Mahatma Gandhi Pen Story : अरबों-खरबों के नोटों पर छपने वाले महात्‍मा गांधी ने महंगे पेन से क्यों बना ली थी दूरी? अपना ल‍िया था देसी जुगाड़

Mahatma Gandhi Pen Story : अरबों-खरबों के नोटों पर छपने वाले महात्‍मा गांधी ने महंगे पेन से क्यों बना ली थी दूरी? अपना ल‍िया था देसी जुगाड़


महात्‍मा गांधी की तस्वीर आज भारत के अरबों खरबों के नोटों पर छपती है. लेकिन क्‍या आपको पता है क‍ि उनके जीवन में एक ऐसा दौर भी आया था, जब उन्‍होंने महंगे फाउंटेन पेन से दूरी बना ली. वजह कोई बड़ी राजनीतिक लड़ाई या पैसों की कमी नहीं थी. उनका महंगा पेन चोरी हो गया था. पेन वापस नहीं मिला, लेकिन इस छोटी-सी घटना ने महात्मा गांधी को सोचने पर मजबूर कर दिया. उन्होंने तय किया कि अब वह ऐसी चीज इस्तेमाल नहीं करेंगे, जो किसी दूसरे को चोरी करने के लिए ललचाए.

इसके बाद गांधी जी ने महंगे पेन की जगह लकड़ी के एक साधारण होल्डर और निब से लिखना शुरू कर दिया. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. कुछ समय बाद निब भी मुड़ गई. उसे बदलवाने के लिए मनुबहन को भेजना पड़ा. गांधी जी को लगा कि लिखने के लिए बार-बार किसी चीज का इंतजार करना समय की बर्बादी है. फिर उन्होंने ऐसा रास्ता निकाला, जिसमें न महंगे पेन की जरूरत थी और न बार-बार निब बदलने की चिंता. यह किस्सा गांधी जी की सादगी के साथ-साथ उनकी सोच को भी सामने लाता है. वह छोटी-सी चीज में भी समय, पैसे और संसाधनों की बचत का रास्ता खोज लेते थे. उनका यह क‍िस्‍सा mkgandhi-sarvodaya.org और mkgandhi.org से ल‍िया गया है.

महंगा पेन चोरी हुआ, तो गांधी जी को किस बात का दुख हुआ?

आमतौर पर किसी का पेन खो जाए या चोरी हो जाए, तो वह दूसरा पेन खरीद लेता है. गांधी जी के साथ भी ऐसा ही हुआ था. उनके पास एक महंगा फाउंटेन पेन था, जिसे किसी ने चुरा लिया. पेन की जगह दूसरा पेन भी आ गया, लेकिन गांधी जी को इस घटना ने दुखी कर दिया.

सवाल यह है कि जब दूसरा पेन मिल गया था, तो उन्हें परेशानी किस बात की थी? दरअसल, इस घटना के बाद उन्होंने सोचा कि आखिर ऐसी चीज रखने की जरूरत ही क्या है, जो किसी दूसरे व्यक्ति के मन में उसे चुराने का लालच पैदा करे. उन्होंने तय किया कि आगे से ऐसी आकर्षक और महंगी चीजों का इस्तेमाल नहीं करेंगे, जिनके चोरी होने का खतरा हो.

यह फैसला सिर्फ एक पेन तक सीमित नहीं था. इसके पीछे उनकी सोच थी कि जरूरत के हिसाब से चीजों का इस्तेमाल किया जाए. किसी वस्तु को सिर्फ इसलिए अपने पास रखना कि वह महंगी है या देखने में अच्छी है, उनके लिए जरूरी नहीं था. पेन चोरी होने की घटना ने उन्हें अपने इस्तेमाल की चीजों पर दोबारा सोचने का मौका दिया.

फाउंटेन पेन छोड़ा, लकड़ी के होल्डर और निब से लिखने लगे

महंगे फाउंटेन पेन को छोड़ने के बाद गांधी जी ने लकड़ी के एक साधारण पेन-होल्डर और निब का इस्तेमाल शुरू कर दिया. आज के दौर में बहुत से लोगों ने शायद ऐसा पेन देखा भी न हो. इसमें स्याही भरने वाला आधुनिक फाउंटेन पेन जैसा सिस्टम नहीं होता था. लकड़ी के होल्डर के सिरे पर धातु की एक छोटी-सी निब लगाई जाती थी. उसे स्याही में डुबोकर लिखा जाता था.

शुरुआत में यह व्यवस्था ठीक चल रही थी. लेकिन कुछ समय बाद एक नई परेशानी आ गई. लिखते समय निब मुड़ गई. अब उसे बदलना जरूरी था. गांधी जी ने मनुबहन को नई निब लाने के लिए भेज दिया.

यह कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं थी. बाजार से नई निब लाई जा सकती थी और फिर लिखने का काम शुरू हो सकता था. लेकिन गांधी जी के लिए यहां एक दूसरी बात ज्यादा अहम थी. उन्हें निब बदलवाने के लिए इंतजार करना पड़ा और उनका कीमती समय इस काम में लग रहा था.

कुछ मिनट की देरी भी गांधी जी को क्यों खलती थी?

गांधी जी की दिनचर्या काफी व्यस्त रहती थी. उन्हें पत्र लिखने होते थे, लोगों से मिलना होता था और देश से जुड़े कई मुद्दों पर काम करना होता था. ऐसे में कुछ मिनट की देरी भी उनके पूरे कार्यक्रम को प्रभावित कर सकती थी.

जब मनुबहन नई निब लेकर वापस लौटीं, तो उन्होंने एक अलग ही नजारा देखा. गांधी जी लकड़ी के उसी होल्डर के दूसरे सिरे को छीलकर नुकीला बना रहे थे.

मनुबहन ने पूछा कि वह ऐसा क्यों कर रहे हैं. आखिर लकड़ी के होल्डर में निब लगाने की जगह तो पहले से थी. फिर उसके दूसरे सिरे को नुकीला बनाने की क्या जरूरत थी?

गांधी जी ने उन्हें बताया कि अब वह होल्डर के दूसरे सिरे को भी लिखने के काम में ला सकते हैं. पुराने समय में लोग लकड़ी को छीलकर इस तरह की कलम बनाते थे. इसे ‘किट्टा’ कहा जाता था.

यानी जिस परेशानी को दूर करने के लिए बाजार से नई निब लानी पड़ी थी, गांधी जी ने उसी से बचने का एक दूसरा तरीका निकाल लिया था. अगर धातु की निब मुड़ जाए, तो लिखने के लिए लकड़ी का नुकीला सिरा इस्तेमाल किया जा सकता था.

क्या था ‘किट्टा’, जिससे गांधी जी ने लिखना शुरू किया?

किट्टा लकड़ी से बनाई जाने वाली एक साधारण कलम थी. इसके लिए लकड़ी के सिरे को छीलकर नुकीला बनाया जाता था, ताकि उससे लिखा जा सके. यह आधुनिक पेन की तरह तैयार उत्पाद नहीं था, बल्कि जरूरत के हिसाब से बनाई जाने वाली कलम थी. गांधी जी ने मनुबहन को बताया कि पुराने समय में लोग ऐसी कलम का इस्तेमाल करते थे. इससे लिखने का अभ्यास भी बेहतर होता था और इसके लिए पैसे खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ती थी.

गांधी जी की नजर में यह एक  उपाय था. अब उनके पास लिखने के लिए एक ही होल्डर में दो विकल्प थे. एक तरफ धातु की निब लगाई जा सकती थी और दूसरी तरफ लकड़ी का नुकीला सिरा इस्तेमाल किया जा सकता था. इस तरह एक छोटी-सी परेशानी ने उन्हें ऐसा रास्ता दिखाया, जिसमें खर्च भी कम था और काम रुकने की आशंका भी घट गई थी. उनके लिए यह सिर्फ पैसे बचाने का मामला नहीं था. इसमें समय बचाने और उपलब्ध चीजों का पूरा इस्तेमाल करने की सोच भी शामिल थी.

इसी किट्टे से पहला पत्र किसे लिखा गया?

इस किस्से का सबसे दिलचस्प हिस्सा इसके अंत में आता है. गांधी जी ने लकड़ी के जिस किट्टे को तैयार किया था, उससे सबसे पहला पत्र किसे लिखा गया? जवाब था- लॉर्ड माउंटबेटन.

यह वही माउंटबेटन थे, जो ब्रिटिश शासन के अंतिम वायसराय थे और बाद में स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर-जनरल बने. यानी जिस साधारण लकड़ी की कलम को गांधी जी ने महंगे पेन के विकल्प के तौर पर अपनाया, उससे लिखा गया पहला पत्र एक बेहद अहम राजनीतिक शख्सियत के नाम था.

इस बात में एक खास संदेश भी छिपा है. पत्र लिखने वाले व्यक्ति की पहचान उसके पेन की कीमत से नहीं होती. उसके विचार और लिखे गए शब्द ज्यादा मायने रखते हैं. गांधी जी के मामले में तो यह बात और भी स्पष्ट दिखाई देती है. महंगे फाउंटेन पेन की जगह लकड़ी का साधारण किट्टा था, लेकिन उससे लिखा गया पत्र माउंटबेटन को संबोधित था.

गांधी जी की सादगी का मतलब सिर्फ कम खर्च करना नहीं था

गांधी जी के इस किस्से को केवल यह कहकर खत्म नहीं किया जा सकता कि वह पैसे बचाते थे. इसमें उनकी सोच के कई पहलू दिखाई देते हैं. पहली बात, वह किसी चीज की कीमत से ज्यादा उसके इस्तेमाल को महत्व देते थे. दूसरी बात, वह छोटी-सी परेशानी को भी समय की बर्बादी मानकर उसका हल खोजते थे. तीसरी बात, वह किसी वस्तु के खराब होने पर तुरंत नई चीज पर निर्भर होने के बजाय उपलब्ध साधनों से काम चलाने का रास्ता तलाशते थे.

आज हममें से बहुत से लोग छोटी-सी चीज खराब होने पर उसे बदलने के बारे में सोचते हैं. पेन की निब मुड़ जाए, तो नया पेन खरीदना आसान लगता है. गांधी जी ने उसी स्थिति में लकड़ी के दूसरे सिरे को छीलकर लिखने का विकल्प तैयार कर लिया.

यह किस्सा हमें यह नहीं बताता कि हर महंगी चीज गलत है या हर व्यक्ति को लकड़ी की कलम ही इस्तेमाल करनी चाहिए. इसका असली संदेश जरूरत और दिखावे के बीच फर्क समझने में है. गांधी जी के लिए पेन लिखने का साधन था, कोई ऐसी चीज नहीं जिसे उसकी कीमत या खूबसूरती के कारण संभालकर रखा जाए.



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