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Kotda Mata Dham: अरावली की ऊंची पहाड़ियों के बीच दो विशाल चट्टानों से बनी गुफा में विराजती हैं मां कोटड़ा माता. यहां मां के धड़ स्वरूप की पूजा होती है. महाभारत काल से जुड़ी मान्यताओं और नवरात्रि में उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ के कारण यह धाम राजस्थान के प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थलों में खास पहचान रखता है.
श्री कोटड़ा माता धाम की सबसे अनोखी पहचान इसकी अद्भुत और प्राकृतिक बनावट है. यह पावन मंदिर दो विशाल और प्राचीन प्राकृतिक चट्टानों के बीच बनी एक गुफा में स्थित है. अरावली पहाड़ियों की ऊंचाइयों पर बसी यह गुफा श्रद्धालुओं को जम्मू स्थित माता वैष्णो देवी के दरबार का दिव्य अहसास कराती है. दुर्गम और मनोरम रास्ते से गुज़रकर मंदिर तक पहुंचना ही भक्तों के लिए एक आध्यात्मिक यात्रा बन जाता है.
इस धाम को राजस्थान के अन्य प्रमुख शक्तिपीठों से जो बात अलग और विशिष्ट बनाती है, वह है यहां होने वाली मां भगवती की विशेष पूजा. लोक मान्यताओं के अनुसार, कोटड़ा माता धाम में माँ के ‘धड़ स्वरूप’ की पूजा-अर्चना की जाती है. माना जाता है कि मां का यह स्वरूप अत्यंत फलदायी है, और यही वजह है कि यहां वर्षभर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है.
कोटड़ा माता धाम का इतिहास केवल मान्यताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध महाभारत कालीन पौराणिक गाथाओं से भी जोड़ा जाता है. क्षेत्रीय किंवदंतियों के अनुसार, पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान अरावली की इन गुफाओं और वादियों में समय बिताया था और मां शक्ति की आराधना की थी. यही प्राचीन आध्यात्मिक ऊर्जा आज भी यहाँ आने वाले हर भक्त को महसूस होती है.
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धार्मिक महत्व के साथ-साथ यह स्थान प्रकृति प्रेमियों के लिए भी किसी स्वर्ग से कम नहीं है. अरावली की ऊंची-ऊंची पहाड़ियों, शांत वातावरण और गुफा के आसपास बिखरी कुदरती खूबसूरती के कारण लोग यहां आकर आत्मिक शांति का अनुभव करते हैं. पहाड़ों की ऊंचाई से आसपास का विहंगम दृश्य हर किसी का मन मोह लेता है.
नवरात्रि के पावन पर्व के दौरान इस धाम की छटा देखते ही बनती है. नौ दिनों तक यहां मारवाड़ ही नहीं, बल्कि पूरे राजस्थान और गुजरात से हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु मां के दर्शन और आशीर्वाद के लिए पहुंचते हैं. भोर की पहली किरण के साथ ही जयकारों की गूंज से पूरा अरावली क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में सराबोर हो जाता है.
मान्यता है कि मां कोटड़ा माता के दरबार से कभी कोई भक्त खाली हाथ नहीं लौटता. गंभीर बीमारियों से मुक्ति, परिवार की सुख-समृद्धि और मनचाही मुरादों के लिए भक्त यहां आकर मन्नत का धागा बांधते हैं और मां के चरणों में शीश नवाते हैं. मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु पुनः यहां आकर भंडारे और महाप्रसाद का आयोजन करते हैं.
आस्था, इतिहास और प्राकृत की गोद में बसा मां कोटड़ा माता का यह धाम आज मारवाड़ की महान धार्मिक विरासत का सशक्त प्रतीक बन चुका है. दुर्गम गुफा, धड़ स्वरूप की पूजा और अरावली का नज़ारा—यह सब मिलकर कोटड़ा माता धाम को केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि धार्मिक पर्यटन (Spiritual Tourism) के लिहाज़ से भी पाली ज़िले का सबसे ख़ास केंद्र बनाते हैं.