गब्बर-ठाकुर से जय-वीरू तक… शी जिनपिंग को लेकर क्यों बदल गए ट्रंप के तेवर?
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Donald Trump-Xi Jinping: ट्रंप और जिनपिंग दुनिया के सामने इस बार जय-वीरू की तरह नजर आए. ये नई-नई दोस्ती इसलिए भी खास थी, क्योंकि अब तक दोनों देश दुनिया की नजर में गब्बर और ठाकुर की तरह थे. इस बार तो ट्रंप ने जिनपिंग को सिर्फ सज्जन ही नहीं कहा, बल्कि अपना पक्का दोस्त बताया.
ट्रंप और जिनपिंग अमेरिका में स्टेट डिनर के दौरान (फोटो-रॉयटर्स)
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच कभी गब्बर सिंह और ठाकुर वाला रिश्ता था. जो जय-वीरू की तरह दोस्ती में बदल गया है. तभी तो कुछ दिन पहले तक चीन को पानी पी-पीकर दुश्मन बताने वाले ट्रंप के सुर बदल गए हैं. अब वही ट्रंप चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को अपना करीबी दोस्त कह रहे हैं. ट्रंप में आए इस बदलाव और हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान उनके संबोधन के बाद एक नए राजनीतिक समीकरण की चर्चा तेज हो गई है. एक्सपर्ट का मानना है कि दुनिया धीरे-धीरे एक नए G-2 मॉडल की ओर बढ़ रही है. इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के विश्लेषकों के मुताबिक वैश्विक फैसलों का केंद्र अब संयुक्त राष्ट्र से हटकर वॉशिंगटन बीजिंग तक सिमट रहा है. जहां अमेरिका और चीन खुद बैठकर दुनिया के मसले हल करेंगे.
जिनपिंग की अमेरिका यात्रा के बाद इसके कयास और तेज हो गए हैं. दरअसल संयुक्त राष्ट्र महासभा के लिए न्यूयॉर्क में दुनिया भर के नेता जुटे थे, लेकिन चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग वहां नहीं पहुंचे. वह सीधे वॉशिंगटन राजकीय यात्रा पर पहुंचे. यहां ट्रंप खुद प्रोटोकॉल तोड़कर एयरपोर्ट पर उनका स्वागत करने पहुंच गए थे. विशेषज्ञों के मुताबिक यही सबसे बड़ा संकेत था कि वैश्विक राजनीति का केंद्र धीरे-धीरे संयुक्त राष्ट्र से हटकर वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच बनते रिश्तों की ओर खिसक रहा है. इससे पहले यूएनजीए में अपने संबोधन में ट्रंप ने ग्लोबलिस्ट नौकरशाहों पर निशाना साधा था. वहीं जिनपिंग के स्वागत में सैन्य फ्लाईपास्ट से लेकर शानदार राजकीय भोज का आयोजन किया था.
G2 मॉडल आखिर क्या है?
ट्रंप के G2 मॉडल का मतलब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय संधियों के बजाय आपसी समझौतों के जरिए वैश्विक स्थिरता बनाए रख सकती हैं. यूएनजीए सप्ताह के दौरान ट्रंप-शी बैठक में इस मॉडल की कई झलकियां दिखी थीं. दोनों नेताओं ने व्यापक वैश्विक व्यापार संस्थाओं को दरकिनार कर साउथ कोरिया में हुए द्विपक्षीय व्यापार और टैरिफ समझौते को बढ़ाने पर सहमति जताई.
अमेरिका और चीन एआई से जुड़े जोखिमों को कम करने के लिए एक दूसरे से सूचना साझा करने और सैन्य हॉटलाइटन जैसा सिस्टम विकसित करने पर भी बातचीत कर रहे हैं. रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमी ट्रेड एंड इंडस्ट्री द्वारा किए गए एक रिसर्च के मुताबिक ट्रंप का G2 मॉडल पहले प्रस्तुत किए गए G2 विचारों से अलग है. खासतौर से ट्रंप का G2 पूरी तरह से लेनदेन आधारित है, जिसमें द्विपक्षीय संबंधों की बजाय नेताओं में व्यक्तिगत संबंधों को ज्यादा महत्व दिया जाता है.
ट्रंप और जिनपिंग के बीच इस बार जय-वीरू की केमेस्ट्री नजर आई (फोटो-रॉयटर्स)
ट्रंप की भाषा कैसे बदली?
ट्रंप की चीन को लेकर राय हमेशा ऐसी नहीं थी. कुछ समय पहले तक वह चीन को अमेरिका की आर्थिक समस्याओं का सबसे बड़ा कारण बता रहे थे. 2012 में ट्रंप ने सोशल मीडिया पर चीन की कार्यशैली को झूठ बोलो, धोखा दो और चोरी करो वाला बताया था. 2016 के चुनाव अभियान में उन्होंने चीन को दुश्मन बताया उस पर अमेरिकी नौकरियां छीनने का आरोप लगाया था. इससे पहले भी ट्रंप कई बार ये कहते रहे हैं कि दुनिया में अमेरिका का सबसे ज्यादा फायदा चीन ने उठाया है, और किसी देश ने ऐसा नहीं किया.
चीन को बताया था झूठा और चोरी करने वाला
ट्रंंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ और फेंटेनाइल को लेकर तनाव बढ़ा. 2025 में दोनों देशों के बीच टैरिफ वार शुरू हुआ. हालांकि उस समय ट्रंप ने कहा था कि इसके लिए मैं राष्ट्रपति शी को दोष नहीं देता. मैं उन्हें पसंद करता हूं और वे मुझे पसंद करते हैं. इसके बाद दोनों देशों में तनाव कुछ और व्यापार समझौते आगे बढ़े. अब वही ट्रंप शी जिनपिंग को अपना दोस्त बता रहे हैं.
ट्रंप की रणनीति आखिर क्या है?
ट्रंप में आए इस बदलाव पर अलजजीरा समेत अन्य एनालिस्ट का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति विदेश नीति को व्यक्तिगत रिश्तों के नजरिए से देखते हैं. खासतौर से जब एआई, ताइवान, खनिज और वैश्विक संघर्ष के मुद्दे पर अमेरिका और चीन में मतभेद हैं, तब ट्रंप का अचानक बदल जाना व्यक्तिगत भरोसा बढ़ाने का प्रयास है. यही वजह है कि ट्रंप लगातार चीन और खासतौर से जिनपिंग को लेकर अपनी सार्वजनिक भाषा बदल रहे हैं.