1983 में शुरू हुई थी नाग की कहानी, अब जाकर बना भारत का स्वदेशी ‘टैंक किलर’, DRD0 के झटके से सदमे में चीन-पाकिस्‍तान

1983 में शुरू हुई थी नाग की कहानी, अब जाकर बना भारत का स्वदेशी ‘टैंक किलर’, DRD0 के झटके से सदमे में चीन-पाकिस्‍तान


Journey of Indian Missile Systems (Part-7): भारत की नाग मिसाइल की कहानी किसी एक दिन हुए सफल मिसाइल टेस्ट की कहानी नहीं है. यह करीब चार दशक लंबी ऐसी जर्नी है, जिसमें एक मिसाइल के साथ-साथ भारत ने सीकर, गाइडेंस, इमेज प्रोसेसिंग, प्रोपल्शन, वॉरहेड और लॉन्चर जैसी कई क्रिटिकल टेक्नोलॉजी विकसित कीं. आज जब नाग एमके-2 के फील्ड इवैल्यूएशन ट्रायल्स सफल हो चुके हैं और पूरा वेपन सिस्टम इंडियन आर्मी में इंडक्शन के लिए तैयार बताया गया है, तब पीछे मुड़कर देखने पर समझ आता है कि इस मुकाम तक पहुंचने में कितनी लंबी यात्रा तय हुई है.

दरअसल, इस कहानी की शुरुआत 1983 में भारत के इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (IGMDP) के साथ शुरू हुई थी. इस प्रोग्राम का मकसद अलग-अलग जरूरतों के लिए इंडिजिनस गाइडेड मिसाइल टेक्नोलॉजी को विकसित करना था. इसी प्रोग्राम में तहत पांच प्रमुख मिसाइलों की परिकल्‍पना की गई, जिसमें पृथ्वी, अग्नि, आकाश और त्रिशूल के साथ नाग मिसाइल का नाम भी शामिल था. हर मिसाइल का अपना अलग मकसद था. खासतौर पर नाग को एंटी-टैंक मिसाइल के रूप में डेवलप किया जाना था. यानी एक ऐसी मिसाइल जो बैटलफील्ड में दुश्मन के हेवी आर्मर्ड टैंकों को निशाना बना सके.

लेकिन उस समय चुनौती सिर्फ एक मिसाइल बनाने की नहीं थी. भारत को ऐसी मिसाइल बनानी थी जो टारगेट को खुद पहचान सके, उस पर लॉक कर सके और लॉन्च होने के बाद ऑपरेटर को लगातार मिसाइल को कंट्रोल न करना पड़े. यहीं से नाग के लिए ‘फायर एंड फॉरगेट’ कॉन्सेप्ट बेहद खास हो गया.

  1. नाग को बनाया जाना था ‘फायर एंड फॉरगेट’ मिसाइल: एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल यानी ATGM की कई जेनरेशन रही हैं. पुरानी जेनरेशन की मिसाइलों में ऑपरेटर को मिसाइल को टारगेट तक गाइड करना पड़ता था. लेकिन थर्ड-जेनरेशन की एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल में ऐसा नहीं है. इस मिसाइल में ऐसा सिस्‍टम है, जिसमें मिसाइल लॉन्च करने से पहले टारगेट को लॉक किया जाता है और फिर मिसाइल खुद टारगेट तक का सफर तय करती है. नाग को इसी फिलॉसफी पर डेवलप किया गया. इसका सीधा मतलब है कि सरल भाषा में यह है कि ऑपरेटर टारगेट को आइडेंटिफाई करता है, मिसाइल का सीकर टारगेट को लॉक करता है और लॉन्च के बाद मिसाइल अपने गाइडेंस सिस्टम की मदद से टारगेट की ओर बढ़ती है. डीआरडीओ की टीम ने नाग को टॉप अटैक कैपेबिलिटी के साथ भी डेवलप किया. इसका मतलब यह था कि मिसाइल टारगेट के ऊपर से जाकर टैंक के अपर पोर्शन को हिट कर सकती है. इसके बाद, भारत को इसी तरह की सोफिस्टिकेटेड एंटी-टैंक टेक्नोलॉजी अपने दम पर विकसित करनी थी.
  2. असली कमाल मिसाइल के इस दिगाम का है…: नाग मिसाइल की सबसे अहम टेक्नोलॉजी में से एक थी इसका इमेजिंग इंफ्रारेड यानी आईआईआर सीकर. दरअसल, किसी मिसाइल के लिए टारगेट तक पहुंचना एक बात है, लेकिन बैटलफील्ड में सही टारगेट को पहचानना दूसरी बात. मान लीजिए सामने डेजर्ट है. चारों तरफ गर्म जमीन, धूल, पत्थर और दूसरे हीट सोर्स हैं. उसी बैकग्राउंड में एक टैंक खड़ा है. मिसाइल को सिर्फ यह नहीं समझना है कि सामने कुछ गर्म है. उसे यह पहचानना है कि इनमें से कौन-सा ऑब्जेक्ट उसका वास्तविक टारगेट है. यही काम सीकर और उससे जुड़े इमेज-प्रोसेसिंग सिस्टम को करना होता है. नाग की डेवलपमेंट जर्नी में इस टेक्नोलॉजी पर काफी काम हुआ. डीआरडीओ ने सीकर और इमेज-प्रोसेसिंग कैपेबिलिटी को अलग-अलग एनवायरनमेंटल कंडीशंस में टेस्ट किया.
  3. नाम मिसाइल को नामिका ने बनाया अजेय: नाग मिसाइल अकेले बैटलफील्ड में नहीं जानी थी. इसके लिए एक डेडिकेटेड लॉन्चर और कैरियर सिस्टम की जरूरत थी. यहीं से सामने आया नामिका का नाम, जो नाग मिसाइल की कैरियर है. नामिका को बीएमपी-2 बेस्ड प्लेटफॉर्म पर तैयार किया गया. इसका काम था नाग मिसाइलों को बैटलफील्ड तक ले जाना, टारगेट एक्विजिशन में मदद करना और मिसाइलों को लॉन्च करना. 2019 में रक्षा मंत्रालय ने बताया था कि नामिका एक साथ छह कॉम्बैट मिसाइल कैरी कर सकता है. इस तरह धीरे-धीरे नाग एक अकेली मिसाइल नहीं रही. बल्कि यह एक पूरा वेपन सिस्टम बन गई. इस वेपन सिस्‍टम में नाग मिसाइल, आईआईआर सीकर, गाइडेंस सिस्टम, टारगेट एक्विजिशन और नामिका लॉन्चर शामिल थे. यही वजह है कि इस प्रोग्राम की टेस्टिंग भी सिर्फ मिसाइल उड़ाने तक सीमित नहीं थी.
  4. नाग मिसाइल की लंबी टेस्टिंग और टेक्निकल चैलेंज: नाग प्रोग्राम की सबसे बड़ी पहचान रही इसकी लंबी डेवलपमेंट जर्नी. 1983 में शुरू हुआ प्रोग्राम कई साल तक डेवलपमेंट और टेस्टिंग के दौर से गुजरता रहा. यहां यह समझना जरूरी है कि मिसाइल डेवलपमेंट में किसी प्रोटोटाइप का पहली बार उड़ जाना ही सफलता नहीं माना जाता. मिसाइल को अलग-अलग परिस्थितियों में टेस्ट करना पड़ता है. दिन और रात, गर्मी और सर्दी, अलग-अलग दूरी, अलग-अलग टारगेट कंडीशंस, लॉन्चर और मिसाइल की इंटीग्रेशन, सीकर का परफॉर्मेंस, गाइडेंस की एक्युरेसी और अंत में वास्तविक वॉरहेड के साथ टारगेट को बर्बाद करने की क्षमता. नाग के साथ भी यही प्रक्रिया चली. कई साल के डेवलपमेंट के बाद 2016-17 के दौरान नाग के ट्रायल्स ने प्रोग्राम को नया मोमेंटम दिया गया. इस दौरान मिसाइल के सीकर और टारगेट एंगेजमेंट कैपेबिलिटी को अलग-अलग परिस्थितियों में टेस्ट किया गया.
  5. 2017 में तो नाग के लिए आया एक बड़ा माइलस्टोन: 8 और 9 सितंबर 2017 को राजस्थान के रेंजेज में नाग के दो फ्लाइट टेस्ट किए गए. दोनों अलग-अलग टारगेट्स के खिलाफ थे और मिसाइल ने टारगेट्स को सफलतापूर्वक हिट किया. डीआरडीओ के मुताबिक जून 2017 में गर्मियों की कंडीशंस में किए गए एक टेस्ट के साथ इन टेस्ट्स ने नाग एटीजीएम और नामिका लॉन्चर सिस्टम की कंप्लीट फंक्शनैलिटी को डेमोंस्ट्रेट किया और डेवलपमेंट ट्रायल्स के सक्सेसफुल कंप्लीशन को मार्क किया. यह वह दौर था जब नाग अब सिर्फ लेबोरेटरी प्रोजेक्ट नहीं रह गई थी. मिसाइल बैटलफील्ड की वास्तविक कंडीशंस के और करीब पहुंच रही थी. 2018 में भी नाग के परीक्षण जारी रहे. इस स्टेज पर फोकस सिर्फ यह साबित करने पर नहीं था कि मिसाइल उड़ सकती है. अब यह देखना जरूरी था कि वह निर्धारित रेंज पर टारगेट को कितनी रिलायबली हिट करती है. एंटी-टैंक मिसाइल में रिलायबिलिटी बेहद महत्वपूर्ण होती है, इसीलिए नाग को अलग-अलग रेंज और कंडीशंस में टेस्ट किया जाता रहा.

2019 के पोखरण परीक्षण के बाद आया निर्णायक मोड़

फिर आया 2019. नाग के लिए यह साल बेहद अहम साबित हुआ. इंडियन आर्मी ने पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में नाग के समर यूजर ट्रायल्स किए. ये ट्रायल्स 7 से 18 जुलाई 2019 के बीच हुए. और यहां कहानी सिर्फ मिसाइल की नहीं थी. पोखरण की गर्म और मुश्किल डेजर्ट कंडीशंस में मिसाइल की असली परीक्षा थी. डीआरडीओ और आर्मी को देखना था कि भीषण गर्मी, डस्ट और डेजर्ट बैकग्राउंड के बीच नाग का सीकर टारगेट को पहचान पाता है या नहीं. इन ट्रायल्स में छह मिशन कंडक्ट किए गए. मिसाइल को मिनिमम रेंज और मैक्सिमम रेंज दोनों पर टेस्ट किया गया. डायरेक्ट अटैक और टॉप अटैक दोनों मोड्स में टेस्टिंग हुई. सभी मिसाइलों ने अपने मिशन ऑब्जेक्टिव पूरे किए और टारगेट्स को हिट किया. इससे पहले विंटर यूजर ट्रायल्स भी सफल रहे थे. विंटर और समर ट्रायल्स में कुल 10 मिसाइलें फायर की गईं और सभी ने टारगेट्स को हिट किया. यह नाग प्रोग्राम के लिए बहुत बड़ा टर्निंग पॉइंट था.

नाग ने डेवलपमेंट से प्रोडक्शन फेज की तरफ बढ़ाए कदम

2019 के यूजर ट्रायल्स के बाद नाग की यात्रा अंतिम बड़े परीक्षण की ओर बढ़ी. 22 अक्टूबर 2020 को पोखरण रेंज में नाग का फाइनल यूजर ट्रायल किया गया. यह टेस्ट इसलिए खास था क्योंकि मिसाइल को एक्चुअल वॉरहेड के साथ इंटीग्रेट किया गया था. सामने टैंक टारगेट था. मिसाइल को नामिका से लॉन्च किया गया. मिसाइल ने टारगेट को एक्युरेटली हिट किया तथा उसके आर्मर को पूरी तरह से तबाह हो गया. यह सिर्फ एक और टेस्ट नहीं था, बल्कि यही वह पल था, जब नाग ने डेवलपमेंट से प्रोडक्शन की ओर कदम बढ़ाया था. मिसाइल का प्रोडक्शन भारत डायनेमिक्स लिमिटेड को और नामिका का प्रोडक्शन ऑर्डनेंस फैक्ट्री मेडक को दिया जाना तय हुआ. लगभग चार दशक पहले शुरू हुई जर्नी अब एक ऑपरेशनल वेपन सिस्टम की दिशा में पहुंच चुकी थी.

फिर आया नाग एमके-2
नाग की पहली जेनरेशन के बाद अगला बड़ा कदम नाग एमके-2 था. यह सिर्फ पुराने मिसाइल को दोबारा टेस्ट करने की कहानी नहीं थी. इसमें पूरा वेपन सिस्टम आगे बढ़ाया गया. इसमें मिसाइल के साथ नया मिसाइल कैरियर भी शामिल था. जनवरी 2025 में पोखरण फील्ड रेंज में नाग एमके-2 के फील्ड इवैल्यूएशन ट्रायल्स किए गए. तीन फील्ड ट्रायल्स के दौरान मिसाइल सिस्टम्स ने अलग-अलग रेंज पर रखे गए टारगेट्स को सक्सेसफुली डिस्ट्रॉय किया. सबसे अहम बात यह थी कि ट्रायल्स में मिनिमम और मैक्सिमम रेंज दोनों पर टारगेट्स को एंगेज किया गया. इसके साथ नाग मिसाइल कैरियर वर्जन-2 का भी फील्ड इवैल्यूएशन हुआ. 13 जनवरी 2025 को मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस ने कहा कि इन ट्रायल्स के साथ पूरा नाग एमके-2 वेपन सिस्टम इंडियन आर्मी में इंडक्शन के लिए रेडी हो गया है.

आखिरी परीक्षण के बाद नाग की रेंज कितनी थी?
2019 के आर्मी यूजर ट्रायल्स के समय मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस ने नाग की ऑपरेशनल रेंज 500 मीटर से 4 किलोमीटर बताई थी. इसे थर्ड-जेनरेशन, फायर-एंड-फॉरगेट एटीजीएम बताया गया था. इसके अलावा इसे डे-एंड-नाइट और ऑल-वेदर कैपेबिलिटी के साथ डेवलप किया गया था. सबसे खास बात यह थी कि इसमें इमेजिंग इंफ्रारेड सीकर था और मिसाइल को लॉक-ऑन-बिफोर-लॉन्च मोड में इस्तेमाल किया जाता था. यानी ऑपरेटर का काम टारगेट को आइडेंटिफाई और लॉक करना था. उसके बाद मिसाइल का गाइडेंस सिस्टम उसे टारगेट तक ले जाने के लिए डिजाइन किया गया था.

नाग की पूरी जर्नी में सबसे कठिन मोड़ कौन-सा था?
डिफेंस एक्‍सपर्ट्स के अनुसार, नाग की कहानी में सबसे कठिन चुनौती केवल मिसाइल को लॉन्‍च नहीं करना था, बल्कि असल चुनौती थी टारगेट को सही तरीके से देखना और पहचानना. क्योंकि एक एंटी-टैंक मिसाइल के सामने बैटलफील्ड कोई साफ लेबोरेटरी नहीं होता. वहां डस्ट है, गर्मी है, अलग-अलग ऑब्जेक्ट्स हैं, कैमोफ्लाज हो सकता है और टारगेट को आखिरी क्षण तक पहचानना पड़ सकता है. इसीलिए आईआईआर सीकर और इमेज-प्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी नाग की पूरी जर्नी में सबसे अहम हिस्सों में से एक थी. 2019 के पोखरण समर ट्रायल्स ने इसी कैपेबिलिटी को वास्तविक डेजर्ट कंडीशंस में परखा. मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस ने बताया था कि मिसाइल ने सीवियर समर डेजर्ट कंडीशंस में 4 किलोमीटर तक टारगेट हिट किया था.



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