पहले अलग हुए वैज्ञानिक-अब कर्मियों ने लिखी चिट्ठी… ISRO का नया संकट क्या है?
Agency:एजेंसियां
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ISRO का साथ पिछले कुछ महीनों में सैकड़ों वैज्ञानिक छोड़ चुके हैं. अब स्पेस एजेंसी के कर्मचारी संगठनों ने भी अध्यक्ष वी नारायणन को पत्र लिखकर भविष्य में संगठन की भूमिका पर चिंता जताई है. कर्मियों का कहना है कि जब निजी कंपनियां ही सब करेंगी तो इसरो का काम क्या होगा?
इसरो अध्यक्ष को कर्मचारी संगठनों ने पत्र भेजकर चिंता जताई है. (फोटो-सोशल मीडिया)
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ISRO ने हाल ही में नौकरी छोड़ने और VRS के नियमों को सख्त किया था. यह फैसला तब लिया गया था जब एक साल ही में 100 से ज्यादा वैज्ञानिक इसरो से अलग होकर निजी कंपनियों से जुड़ गए. इनमें कई ऐसे वैज्ञानिक भी थे, जो भारत के बहुप्रतीक्षित गगनयान और चंद्रयान जैसे मिशनों में काम कर रहे थे. अब एक और चुनौती सामने आई है.
इसरो के नौ कर्मचारी संगठनों ने इसरो चेयरमैन वी नारायणन को पत्र लिखकर निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका और स्पेस एजेंसी के भविष्य को लेकर सवाल उठाए हैं. कर्मचारियों का सवाल है कि अगर निजी कंपनियां रॉकेट और उपग्रहों का निर्माण कर उन्हें लॉन्च करेगीं तो फिर ISRO क्या करेगा? क्या एजेंसी सिर्फ रिसर्च और डेवलपमेंट केंद्र बनकर रह जाएगी.
बदल रहा है स्पेस सेक्टर
स्पेस सेक्टर बदल रहा है. दुनिया के विकसित देशों की तरह भारत में भी इस क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ी है. ऐसे में ISRO के सामने नया संकट खड़ा हो गया है. जुलाई 2026 में सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक पिछले कुछ महीनों में 100 से ज्यादा वैज्ञानिकों के इसरो से अलग होने की बात कही गई थी. इसके बाद अंतरिक्ष विभाग ने गगनयान और महत्वपूर्ण मिशनों से जुड़े लोगों के नौकरी छोड़ने के नियमों को सख्त किया था.
यह इसरो के लिए इसलिए भी चुनौती था, क्योंकि पहले से ही अंतरिक्ष विभाग में कर्मचारियों की कमी है. ET की एक रिपोर्ट के मुताबिक यहां स्वीकृत पद 20,269 हैं, इनमें से 5632 खाली हैं. ऐसे में इसरो के सामने निजी क्षेत्र से आगे रहने की चुनौती के साथ साथ अपनी वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता बनाए रखना जरूरी है. अध्यक्ष को लिखे पत्र में कर्मचारियों की चिंता भी कुछ ऐसी ही है.
प्राइवेट कंपनियों ने बदली अंतरिक्ष की तस्वीर
भारत के स्पेस सेक्टर में निजी कंपनियों का दखल बढ़ रहा है. भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 ने निजी क्षेत्र में भागीदारी के लिए रास्ता ज्यादा स्पष्ट किया है. स्टार्टअप्स ने रॉकेट, सैटेलाइट, स्पेस डेटा और दूसरे क्षेत्रों में काम शुरू कर दिया है. स्काईरूट एयरोस्पेस और अग्निकुल कॉसमॉस कंपनियां लॉन्च व्हीकल बना रही हैं. पिक्सल पृथ्वी अवलोकन के लिए हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट पर काम कर रहा है. अन्य कंपनियां भी इसी राह पर हैं. हालांकि सिर्फ भारत में ही ये नहीं हो रहा है. दुनिया भर के ज्यादातर देशों में सरकारी संस्थानों से आगे बढ़कर स्पेस सेक्टर का एक बड़ा हिस्सा निजी कंपनियों के हाथों में है.
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ISRO फिर आखिर क्या करेगा?
कर्मचारियों ने लेटर लिखकर पूछा है कि अगर निजी कंपनियां ही रॉकेट बनाएंगीं, सैटेलाइट लॉन्च करेगी और नियमित लॉन्च का काम संभालेगी तो क्या भूमिका कम होगी. ET ने इसरो ने पूर्व वैज्ञानिक और विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर के पूर्व निदेशक बीएन सुरेश के हवाले से लिखा है निजी कंपनियां इसरो का हाथ बंटाएगी. इसरो की भूमिका उन्नत रिसर्च और डेवलपमेंट, महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष मिशनों और रिमोट सेंसिंग जैसे राष्ट्रीय उपयोग वाले क्षेत्रों में बनी रहेगी.
वैज्ञानिकों छोड़ते रहे इसरो तो क्या होगा?
कर्मचारी संगठनों की चिंता इस बात की भी है कि अगर संगठन को वैज्ञानिक ऐसे ही छोड़ते रहे तो दशकों की मेहनत से जो स्पेशलटीज हासिल हुई है, जो एक्सपीरियंस इसरो के पास है. उसका क्या होगा? हालांकि कर्मचारियों को जो निजीकरण की चिंता है उसे लेकर पहले ही इसरो साफ कर चुका है कि न तो उसका निजीकरण किया जा रहा है और नही उसकी भूमिका कम होगी. हाल ही में इसरो अध्यक्ष वी नारायणन ने कहा था कि इसरो एक सरकारी संगठन है और इसका निजी क्षेत्र के साथ काम करने का उद्देश्य भारत की स्पेस इकोनॉमी बढ़ाना है. यह निजीकरण नहीं बल्कि नजी क्षेत्र के साथ सहयोग का एक मॉडल है जिस पर इसरो काम कर रहा है.