‘पहली सिगरेट तो बस यूं ही लगती है…’ इलाहाबाद HC के जज ने कविता में बताया कैसे आदत बन जाती है धूम्रपान

‘पहली सिगरेट तो बस यूं ही लगती है…’ इलाहाबाद HC के जज ने कविता में बताया कैसे आदत बन जाती है धूम्रपान


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Allahabad Latest News: इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले में जज की लिखी कविता ने धूम्रपान की आदत को लेकर खास ध्यान खींचा. जस्टिस शेखर बी. सराफ ने अपने पुराने अनुभव को कविता के जरिए बताया कि कैसे पहली सिगरेट भले ही छोटी और सामान्य बात लगे, लेकिन धीरे-धीरे यही आदत इंसान के लिए परेशानी बन सकती है.

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इलाहाबाद हाईकोर्ट.

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले में हुक्के पर रोक लगाने के साथ एक ऐसी बात भी सामने आई, जिसने सबका ध्यान खींच लिया. जस्टिस शेखर बी. सराफ ने फैसले के आखिर में अपनी ही जिंदगी का अनुभव कविता के जरिए साझा किया. उन्होंने बताया कि कैसे कभी सिर्फ मजाक या शौक में शुरू की गई सिगरेट धीरे-धीरे आदत में बदल सकती है.

जस्टिस सराफ ने कविता में अपने लॉ स्कूल के दिनों को याद किया. उन्होंने बताया कि उस समय वह खुद धूम्रपान करने वालों को देखकर सोचते थे कि वह कभी सिगरेट नहीं पीएंगे. लेकिन दोस्तों और सीनियर के साथ चाय के दौरान एक बार सिर्फ आजमाने के लिए सिगरेट पी.

यहीं से कहानी बदल गई. शुरुआत में सिगरेट कभी-कभार ही होती थी, लेकिन धीरे-धीरे इसकी संख्या बढ़ने लगी. उन्हें लगा कि वह इसे अपनी मर्जी से करते हैं और जब चाहेंगे छोड़ देंगे. लेकिन समय के साथ धूम्रपान छोड़ना आसान नहीं रहा. जज ने अपने अनुभव में आगे बताया कि इसका असर खांसी और बलगम जैसी परेशानियों के रूप में दिखने लगा. छोड़ने की कोशिश भी की, लेकिन बार-बार फिर वही आदत लौट आती थी. उन्होंने इस अनुभव को कविता में उतारकर युवाओं को समझाने की कोशिश की कि किसी भी नशे की शुरुआत को हल्के में नहीं लेना चाहिए.

फैसले में कोर्ट ने हुक्के को लेकर भी अहम टिप्पणी की. कोर्ट के मुताबिक करीब एक घंटे के हुक्का सेशन में लगभग 200 बार कश लिया जा सकता है और इसे करीब 100 सिगरेट के बराबर नुकसान से जोड़ा गया है. कोर्ट ने उस सोच को भी गलत बताया कि हुक्का सिगरेट से कम नुकसानदायक है.

कोर्ट ने साफ किया कि यूपी के सार्वजनिक स्थानों पर बने designated smoking area में भी रेस्टोरेंट हुक्का सर्विस नहीं दे सकते. कोर्ट ने कहा कि धूम्रपान न करने वाले लोगों को साफ हवा में सांस लेने का अधिकार है और किसी कारोबारी गतिविधि के नाम पर इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. फैसले के अंत में जज की कविता का संदेश भी साफ था किसी आदत की शुरुआत छोटी लग सकती है, लेकिन आगे चलकर उससे बाहर निकलना मुश्किल हो सकता है.



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