सऊदी अरब के पास तेल बहुत है, लेकिन उसे दुनिया तक पहुंचाने के कई रास्ते हैं. इनमें एक रास्ता समुद्र के जरिए हॉर्मुज स्ट्रेट से होकर जाता है. दूसरा रास्ता यह पाइपलाइन है, जो देश के पूर्वी हिस्से से तेल को सीधे पश्चिमी तट तक पहुंचाती है. पाइपलाइन चालू होने का मतलब है कि सऊदी अरब के पास तेल बाहर भेजने का एक और रास्ता खुल गया है.
ये पाइपलाइन इतनी जरूरी क्यों है?
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, इस पाइपलाइन का नाम ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन है. यह सऊदी अरब के पूर्वी हिस्से को पश्चिमी तट से जोड़ती है. इसकी कुल क्षमता करीब 70 लाख बैरल तेल रोजाना है. सऊदी अरब के लिए हॉर्मुज स्ट्रेट तेल भेजने का बड़ा रास्ता है. लेकिन ईरान युद्ध के दौरान इस रास्ते पर जोखिम बढ़ गया है. जहाजों पर हमले की घटनाएं भी सामने आती रही हैं. ऐसे में ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन सऊदी अरब को दूसरा रास्ता देती है.
भारत के लिए राहत क्यों?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है. इसलिए दुनिया में तेल की सप्लाई जितनी सामान्य रहेगी, भारत के लिए उतना बेहतर है.
अगर युद्ध या हमलों की वजह से तेल की सप्लाई घटती है तो दुनिया भर में तेल के दाम बढ़ सकते हैं. और तेल महंगा हुआ तो भारत पर सीधा असर पड़ता है.
क्योंकि तेल सिर्फ पेट्रोल-डीजल बनाने के काम नहीं आता. ट्रक, बस, जहाज और हवाई जहाज से लेकर फैक्ट्री और खेती तक, पूरी अर्थव्यवस्था किसी न किसी रूप में ऊर्जा पर निर्भर है.
महंगा कच्चा तेल मतलब पेट्रोल-डीजल पर दबाव. इसके बाद माल ढुलाई महंगी हो सकती है. ट्रांसपोर्ट का खर्च बढ़ सकता है. कंपनियों की लागत बढ़ सकती है और धीरे-धीरे महंगाई पर भी असर पड़ सकता है. इसलिए सऊदी अरब की यह पाइपलाइन दोबारा शुरू होना तेल की सप्लाई के लिए राहत की खबर है.
अभी तक सऊदी अरब कैसे तेल भेज रहा था?
ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन बंद होने के बाद सऊदी अरब ने हॉर्मुज स्ट्रेट के रास्ते से तेल की सप्लाई बढ़ाई. सितंबर में सऊदी अरब का कुल तेल निर्यात युद्ध के दौरान रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचकर 50 लाख बैरल प्रतिदिन से ज्यादा हो गया. इसमें ज्यादातर तेल एशिया की तरफ गया. लेकिन हॉर्मुज का रास्ता जोखिम से भरा हुआ है.
ईरान के साथ चल रहे युद्ध को करीब सात महीने होने वाले हैं और इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों पर हमले का खतरा बना हुआ है. ऐसे में सऊदी अरब के लिए सिर्फ हॉर्मुज पर निर्भर रहना आसान नहीं है.