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सभी इलाकों की अपनी मान्यताएं और परंपराएं होती हैं. इसके पीछे का लोगों का अपना लॉजिक और महत्व होता है. ऐसी ही एक मान्यता बिहार के मिथिलांचल इलाके में है. यहां मघा नक्षत्र के दौरान गाय-भैंस के दूध से परहेज की पुरानी परंपरा रही है. उस दौर के लोग आज भी इस मान्यता को मानते हैं. इस मान्यता के बारे में समस्तीपुर के रामबाबू कुंवर ने बताया कि उनके परिवार में हुई एक घटना के कारण वे आज भी इस मान्यता का पालन करते हैं.
अमित कुमार/समस्तीपुर: मिथिलांचल क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में आज भी कई ऐसी परंपराएं देखने को मिलती हैं, जिनका पालन लोग पीढ़ियों से करते आ रहे हैं. इन्हीं में एक परंपरा मघा नक्षत्र के दौरान गाय या भैंस के बच्चा देने पर उसके दूध के सेवन से परहेज करने की है. आधुनिक समय में भले ही बहुत से लोग इन मान्यताओं को नजरअंदाज करने लगे हैं, लेकिन कुछ परिवार आज भी इन्हें पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ निभा रहे हैं. इसी परंपरा के पीछे की वजह जानने के लिए लोकल 18 की टीम ने समस्तीपुर के 80 वर्षीय रामबाबू कुंवर से बातचीत की. उन्होंने मुस्कुराते हुए अपने पुराने दिनों को याद किया और बताया कि उनके समय में मघा नक्षत्र में बच्चा देने वाली गाय-भैंस का दूध खाना लोग पसंद नहीं करते थे. उनका कहना है कि आज भले ही लोग इसे उतनी गंभीरता से नहीं लेते हों, लेकिन वह आज भी इस परंपरा का पालन कर रहे हैं.
मघा नक्षत्र में जन्मे बछड़े को देखकर व्यापारी भी पूछते थे सवाल
रामबाबू कुंवर ने बताया कि पहले गांवों में मवेशियों की खरीद-बिक्री के दौरान भी इस परंपरा का खास ध्यान रखा जाता था. जब कोई व्यापारी गाय या भैंस खरीदने आता था और उसे छोटा बच्चा दिखाई देता था, तो वह सबसे पहले पूछता था कि कहीं यह मघा नक्षत्र में तो पैदा नहीं हुआ है. यदि उसे पता चलता कि मवेशी ने मघा नक्षत्र के दौरान बच्चा दिया है, तो कई व्यापारी उसे खरीदने से इनकार कर देते थे. रामबाबू बताते हैं कि उस समय लोग इस मान्यता को लेकर काफी सतर्क रहते थे. यहां तक कि अगर किसी व्यापारी को धोखे से भी बता दिया जाता कि बच्चा मघा नक्षत्र में पैदा हुआ है, तो वह खरीदारी से पीछे हट जाता था. उनके मुताबिक, पहले इस परंपरा का प्रभाव इतना अधिक था कि लोग दूध पीने से लेकर मवेशियों की खरीद-बिक्री तक में इसका ध्यान रखते थे. हालांकि, अब समय के साथ लोगों की सोच और व्यवहार में बदलाव आया है.
चचेरे भाई की मौत से जुड़ी घटना, आज भी नहीं भूल पाए रामबाबू
रामबाबू कुंवर ने इस परंपरा के पीछे अपने परिवार से जुड़ी एक ऐसी घटना साझा की, जिसे याद करते हुए उनका विश्वास आज भी कायम है. उन्होंने बताया कि एक बार उनके घर की मवेशी ने मघा नक्षत्र के दौरान बच्चा दिया था. उसी समय उनके चार साल के चचेरे भाई का निधन हो गया. इस घटना के बाद परिवार के लोगों ने उस मवेशी को तुरंत बेच दिया और मघा नक्षत्र में बच्चा देने वाली गाय-भैंस के दूध से परहेज करने लगे. रामबाबू बताते हैं कि इस घटना ने उनके मन पर गहरी छाप छोड़ी. उनका कहना है कि लोग आज उन्हें समझाते हैं कि अब ऐसी मान्यताओं को नहीं मानना चाहिए, लेकिन उनके सामने जो घटना हुई, उसे वह भुला नहीं पाए हैं. इसी विश्वास के चलते उन्होंने हाल ही में अपनी एक मवेशी को भी बेच दिया, क्योंकि उसने मघा नक्षत्र में बच्चा दिया था. रामबाबू के मुताबिक, अच्छी कीमत मिलने की उम्मीद के बावजूद उन्हें मजबूरी में उसे कम दाम पर बेचना पड़ा.