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Samastipur Sanjeev Struggle Story: समस्तीपुर के संजीव को दिव्यांगता के कारण पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी पर अब सरकारी योजनाओं से लाभान्वित होकर वे दूसरों की मदद कर रहे हैं. वे बच्चों को मुफ्त ट्यूशन पढ़ाते हैं और दिव्यांग संघ के अध्यक्ष हैं. वे नहीं चाहते कि जिन स्थितियों के कारण वे नहीं पढ़ पाए, दूसरे बच्चे भी उनका सामना करें.
समस्तीपुर. समस्तीपुर जिले के पटोरी प्रखंड के रहने वाले संजीव की कहानी सिर्फ दिव्यांगता और संघर्ष की नहीं, बल्कि उन सपनों की भी है, जो हालात के आगे अधूरे रह गए. करीब 40 वर्षीय संजीव ने मैट्रिक तक पढ़ाई की, लेकिन आगे बढ़ने की राह में ऐसी मुश्किलें आईं कि उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी. संजीव बताते हैं कि बचपन से ही उनके मन में पढ़ने और कुछ बड़ा करने की तमन्ना थी. गुलाब बाबा हाई स्कूल में पढ़ाई के दौरान उन्हें ट्राई साइकिल मिली थी, लेकिन जब वह खराब हो गई तो उसे ठीक कराने के लिए पैसे और जरूरी सहयोग नहीं मिल सका.
स्कूल आने-जाने का साधन नहीं रहा और आखिरकार उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी. संजीव कहते हैं कि अगर उस समय आज की तरह सरकारी योजनाओं और सुविधाओं का लाभ मिल पाता, तो शायद आज उनकी जिंदगी कुछ और होती. उनका सपना था कि पढ़-लिखकर बड़े अधिकारी बनें और समाज में अपनी अलग पहचान बनाएं, लेकिन मजबूरियों ने उनके सपनों को अधूरा छोड़ दिया.
सरकारी योजनाओं से मिली नई राह
संजीव के जीवन में मुश्किलें कम नहीं थीं. कहीं आने-जाने के लिए दूसरों पर निर्भर रहना और अपनी जरूरतों के लिए संघर्ष करना उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया था. परिवार को भी कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा. लेकिन समय के साथ सरकारी योजनाओं के जरिए उन्हें जरूरी सुविधाएं मिलने लगीं. संजीव बताते हैं कि अब उन्हें पेंशन, राशन और जरूरत के अनुसार दिव्यांगजनों के लिए उपलब्ध कराई जाने वाली सुविधाओं का लाभ मिल रहा है.
ट्राई साइकिल, बैसाखी और इलेक्ट्रिक वाहन जैसी सुविधाओं ने उनके लिए एक जगह से दूसरी जगह जाना आसान बनाया है. उनके मुताबिक, अगर पढ़ाई के समय ऐसी सुविधाएं मिल जातीं तो शायद उन्हें स्कूल नहीं छोड़ना पड़ता. आज वह उन योजनाओं को दिव्यांगजनों के जीवन में बदलाव का माध्यम मानते हैं, जिनसे उन्हें आत्मनिर्भर बनने और अपनी जरूरतों के लिए आगे बढ़ने का अवसर मिला है.
खुद का सपना अधूरा रहा, अब दूसरों के सपनों को दे रहे उड़ान
संजीव की कहानी का सबसे भावुक पहलू यह है कि जिन परिस्थितियों ने कभी उन्हें पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर किया, आज उन्हीं परिस्थितियों से जूझ रहे बच्चों और दिव्यांगजनों की मदद करना उनकी जिंदगी का मकसद बन गया है. अपना अधिकारी बनने का सपना पूरा नहीं कर पाने वाले संजीव अब बच्चों को निशुल्क ट्यूशन पढ़ाते हैं. साथ ही दिव्यांग संघ के अध्यक्ष के रूप में अपने क्षेत्र के दिव्यांगजनों की समस्याओं को उठाते हैं और उनके अधिकारों के लिए आवाज बुलंद करते हैं.
संजीव का कहना है कि वह नहीं चाहते कि जिस तरह सुविधाओं के अभाव में उनकी पढ़ाई छूटी, उसी तरह किसी दूसरे बच्चे का भविष्य भी अधूरा रह जाए. वह लगातार प्रयास करते हैं कि जरूरतमंद दिव्यांगजनों को सरकारी योजनाओं की जानकारी मिले और उन्हें उनका लाभ मिल सके. कभी एक ट्राई साइकिल की कमी ने उनकी राह रोक दी थी, लेकिन आज वही संजीव दूसरों की राह आसान बनाने में जुटे हैं.