भगत सिंह ने जिस पिस्टल से अंग्रेज को मारी थी गोली, वो 88 साल बाद कैसे मिली? शहादत के बाद कहां गुमनाम रही

भगत सिंह ने जिस पिस्टल से अंग्रेज को मारी थी गोली, वो 88 साल बाद कैसे मिली? शहादत के बाद कहां गुमनाम रही


साल 2016 की बात है. मध्य प्रदेश के इंदौर में BSF के ट्रेनिंग हेडक्वार्टर में हलचल मची हुई थी. यहां एक पिस्तौल की खोज की जा रही थी. काले रंग से पेंट पिस्टल का रंग खुरचकर सीरियल नंबर की तलाश की जा रही थी. यह नंबर 168896 था. पहली, दूसरी के बाद तीसरी पिस्टल को साफ करने पर यह रंग दिख गया. वहां मौजूद लोगों के चेहरे पर चमक दौड़ गई. यह कोई ऐसी-वैसी पिस्टल नहीं थी, बल्कि भगत सिंह की पिस्टल थी. जी हां, शहीद-ए-आजम भगत सिंह की वह ऐतिहासिक पिस्तौल, जिससे उन्होंने 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में ब्रिटिश पुलिस अफसर जॉन पॉल सांडर्स को मार डाला था. भगत के हाथों से चलने के बाद कई दशकों तक गुमनामी के अंधेरे में खोई रही इस पिस्टल के दिन करीब 88 सालों के बाद वापस लौटे. लेकिन इसकी खोज हुई कैसे? ये कैसे दिल्ली से लाहौर से जालंधर होते हुए इंदौर और फिर पंजाब बॉर्डर तक पहुंची?

देश की आजादी के दीवाने और हंसते-पढ़ते हुए फांसी के फंदे पर झूल गए भगत सिंह के जन्मदिन पर आज किस्सा उनके हाथ से चलने वाले इस खास हथियार का. नवंबर 2016 में इस पिस्तौल की खोज हुई और इसे सार्वजनिक तौर पर पहचान मिली. अमेरिका निर्मित .32 बोर कोल्ट सेमी-ऑटोमैटिक पिस्तौल का सीरियल नंबर 168896 और बट नंबर 460-M था. इसी से सांडर्स को मारा गया था. यही पिस्टल कमर में खोंसकर भगत सिंह ने दिल्ली की असेंबली में बम फेंका और गिरफ्तार हो गए थे. उनकी गिरफ्तारी के बाद से इस पिस्टल का कुछ अता-पता नहीं था, बल्कि इतने सालों के बाद जाकर मिला.

ब्रिटिश अफसर सांडर्स की हत्या वाली पिस्टल 

पहले एक-एक करके पूरा माजरा सिलसिलेवार तरीके से समझ लेते हैं. 17 दिसंबर 1928 को लाहौर हत्याकांड में लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए भगत सिंह और उनके साथी शिवराम राजगुरु ने लाहौर में जॉन सांडर्स को गोली मारी थी. इसी .32 बोर कोल्ट पिस्तौल से भगत सिंह ने गोलियां चलाई थीं.

गिरफ्तारी के समय भी भगत के पास थी पिस्टल 

8 अप्रैल 1929 को सेंट्रल असेंबली बम कांड हुआ था. भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली में ब्रिटिश असेंबली में बम फेंका. सरेंडर करते समय भगत सिंह के पास यही सेमी-ऑटोमैटिक कोल्ट पिस्तौल मौजूद थी, जिसे पुलिस ने जब्त कर लिया. सांडर्स कांड में भगत सिंह के साथ ही सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा हुई थी.

भगत सिंह की पिस्टल हुसैनीवाला म्यूजियम में रखी हुई

लाहौर षड्यंत्र केस के दौरान सांडर्स के शरीर से मिली गोलियों का बैलिस्टिक टेस्ट कराया गया. फॉरेंसिक जांच में पुष्टि हुई कि ये गोलियां इसी पिस्तौल नंबर 168896 से चली थीं. ट्रिब्यूनल की अदालत ने इसे केस प्रॉपर्टी यानी सबूत के रूप में कोर्ट में जमा किया.

हथियार कैसे लाहौर से इंदौर तक पहुंचा?

  • लाहौर से फिल्लौर: 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत के बाद अदालत के आदेश पर केस से जुड़े सबूत लाहौर पुलिस को सौंपे गए. यह कई साल तक लाहौर में रहा. बाद में इस पिस्तौल को जालंधर के फिल्लौर में पंजाब पुलिस ट्रेनिंग स्कूल के आर्म्स ब्यूरो म्यूजियम में सुरक्षित रख दिया गया.
  • इंदौर का सफर: साल 1965 में हुए युद्ध के बाद सीमा सुरक्षा बल यानी BSF के स्थापना की जरूरत महसूस हुई. 1969 में बीएसएफ का ‘सेंट्रल स्कूल ऑफ वेपन्स एंड टैक्टिक्स’ (CSWT) इंदौर में स्थापित किया जा रहा था. इस दौरान राष्ट्रपति की अपील पर हर राज्य से हथियार मांगे गए. फिल्लौर आर्म्स ब्यूरो से ऐतिहासिक और पुराने हथियारों का एक जत्था ट्रेनिंग के मकसद से इंदौर CSWT ट्रांसफर किया गया. इनमें भगत सिंह की पिस्तौल भी शामिल थी.

गुमनामी और वो काला पेंट
इंदौर के CSWT म्यूजियम में यह पिस्तौल दशकों तक एक आम प्रदर्शित हथियार की तरह रखी रही. जंग से बचाने के लिए BSF की तरफ से संग्रहालय के सभी पुराने हथियारों पर काला पेंट चढ़ा दिया गया था. इस वजह से पिस्तौल पर दर्ज सीरियल नंबर ढक गया और किसी को अंदाजा नहीं था कि यह भगत सिंह का हथियार है.

2016 में कैसे हुई पिस्तौल की खोज?
भगत सिंह के पिस्टल की खोज के पीछे पंजाब के पत्रकार जुपिंदरजीत सिंह और इतिहासकार मविंदरजीत सिंह वराइच को क्रेडिट जाता है. वे लाहौर षड्यंत्र केस के अदालती दस्तावेजों और बैलिस्टिक रिपोर्ट की स्टडी कर रहे थे. दस्तावेजों में भगत सिंह की पिस्तौल का सीरियल नंबर 168896 साफ तौर पर दर्ज था.

  • इंदौर BSF रिकॉर्ड्स की जांच: जब पुरानी फाइलों का पीछा किया गया तो पता चला कि फिल्लौर से कुछ पुराने हथियार इंदौर भेजे गए थे. नवंबर 2016 में पत्रकार की रिपोर्ट के आधार पर BSF अधिकारियों ने अपने पुराने मालखाने के रजिस्टरों और स्टॉक लिस्ट को खंगाला.
  • काला रंग और नंबर का मिलान: रजिस्टर में एंट्रियां मिलने के बाद BSF टीम ने संदेह के आधार पर म्यूजियम की अलमारी से तीन पिस्तौलों का पेंट बहुत सफाई से केमिकल से हटाया गया. तीसरी पिस्तौल की बैरल और बॉडी से पेंट हटते ही उस पर ‘168896’ नंबर चमक उठा.

अभी कहां है यह पिस्तौल?
पिस्तौल की खोज होने के बाद पंजाब सरकार और देशवासियों ने इस राष्ट्रीय धरोहर को पंजाब वापस लाने की मांग की. अक्टूबर 2017 में इस पिस्तौल को इंदौर से लाकर पंजाब के फिरोजपुर स्थित हुसैनीवाला BSF म्यूजियम में स्थापित कर दिया गया. हुसैनीवाला वही जगह है जहां सतलुज नदी के किनारे भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का गुपचुप अंतिम संस्कार किया गया था. आज यह पिस्तौल कांच के खास बॉक्स में वहां आने वाले लोगों दर्शन के लिए रखी गई है.



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