भारत की एस्सार ग्रुप अमेरिका में अब तक के सबसे बड़े स्टील प्रोजेक्ट में करीब 18 अरब डॉलर का निवेश करने जा रही है. एस्सार की अमेरिकी इकाई मेसाबी मेटैलिक्स आयोवा में करीब 15 अरब डॉलर का स्टील कॉम्प्लेक्स बनाएगी, जबकि करीब 3 अरब डॉलर मिनेसोटा की लोहे की खदान और उससे जुड़ी परियोजना पर लगाए जाएंगे. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा स्टील प्लांट बताया है.
यह परियोजना सिर्फ एक स्टील प्लांट की कहानी नहीं है. इसके जरिए भारत की एक कंपनी अमेरिका में खदान से लेकर स्टील उत्पादन तक पूरी सप्लाई चेन खड़ी करने जा रही है. प्लांट की शुरुआती उत्पादन क्षमता 75 लाख टन सालाना होगी, जिसे बाद में करीब 1 करोड़ टन तक ले जाने की योजना है. उत्पादन 2030 से शुरू होने की उम्मीद है. परियोजना से 6,000 तक निर्माण रोजगार और करीब 1,750 स्थायी नौकरियां पैदा होने का अनुमान है. भारतीय कंपनी की इस घोषणा से अमेरिका में निवेश को लेकर चीन की भी खोजबीन शुरू हो गई है. क्योंकि चीन के साथ अमेरिका के कारोबारी रिश्ते हमने कई गुना बड़े हैं.
अमेरिका में भारत का कितना निवेश?
सितंबर की शुरुआत में अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की मुलाकात के बाद एक्स पर एक आधिकारिक आंकड़ा सामने आया. इसके मुताबिक भारतीय कंपनियों ने अमेरिका में करीब 40 अरब डॉलर का निवेश किया है और इससे 70,000 से ज्यादा अमेरिकियों को डायरेक्ट नौकरी मिली है. इसमें एस्सार का ये 18 अरब डॉलर वाला निवेश शामिल नहीं है. भारत की कई बड़ी कंपनियां अमेरिका में आईटी, फार्मा, ऑटोमोबाइल, स्टील, ऊर्जा और दूसरे क्षेत्रों में मौजूद हैं.
चीन का अमेरिका में निवेश क्यों घटा?
चीन की तस्वीर भारत से बिल्कुल अलग दिखाई देती है. चीन का विदेशों में कुल प्रत्यक्ष निवेश 213.6 अरब डॉलर तक पहुंच गया. यह एक साल पहले की तुलना में 11.1 फीसदी ज्यादा था. यानी चीनी कंपनियां विदेशों में निवेश से पीछे नहीं हट रही थीं. लेकिन अमेरिका उनके लिए अपवाद बन गया. 2025 में अमेरिका में चीन का प्रत्यक्ष निवेश सिर्फ 1.91 अरब डॉलर रहा. यह 2024 के करीब 6.63 अरब डॉलर से 71.3 फीसदी कम था और 2011 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया. चीन के कुल विदेश निवेश में अमेरिका की हिस्सेदारी सिर्फ 0.9 फीसदी रह गई. यानी चीन दुनिया में ज्यादा पैसा लगा रहा है, लेकिन अमेरिका में कम.
अब सवाल यह है कि चीन के लिए अमेरिका इतना मुश्किल क्यों हुआ? इसका सबसे बड़ा कारण अमेरिका और चीन के बीच बढ़ा रणनीतिक और व्यापारिक तनाव है. अमेरिका ने चीन से जुड़े निवेश पर खासकर रणनीतिक क्षेत्रों में जांच और नियंत्रण बढ़ाया है. 2025 में जारी अमेरिका की अमेरिका फर्स्ट इन्वेस्टमेंट पॉलिसी में चीनी संबद्ध निवेश को संवेदनशील तकनीक, बुनियादी ढांचे और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सीमित करने के लिए कानूनी उपायों के इस्तेमाल की बात कही गई थी. दूसरी तरफ अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वार, टैरिफ और तकनीकी प्रतिस्पर्धा ने भी कंपनियों के लिए अनिश्चितता बढ़ाई है.
चीन का अमेरिका में कुल निवेश कितना है?
अगर सिर्फ नए निवेश की जगह कुल जमा प्रत्यक्ष निवेश यानी निवेश की स्थिति देखें तो तस्वीर थोड़ी अलग है. आर्थिक आंकड़े देने वाली वेबसाइट statista.com की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी आंकड़ों के मुताबिक 2025 के अंत में अमेरिका में चीन का प्रत्यक्ष निवेश करीब 19 अरब डॉलर था. यह 2024 के करीब 32.35 अरब डॉलर से काफी कम था. 2019 में यह आंकड़ा करीब 38.8 अरब डॉलर तक पहुंचा था. यानी चीन अमेरिका से अपनी पूंजी काफी हद तक निकाल रहा है.
यहीं भारत और चीन की दिशा अलग दिखती है. अमेरिका में भारतीय कंपनियों ने करीब 40 अरब डॉलर निवेश किए हैं, जबकि चीन का कुल प्रत्यक्ष निवेश 2025 के अंत में करीब 19 अरब डॉलर था. हालांकि इन दोनों आंकड़ों की गणना की पद्धति बिल्कुल अलग है. ऐसे में सीधे तौर पर तुलना करना भी ठीक नहीं होगा.
क्या ट्रंप टैरिफ के कारण एस्सार ने किया निवेश?
अमेरिकी प्रशासन इस परियोजना को अपने स्टील टैरिफ की सफलता के उदाहरण के तौर पर पेश कर रहा है. ट्रंप ने 2025 में विदेशी स्टील पर शुल्क बढ़ाकर 50 फीसदी किया था. अब वह कह रहे हैं कि ऊंचे आयात शुल्क की वजह से कंपनियां अमेरिका में ही उत्पादन लगाने को मजबूर हो रही हैं. वाणिज्य मंत्री हावर्ड लटनिक ने भी एस्सार परियोजना को स्टील टैरिफ से जोड़ते हुए कहा कि इन शुल्कों के बिना यह खदान और स्टील प्लांट नहीं बनता. हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह अमेरिकी प्रशासन का दावा है. किसी एक परियोजना के फैसले के पीछे सिर्फ टैरिफ को ही एकमात्र कारण मानना उचित नहीं होगा. एस्सार के लिए अमेरिकी बाजार, स्थानीय कच्चा माल, औद्योगिक ढांचा और दीर्घकालीन कारोबारी अवसर भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं.