वोटर लिस्ट में नाम कटा और जुड़ने में लगे 12 साल तो वोट के अधिकार का क्या होगा? बंगाल SIR को लेकर बड़ा सवाल

वोटर लिस्ट में नाम कटा और जुड़ने में लगे 12 साल तो वोट के अधिकार का क्या होगा? बंगाल SIR को लेकर बड़ा सवाल


मतदाता सूची के पुनरीक्षण अभियान SIR में काटे गए वोटरों के नाम वापस जुड़ने में 10 से 12 साल लग सकते हैं. पश्चिम बंगाल चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा दिया है उसके मुताबिक पांच महीने में सिर्फ 1 लाख 26 हजार 194 अपीलों का ही निपटारा किया जा सका है. अगर इस लिहाज से देखा जाए तो 37 लाख से ज्यादा वोटरों की अपीलों को सुनने और निपटाने में कम से कम 12 साल लगने की संभावना है.

ऐसे में वो वोटर जो पात्र हैं, लेकिन गलती से उनका नाम कट गया, वे भी इतने साल तक किसी भी चुनाव में वोट नहीं डाल पाएंगे. ऐसे में सवाल है कि आखिर उनके वोट के अधिकार का क्या होगा? सुप्रीम कोर्ट के एडवाकेट जतिन भारद्वाज ने इस बारे में विस्तार से बताया है.

पश्चिम बंगाल में कटे थे 91 लाख नाम

पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के दौरान तकरीबन 91 लाख नाम काटे गए थे. इनमें से तकरीबन 38 लाख अपील दायर की गई थीं. इनमें 22 लाख 21 हजार 118 अपील मतदाताओं ने संबंधित थीं, जिन्होंने वोटर लिस्ट में नाम बहाल किए जाने की मांग की थी, जबकि 16 लाख अपीलें ऐसी थीं जिन्होंने सूची में नाम शामिल किए जाने को चुनौती दी थी. सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में चुनाव आयेाग की ओर से जो हलफनामा दायर किया गया, उसमें पांच माह में लगभग 1 लाख 26 हजार अपीलों को निपटाने की जानकारी दी है. इस लिहाज से अभी भी तकरीबन 37 लाख अपीलों की सुनवाई बाकी है.

10-12 साल लगे तो वोट के अधिकार का क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट के ऑन रिकॉर्ड एडवोकेट जतिन भारद्वाज का इस मसले पर कहना है कि असली चिंता नाम कटने की नहीं है. चिंता को न्याय में मिलने वाली देरी है. उनके मुताबिक यदि किसी पात्र मतदाता का नाम वोटर लिस्ट से काट दिया जाता है तो वह तब तक वोट नहीं डाल सकता, जब तक सूची में उसका नाम दोबारा शामिल नहीं होता. या उसे अदालत ने विशेष अंतरिम राहत नहीं दी जाती. यानी अगर अपील चुनाव आयोग में लंबित है तो वोट नहीं डालने दिया जाएगा.

अनुच्छेद-14 और अनुच्छेद-21 का उल्लंघन

एडवोकेट जतिन भारद्वाज ने News18 से बातचीत में कहा कि अगर किसी अपील के निपटारे में इतनी देरी हो जाए कि व्यक्ति एक या अधिक चुनावों में मतदान का मौका खो दे, तो यह संविधान के अनुच्छेद-14 और अनुच्छेद-21 का उल्लंघन बनता है. दरअसल किसी को अगर लंबी कानूनी प्रक्रिया की वजह से वोट के अधिकार से वंचित किया जाए तो ये अनुच्छेद-14 यानी समानता के अधिकार और अनुच्छेद-21 यानी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित माना जा सकता है.

एडवोकेट जतिन भारद्वाज के मुताबिक यदि किसी व्यक्ति का नाम अवैध रूप से हटाया गया हो और बाद में उनकी अपील स्वीकार भी हो जाए तब भी वह उन चुनावों में वोट नहीं डाल पाएगा जो अपील लंबित रहने के दौरान हो चुके हैं.

1 लाख से ज्यादा फैसले वोटरों के पक्ष में

चुनाव आयोग की ओर से सुप्रीम कोर्ट में जो आंकड़े दिए गए हैं, उनमें पहले से तय किए गए मामलों में से काफी संख्या में मामले मतदाताओं के पक्ष में गए हैं, जो अपना नाम बहाल करवाना चाहते थे. आंकड़ों के मुताबिक 1,26,194 अपीलों में से 1,13,943 मतदाताओं के नाम बहाल हुए हैं. महज 8,649 अपीलें ही खारिज हुई हैं.

कर्नाटक का मामला और पेचीदा

इसी तरह कर्नाटक का मामला भी पेचीदा है, जहां मतदाता सूची के सत्यापन की प्रक्रिया चल रही है. अभी तक जो मसौदा सूची तैयार हुई है, उसमें 1 करोड़ 8 लाख मतदाताओं को अनुपस्थित, डुप्लीकेट या अन्य कारणों की वजह से बाहर रखा गया है. इसके अलावा 43 लाख मतदाताओं को 2002 की मतदाता सूची के आधार पर नोटिस दिया जा सकता है. अगर इतने मतदाताओं के नोटिस पर सुनवाई हुई तो सभी को उपस्थित होना होगा. खास बात ये है कि यहां अंतिम मतदाता सूची 27 अक्टूबर को जारी होनी है. इतने कम समय में इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं को दिए गए नोटिस की सुनवाई कैसे होगी, ये बड़ा सवाल है.



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