Manmohan Singh Birthday Special By Rasheed Kidwai: देश आज 26 सितंबर को पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की 94वीं जयंती मना रहा है. तो ऐसे में देश के महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवारों में से एक गांधी परिवार के साथ उनके संबंधों की पड़ताल दिलचस्प हो जाती है. गांधी परिवार के साथ मनमोहन सिंह के रिश्ते खट्ठे-मीठे रहे. जहां राजीव गांधी ने उन्हें महज एक नौकरशाह के रूप में देखा, तो वहीं सोनिया की नजरों में वे ऐसे स्कॉलर थे, जिनमें देश चलाने की भी पर्याप्त कुव्वत थी. 1985 की बात है, जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने ही थे. मनमोहन सिंह तब योजना आयोग के उपाध्यक्ष थे. प्रधानमंत्री होने के नाते राजीव गांधी इसके पदेन अध्यक्ष थे. उस समय राजीव ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाले योजना आयोग को ऐसे ‘जोकरों का गिरोह’ करार दिया था, जो विकास के किसी भी नए विचार को रद्द कर देता है. मनमोहन सिंह ने राजीव से ऐसे बयान की अपेक्षा नहीं की थी. इससे उन्हें काफी ठेस पहुंची.
पूर्व गृह सचिव सीजी सोमैया की आत्मकथा ‘द ऑनेस्ट ऑलवेज स्टैंड अलोन’ के अनुसार, राजीव गांधी के इस बयान से मनमोहन सिंह इतने दुखी हो गए कि उन्होंने योजना आयोग से इस्तीफा देने का मन बना लिया. सोमैया ने अपनी किताब में लिखा, ‘मैं एक घंटे उनके पास बैठा और उन्हें समझाते रहा कि इस तरह का अतिवादी कदम न उठाएं. मैंने समझाया कि हमारे प्रधानमंत्री अभी युवा और अनुभवहीन हैं. लिहाजा, हमारा यह कर्तव्य है कि हम उन्हें वास्तविकता बताएं, न कि उन्हें छोड़कर चल दें. अंततः मैंने उन्हें जल्दबाजी में कोई कदम न उठाने से मना लिया.’ राजीव गांधी के कार्यकाल में मनमोहन सिंह इसके बाद भी लगातार हाशिये पर ही रहे. बाद में उन्हें और भी लो-प्रोफाइल जिम्मेदारी देकर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग में भेज दिया गया.
मनमोहन सिंह के प्रति सोनिया की राय अपने पति से एकदम उलट थी. सोनिया को सबसे ज्यादा अगर किसी ने प्रभावित किया तो वे आर्थिक सुधारों के प्रवर्तक डॉ. मनमोहन सिंह ही थे. उन पर मनमोहन सिंह का प्रभाव इतना गहरा था कि उन्होंने मध्य मार्ग पर चलने वाले ए.के. अंटोनी, मणिशंकर अय्यर, अर्जुन सिंह और वामपंथी विचारों वाले कांग्रेसियों को भी दरकिनार कर दिया. 2004 में जब प्रधानमंत्री के पद के लिए किसी नाम के चयन की बारी आई तो सोनिया ने डॉ. मनमोहन सिंह के नाम पर ही मोहर लगाई. अधिकांश लोग यही मानते रहे कि सोनिया ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री इसलिए बनवाया, ताकि वे उनके जरिए सत्ता पर परोक्ष रूप से नियंत्रण बनाए रख सके. जबकि सच्चाई इससे कोसों दूर रही. सोनिया ने उनके रोजमर्रा के प्रशासनिक कामकाज में शायद ही कभी दखल दिया. मनमोहन और सोनिया के रिश्ते इतने सुलझे हुए रहे कि उनके बीच न कभी कोई बॉसगीरी आई और न विद्वत्ता का अहम. सोनिया गांधी व मनमोहन सिंह के बीच आपसी विश्वास व तालमेल से ही 2004 से 2014 तक यूपीए सरकार चल पाई.
जब चंद्रशेखर ने उन्हें मशवरे के लिए बुलवाया…
राजीव गांधी ने भले ही मनमोहन सिंह को हाशिये पर कर रखा था, लेकिन नवंबर 1990 में प्रधानमंत्री बने चंद्रशेखर आर्थिक मामलों में मनमोहन सिंह की विशेषज्ञता से अच्छी तरह वाकिफ थे. अपने प्रधानमंत्रित्व काल के पहले व एकमात्र (अंतरिम) बजट को प्रस्तुत करने से पहले उन्होंने डॉ. मनमोहन सिंह की राय भी ली थी, वह भी तब, जबकि कुछ नौकरशाह बजट की गोपनीयता के मद्देनजर इस पहल से सहमत नहीं थे.
वरिष्ठ आईएएस अफसर पीके लाहिरी, जो उस समय राजस्व सचिव थे, ने अपनी संस्मरणात्मक किताब ‘ए टाइड इन द अफेयर्स ऑफ मैनः ए पब्लिक सर्वेंट रिमेम्बर’ में लिखा, ‘मुझे याद है, उस दिन रात के कोई 11 बज रहे होंगे. वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा के साथ हम सचिवगण साउथ एवेन्यू स्थित प्रधानमंत्री कार्यालय में अस्थाई रूप से तैयार किए गए एक कमरे में मौजूद थे.’ लाहिरी के मुताबिक, वे तब अचंभित रह गए जब चंद्रशेखर ने अचानक कहा कि बजट में किए गए प्रावधानों के बाबत वे डॉ. मनमोहन सिंह से भी मशवरा करना चाहते हैं. वहां मौजूद नौकरशाह इससे असहज हो उठे, क्योंकि बजट में किए गए प्रावधान गोपनीय रखे जाते हैं तथा वित्त मंत्रालय के अति विश्वस्त लोगों के बीच ही इन पर विमर्श किया जाता है. लेकिन चंद्रशेखर ने इस परिपाटी को नजरअंदाज कर सीधे मनमोहन सिंह को फोन लगाकर उनसे बजट संबंधी इस बैठक में आने का आग्रह किया. इसके लिए प्रधानमंत्री ने उन्हें लेने के लिए उनके घर एक कार भी भिजवाई. इस घटना के चंद महीनों बाद ही पीवी नरसिंह राव की सरकार में मनमोहन सिंह वित्त मंत्री बन गए थे.
और वो ‘मूर्खता’ अंतत: बुद्धिमानी साबित हुई…
मनमोहन सिंह अपनी शिक्षा पूरी कर प्रख्यात अर्थशास्त्री रॉल प्रेबिश के अधीन संयुक्त राष्ट्र में काम कर रहे थे. उसी दौरान उन्हें देहली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में लेक्चररशिप का ऑफर मिल गया. सिंह ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया तथा 1969 में उन्होंने भारत लौटने का फैसला कर लिया. इस पर डॉ. प्रेबिश को आश्चर्य हुआ कि मनमोहन सिंह जैसा विद्वान अर्थशास्त्री संयुक्त राष्ट्र की प्रतिष्ठित नौकरी छोड़कर आखिर भारत क्यों लौट रहा है. उन्होंने मनमोहन सिंह से कहा भी, ‘तुम मूर्खता कर रहे हो,’ मगर पता नहीं क्या सोचकर यह भी साथ में जोड़ दिया, ‘मूर्खता करना भी कभी-कभी बुद्धिमानी होती है!’ इसे मनमोहन सिंह का भाग्य कहें या कर्म का लेखा-जोखा कि वो कथित ‘मूर्खता’ अंतत: बुद्धिमानी ही साबित हुई.
वित्त मंत्री के कार्यकाल में उनके पास था केवल एक सरकारी वाहन…
मनमोहन सिंह जिंदगी भर सादगी पसंद इंसान रहे. उन्होंने सरकारी पद के साथ मिलने वाले तामझाम का कभी मोह नहीं किया. ऐसा ही एक वाकया उनके वित्त मंत्री काल का है. मनमोहन सिंह को फिक्की द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बतौर वक्ता भाग लेना था. इस कार्यक्रम में उनकी धर्मपत्नी गुरशरण कौर को भी आमंत्रित किया गया था. मनमोहन सिंह तो सीधे अपने कार्यालय से कार्यक्रम स्थल के लिए रवाना हो गए. गुरशरण कौर को लेने एक उप सचिव उनके घर पहुंचे. इस अधिकारी को लगा था कि भारत के वित्त मंत्री के घर पर तो कई सरकारी वाहन होंगे, जिसमें से किसी एक से वह वित्त मंत्री की पत्नी को आयोजन स्थल तक ले जाएंगे. लेकिन घर पहुंचकर वे आश्चर्यचकित रह गए, जब वित्त मंत्री की धर्मपत्नी ने बताया कि मंत्रीजी ने अपने पास केवल एक ही सरकारी वाहन रखा है, जिसका उपयोग वे स्वयं करते हैं. इससे सरकारी अधिकारी सोच में पड़ गए. लेकिन गुरशरण कौर ने मुस्काते हुए अधिकारी के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वे चाहें तो उनकी मारुति 800 कार को ड्राइव कर उन्हें आयोजन स्थल तक पहुंचा सकते हैं.