चांद तो बस शुरुआत थी, अब मंगल को मुट्ठी में करेगा चीन! 2028 तक खोज निकालेगा लाल ग्रह पर छिपे हर खजाने का पता

चांद तो बस शुरुआत थी, अब मंगल को मुट्ठी में करेगा चीन! 2028 तक खोज निकालेगा लाल ग्रह पर छिपे हर खजाने का पता


चांद की बात अब पुरानी हुई. अमेरिका और चीन के बीच मंगल को लेकर जंग तेज हो चुकी है. ड्रैगन अब लाल ग्रह पर अपनी बादशाहत कायम करने के लिए बड़ा दांव चलने जा रहा है. चीन ने ऐलान किया है कि वह साल 2028 के आखिर तक पूरे मंगल ग्रह का एक संपूर्ण जियोलॉजिकल नक्शा तैयार कर लेगा. यह नक्शा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की मदद से बनने वाला दुनिया का पहला मार्स मैप होगा. इस महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट का सीधा मकसद आने वाले तियानवेन-3 मिशन की राह आसान करना है. चीन सिर्फ नक्शा ही नहीं बनाना चाहता, वह 2031 तक मंगल की सतह से सैंपल धरती पर लाकर इतिहास रचने की फिराक में है. दूसरी तरफ अंतरिक्ष का सिरमौर रहा अमेरिका बजट और तकनीकी मुश्किलों से जूझ रहा है. नासा का मंगल अभियान भारी देरी का शिकार हो चुका है. ऐसे में चीन की यह नई तैयारी स्पेस साइंटिस्ट्स को चौंका रही है.

मंगल का पहला एआई नक्शा, चीन की क्या है चाल?

चीन के अगले मार्स मिशन तियानवेन-3 के चीफ साइंटिस्ट होउ जेंगकियान ने बताया कि यह नक्शा मंगल की पूरी सतह को कवर करेगा. चीन का असली मकसद मंगल के जियोलॉजिकल समय चक्र के लिए एक ग्लोबल स्टैंडर्ड तय करना है. चीन की सरकारी न्यूज एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक यह दुनिया का पहला एआई आधारित जियोलॉजिकल नक्शा होगा. इसके जरिए वैज्ञानिक मंगल की जमीन की संरचना और इतिहास को गहराई से समझ सकेंगे.

वैज्ञानिक इस मैप के साथ तियानवेन-3 की लैंडिंग साइट का 1:50,000 स्केल वाला डिटेल नक्शा भी तैयार करेंगे. इसके अलावा एक पूरी एटलस सीरीज भी पब्लिश की जाएगी. चीन का दावा है कि यह एआई मैपिंग तकनीक भविष्य में चंद्रमा, शुक्र और एस्टेरॉयड के अध्ययन के लिए भी एक मॉडल साबित होगी.

झूरोंग रोवर के किन रहस्यों की मदद से तैयार होगा लाल ग्रह का यह मैप?

  • चीन इस नए नक्शे को बनाने में अपने पहले मार्स रोवर झूरोंग से मिले डेटा का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करेगा. झूरोंग ने मंगल की सतह पर लगभग एक साल तक एक्टिव रहकर रिसर्च की थी. इस दौरान रोवर ने 1.9 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी तय की थी.
  • झूरोंग से मिले डेटा से पता चला कि लगभग 3.5 अरब साल पहले मंगल पर एक विशाल महासागर मौजूद था. इसके अलावा करीब 1.6 अरब साल पहले वहां अचानक आई भयानक बाढ़ के सबूत भी मिले हैं.
  • झूरोंग मई 2021 में तियानवेन-1 मिशन के तहत मंगल की जमीन पर उतरा था. इसके साथ ही चीन मंगल पर रोवर लैंड कराने वाला दुनिया का दूसरा देश बन गया था.

हालांकि मई 2022 में यह रोवर विंटर हाइबरनेशन में चला गया था. सोलर पैनलों पर भारी धूल जमने की वजह से यह दोबारा काम शुरू नहीं कर सका. इसके बावजूद रोवर से जुटाया गया डेटा आज चीन के नए नक्शे की मजबूत बुनियाद बन रहा है.

क्या तियानवेन-3 मिशन के जरिए नासा को धूल चटाने में कामयाब होगा ड्रैगन?

चीन साल 2028 के अंत में अपने तियानवेन-3 मिशन को अंतरिक्ष में लॉन्च करने की फुल तैयारी कर रहा है. इस मिशन का मुख्य लक्ष्य मंगल की जमीन से कम से कम 500 ग्राम सैंपल जमा करना है. इन नमूनों को साल 2031 तक सुरक्षित धरती पर वापस लाने का कड़ा टारगेट रखा गया है. अगर चीन इस मिशन में सफल रहता है, तो वह ऐसा कारनामा करने वाला दुनिया का पहला देश बन जाएगा.

इस पूरे मिशन को पूरा करने के लिए दो अलग-अलग भारी रॉकेट लॉन्च किए जाएंगे. पहले स्पेसक्राफ्ट में एक लैंडर और एसेंट व्हीकल होगा जो सतह से पत्थर और मिट्टी के टुकड़े जमा करेगा. दूसरे स्पेसक्राफ्ट में एक ऑर्बिटर और रिटर्न मॉड्यूल होगा जो सैंपल को सुरक्षित धरती तक लाएगा. यह मिशन चीन को स्पेस रेस के मामले में अमेरिका से एक कदम आगे खड़ा कर सकता है.

अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा का अरबों डॉलर का प्रोजेक्ट कैसे अटक गया?

  1. एक तरफ चीन तेजी से अपनी योजनाएं लागू कर रहा है, वहीं अमेरिका का मार्स सैंपल रिटर्न प्रोग्राम भारी संकट में घिर गया है. नासा और यूरोपियन स्पेस एजेंसी का यह साझा प्रोजेक्ट लगातार बजट की कमी से जूझ रहा है.
  2. नासा का पर्सिवियरेंस रोवर फरवरी 2021 से मंगल पर चट्टानों और मिट्टी के दर्जनों कीमती सैंपल जुटा चुका है. पुराने प्लान के तहत इन सैंपल्स को 2030 के दशक में धरती पर वापस लाया जाना था. लेकिन 2024 में नासा ने रिव्यू में पाया कि इस मिशन का खर्च 11 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. इसके अलावा सैंपल वापस लाने में 2040 तक की भारी देरी हो सकती है.
  3. इसी भारी भरकम खर्च की वजह से अमेरिकी संसद ने इस प्रोजेक्ट की पुरानी फंडिंग रोक दी थी. अब नासा कम बजट वाली नई तकनीक खोजने की कोशिश कर रहा है. लेकिन अमेरिकी मिशन का पूरा शेड्यूल अभी भी गंभीर अनिश्चितता में फंसा हुआ है.

कोल्ड वॉर से चली आ रही मंगल पर दबदबे की रेस

मंगल ग्रह पर पहुंचने की होड़ शीत युद्ध के दौर में सोवियत संघ और अमेरिका के बीच शुरू हुई थी. अमेरिका के मैरिनर-4 स्पेसक्राफ्ट ने 1965 में पहली बार मंगल के पास से गुजरकर दुनिया को हैरान किया था. इसके बाद 1976 में नासा के वाइकिंग-1 ने पहली बार मंगल की लाल जमीन पर सफल लैंडिंग की थी. साल 1997 में सोजर्नर रोवर ने मंगल की धरती पर पहला कदम रखकर इतिहास बनाया था. अब तक नासा के पांच रोवर मंगल की सतह की बारीकी से जांच कर चुके हैं.

आज भी अमेरिकी रोवर क्यूरियोसिटी और पर्सिवियरेंस वहां एक्टिव रहकर डेटा जुटा रहे हैं. लेकिन अब यह रेस अमेरिका और चीन की सीधी टक्कर में तब्दील हो चुकी है. मंगल के रिसोर्स और भविष्य की इंसानी बस्तियों के लिए यह नया नक्शा बहुत बड़ा हथियार साबित होगा. अगर चीन 2028 में अपना नक्शा और 2031 में सैंपल लाने में सफल रहा, तो स्पेस पावर का डायनैमिक्स बदल जाएगा.



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