ब्रह्मांड के विशाल कैनवास पर हमारी पृथ्वी किसी कठपुतली जैसी दिखाई देती है. सूरज और चांद अपनी ग्रेविटी की अदृश्य डोर से इसे लगातार अपनी तरफ खींचते रहते हैं. हम सभी जानते हैं कि इसी खिंचाव की वजह से समंदर में ऊंची लहरें और ज्वार-भाटा उठते हैं. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह कॉस्मिक खिंचाव धरती की ठोस जमीन और कठोर चट्टानों को भी अंदर तक हिला देता है. जियो-प्लेनेटरी साइंटिस्ट्स की एक टीम ने हाल ही में ‘जेजीआर सॉलिड अर्थ’ जर्नल में एक बेहद हैरान करने वाली रिसर्च पेश की है. इस रिसर्च के अनुसार सूरज और चांद का यह निरंतर खिंचाव धरती के क्रस्ट पर लगातार टाइडल स्ट्रेस डालता रहता है. यह दबाव जमीन के नीचे दबे ‘स्लो अर्थक्वेक’ यानी बेहद धीमी गति वाले भूकंपों को ट्रिगर कर देता है.
वैज्ञानिकों ने अब उस सीक्रेट मैकेनिज्म को ढूंढ निकाला है, जिससे यह साफ होता है कि अंतरिक्ष का यह हल्का सा खिंचाव भी धरती की छाती चीरने वाले बड़े हादसों की पटकथा कैसे तैयार करता है.
क्या वाइन ग्लास की तरह बज रही है हमारी पृथ्वी?
वैज्ञानिक काफी समय से जानते थे कि टाइडल फोर्स जमीन के नीचे धीमी हलचल पैदा करती है. लेकिन यह सब कैसे होता है, यह रहस्य अब तक अनसुलझा था. नई कंप्यूटर मॉडलिंग ने खुलासा किया है कि यह पूरी घटना रेजोनेंस यानी तालमेल के जरिए काम करती है.
इसे आप एक बहुत आसान घरेलू उदाहरण से समझ सकते हैं. जब कोई इंसान वाइन ग्लास के किनारे पर अपनी गीली उंगली को गोल-गोल घुमाता है, तो उसमें से एक खास किस्म की आवाज गूंजने लगती है. ठीक यही प्रक्रिया धरती के बहुत बड़े पैमाने पर घटित होती है. सूरज और चांद का खिंचाव धरती के अंदर मौजूद फॉल्ट लाइन के साथ एक फ्रीक्वेंसी पर मैच कर जाता है. जब यह फ्रीक्वेंसी आपस में टकराती है, तो चट्टानों के बीच बिना किसी बड़े धमाके के धीमी हलचल शुरू हो जाती है.
पीठ पर एक हल्की थपकी जितना दबाव कैसे ला सकता है भूकंप?
रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों ने जब इस खिंचाव का हिसाब लगाया, तो उन्हें बेहद हैरान करने वाले आंकड़े मिले. यह टाइडल दबाव महज कुछ किलोपास्कल के बराबर होता है. यह दबाव किसी इंसान की पीठ पर हल्के हाथ से थपकी देने या हाथ दबाने जितना ही मामूली है.
रिसर्चर्स ने कहा, ‘भले ही यह तनाव बहुत छोटा है और एक कोमल हाथ के दबाव के बराबर है, फिर भी यह कुछ खास फॉल्ट्स पर स्लो अर्थक्वेक को ट्रिगर करने में पूरी तरह सक्षम देखा गया है’.
वैज्ञानिकों ने इसके लिए एक स्प्रिंग-ब्लॉक मॉडल तैयार किया था. इसमें ‘रेट-एंड-स्टेट फ्रिक्शन’ के नियम को शामिल किया गया. इसका सीधा मतलब यह है कि चट्टानें किस रफ्तार से फिसल रही हैं और उनके आपस में संपर्क का स्तर क्या है. जब फॉल्ट लाइन पहले से ही फिसलने की स्थिति में होती है, तो यह हल्का सा धक्का भी उसका संतुलन बिगाड़ देता है.
झूले की तरह ताल मिलाकर धरती को हिलाता है अंतरिक्ष!
- धरती के नीचे मौजूद दरारें हमेशा स्थिर नहीं रहती हैं. जब दो टेक्टोनिक प्लेट्स एक-दूसरे से रगड़ खाती हैं, तो उनके बीच फ्रिक्शन पैदा होता है. जैसे ही उनकी गति थोड़ी भी बढ़ती है, उनके बीच का घर्षण अचानक कम होने लगता है. इससे चट्टानें तेजी से फिसलने लगती हैं.
- साइंटिस्ट्स का कहना है कि यह ठीक वैसा ही है जैसे सही रिदम पर झूले को धक्का देने से वह ज्यादा ऊंचा जाने लगता है. यदि अंतरिक्षीय खिंचाव की अवधि फॉल्ट के नेचुरल रिस्पांस टाइम से मैच कर जाए, तो बेहद मामूली दबाव भी चट्टानों को बड़े पैमाने पर सरका देता है.
- अगर यह दबाव एक तय सीमा से कम रहता है, तो चट्टानें बहुत धीरे-धीरे और शांति से खिसकती रहती हैं. लेकिन जैसे ही खिंचाव का एम्प्लिट्यूड उस सीमा को पार करता है, धरती के भीतर तेज गड़गड़ाहट पैदा हो जाती है.
जापान और अमेरिका की धरती पर पहले से दिख रहे हैं इसके सबूत
यह केवल कंप्यूटर स्क्रीन पर तैयार किया गया कोई काल्पनिक मॉडल नहीं है. वैज्ञानिकों ने दुनिया के बेहद संवेदनशील इलाकों में इस थ्योरी को सच साबित होते देखा है. दक्षिण-पश्चिम जापान और उत्तरी अमेरिका के कैस्केडिया रीजन में जमीन के नीचे लगातार होने वाले ट्रेमर्स इसका जीवंत प्रमाण हैं.
इन इलाकों में जमीन के भीतर उठने वाली कंपन का समय लगभग 12 और 24 घंटे के अंतराल पर सबसे ज्यादा दर्ज किया जाता है. यह समय चक्र ठीक वही है, जिस दौरान समंदर में ज्वार-भाटे का चक्र अपने चरम पर पहुंचता है.
हालांकि वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि हर बार यह प्रक्रिया सीधी और आसान नहीं होती है. कई बार टाइडल हलचल बेहद जटिल और अप्रत्याशित हो जाती है. इससे अचानक किसी भी वक्त भूकंपीय हलचल शुरू हो सकती है.
क्या इस फॉर्मूले से मेगाथ्रस्ट महाभूकंप और सुनामी का पता चल सकेगा?
प्रशांत महासागर का सबडक्शन जोन यानी रिंग ऑफ फायर दुनिया का सबसे खतरनाक इलाका माना जाता है. यहां दुनिया की सबसे विशाल टेक्टोनिक प्लेट्स एक-दूसरे के नीचे धंस रही हैं. इन्हीं इलाकों में स्लो अर्थक्वेक सबसे ज्यादा रिकॉर्ड किए जाते हैं.
साइंटिस्ट्स के अनुसार स्लो अर्थक्वेक टेक्टोनिक प्लेट्स के जोड़ पर जमा होने वाले भारी दबाव और उसके रिलीज होने का राज खोलते हैं. जब ये धीमी हलचलें लंबे समय तक जमा ऊर्जा को संभाल नहीं पाती हैं, तो नतीजा मेगाथ्रस्ट अर्थक्वेक के रूप में सामने आता है.
मेगाथ्रस्ट दुनिया के सबसे विनाशकारी भूकंप होते हैं. ये भूकंप समुद्र में भयानक सुनामी पैदा कर सकते हैं. यहां तक कि शांत पड़े ज्वालामुखियों को भी फिर से दहका सकते हैं.
अब वैज्ञानिक दर्ज किए गए छोटे भूकंपों की तुलना अंतरिक्ष के टाइडल डेटा से करेंगे. इससे यह आसानी से पता चल जाएगा कि किसी फॉल्ट लाइन की पकड़ कितनी कमजोर हो चुकी है. साथ ही यह भी जाना जा सकेगा कि वह प्लेट टूटने से पहले कितना खिसक सकती है. हालांकि यह मॉडल फिलहाल फॉल्ट के एक छोटे हिस्से पर केंद्रित है. लेकिन आने वाले समय में यह तकनीक पूरे इलाके में आने वाले बड़े भूकंपों की सटीक भविष्यवाणी करने में मददगार हो सकती है.