाद वह IAS बने. प्रशासनिक सेवा में रहते हुए छह जिलों में जिलाधिकारी भी रहे. अपने प्रशासनिक अनुभव और जिला प्रशासन की चुनौतियों पर उन्होंने ‘जिलाधिकारी’ नाम की किताब भी लिखी.
अखिलेश के साथ पुराना प्रशासनिक रिश्ता
आलोक रंजन का अखिलेश यादव के साथ रिश्ता केवल राजनीतिक नहीं है. वह अखिलेश के मुख्यमंत्री रहने के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव थे. रिटायरमेंट के बाद उन्हें मुख्यमंत्री का मुख्य सलाहकार बनाया जाना भी इसी दौर में हुआ. बाद के सालों में भी रंजन का नाम अखिलेश यादव के साथ जुड़ा रहा. 2024 के राज्यसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया था. हालांकि वह चुनाव जीत नहीं सके. अब 2026 में पार्टी ने एक बार फिर उनके नाम पर भरोसा जताया है.
राज्यसभा के लिए फिर क्यों नाम?
सपा के लिए आलोक रंजन का सबसे बड़ा अनुभव प्रशासन और नीतिगत मामलों का है. लंबे समय तक IAS अधिकारी रहने के कारण उन्हें सरकारी व्यवस्था और विकास परियोजनाओं का सीधा अनुभव रहा है. अखिलेश सरकार में मुख्य सचिव और मुख्य सलाहकार की भूमिका ने उनके राजनीतिक संपर्क को भी मजबूत किया. यही वजह है कि राज्यसभा चुनाव में उनका नाम सामने आते ही चर्चा तेज हो गई. उच्च सदन में सरकार की नीतियों, प्रशासन और विकास से जुड़े मुद्दों पर बहस के लिए उनका प्रशासनिक अनुभव सपा के काम आ सकता है.
2024 में नहीं पहुंच पाए थे राज्यसभा
आलोक रंजन के लिए राज्यसभा की कोशिश नई नहीं है. फरवरी 2024 के चुनाव में सपा ने उन्हें तीसरे उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतारा था. उस चुनाव में सपा के कुछ विधायकों की क्रॉस वोटिंग हुई थी और रंजन चुनाव नहीं जीत पाए. अब 2026 में पार्टी ने उन्हें फिर उम्मीदवार बनाने का फैसला किया है. उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए 16 अक्टूबर को मतदान होना है. ऐसे में आलोक रंजन का नाम सपा की रणनीति में एक बार फिर महत्वपूर्ण हो गया है. सपा के लिए यह सिर्फ एक पूर्व IAS अधिकारी को संसद भेजने की कोशिश नहीं है. रंजन के पास प्रशासन का लंबा अनुभव है. अखिलेश सरकार के साथ काम करने का अनुभव है. और 2024 के बाद अब एक बार फिर राज्यसभा पहुंचने की कोशिश है.