ढाका: बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से वहां के राजनीतिक और सामाजिक हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं. पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान की नई सरकार में जमात-ए-इस्लामी और कट्टरपंथी ताकतों का प्रभाव काफी बढ़ चुका है. एक तरफ जहां बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर लगातार हमले हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ तारिक रहमान की सरकार भारत विरोधी कदम उठाकर चीन और पाकिस्तान से नजदीकियां बढ़ा रही है. ढाका के बिगड़ैल रवैये पर भारत की पूर्व उच्चायुक्त वीणा सीकरी ने अंदर की बात बताई है. उन्होंने फर्स्टपोस्ट के साथ बातचीत के दौरान चेतावनी देते हुए समझाया है कि तारिक रहमान किस तरह आग से खेल रहे हैं?
सवाल 1: बांग्लादेश में इस वक्त जिस तरह जमात-ए-इस्लामी और कट्टरपंथी हावी हो रहे हैं, क्या बांग्लादेश, ‘पाकिस्तान 2.0’ बनने की ओर बढ़ रहा है?
जवाब: सबसे पहले हमें 2024 में बांग्लादेश में हुए सत्ता परिवर्तन की सच्चाई को समझना होगा. मेरे विचार में ये सिर्फ छात्रों का कोई अचानक हुआ आंदोलन नहीं था. ये बहुत ही सोच-समझकर तैयार किया गया सत्ता बदलने का ऑपरेशन था. अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार बने मोहम्मद यूनुस ने खुद माना था कि ये आंदोलन खुद नहीं उठा था, बल्कि पूरी प्लानिंग से चलाया गया था.
वीणा ने आगे कहा कि जब आपको ये सच्चाई समझ आती है, तो यूनुस सरकार द्वारा उठाए गए कदमों पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं. खासकर जिस तरह शेख हसीना को देश छोड़ने पर मजबूर किया गया और अवामी लीग पर बैन लगाया गया. सच तो ये है कि अवामी लीग का बांग्लादेश में आज भी एक बड़ा राजनीतिक जनाधार है. अगर आप देश की एक मुख्य पार्टी को ही चुनाव लड़ने से रोक देंगे, तो उस चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजमी है. उदाहरण के लिए, अगर अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन डेमोक्रेटिक पार्टी पर बैन लगा दे, तो क्या उस चुनाव को कोई सही मानेगा? दुख की बात है कि पश्चिमी देश इस मुद्दे पर पूरी तरह खामोश हैं.
उन्होंने कहा कि ‘अब आपके सवाल पर आते हैं कि क्या बांग्लादेश ‘पाकिस्तान 2.0′ बन रहा है? इसमें कोई शक नहीं कि जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरपंथी गुटों का दबदबा पिछले दो सालों में बहुत बढ़ गया है. यूनुस सरकार उन्हें खुला समर्थन दे रही थी और अब तारिक रहमान की सरकार भी इन कट्टरपंथियों को मनमानी करने दे रही है. तारिक रहमान को ये समझना होगा कि वे आग से खेल रहे हैं. हालांकि, मुझे नहीं लगता कि बांग्लादेश की आम जनता या महिलाएं कोई इस्लामिक स्टेट या खिलाफत चाहती हैं. आम बांग्लादेशी सिर्फ शांति, आर्थिक तरक्की और स्थिरता चाहता है, जो मौजूदा सरकार नहीं दे पा रही है’.
सवाल 2: तारिक रहमान खुले तौर पर भारत विरोधी रुख अपना रहे हैं और चीन-पाकिस्तान के करीब जा रहे हैं. आप इसे किस तरह देखती हैं?
जवाब: भारत ने बांग्लादेश के साथ रिश्तों में हमेशा बहुत संयम और सब्र दिखाया है. हमने बार-बार कहा है कि हम अच्छे रिश्ते चाहते हैं. लेकिन बांग्लादेश की तरफ से हमें वैसा जवाब नहीं मिल रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 फरवरी 2026 को तारिक रहमान के शपथ लेने के तुरंत बाद उन्हें भारत आने का व्यक्तिगत न्योता भेजा था. ये पत्र लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने खुद सौंपा था. हमें ये आश्वासन भी मिला था कि प्रधानमंत्री बनने के बाद तारिक रहमान की पहली विदेश यात्रा भारत की होगी. लेकिन उस न्योते का कोई औपचारिक जवाब नहीं दिया गया. इसके बाद अगस्त की शुरुआत में नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन के लिए फिर से न्योता भेजा गया. लेकिन बांग्लादेश ने खुलकर स्वीकार करने के बजाय शर्त रख दी कि भारत पहले अनुकूल माहौल बनाए और इसे शेख हसीना की भारत में मौजूदगी से जोड़ दिया.
वीणा ने कहा कि ‘ढाका में भारतीय उच्चायुक्त के साथ जैसा बर्ताव किया गया, वो भी चिंताजनक है. हमारे उच्चायुक्त को अपने दस्तावेज सौंपने के लिए लगभग तीन हफ्ते तक इंतजार कराया गया. आप भारत सरकार के प्रतिनिधि के साथ ऐसा उपेक्षापूर्ण बर्ताव करके रिश्तों को सुधारने का दावा नहीं कर सकते’.
पूर्व उच्चायुक्त ने बताया ‘मुझे याद है जब मैं 2003 से 2006 के बीच ढाका में भारत की उच्चायुक्त थी, तब तारिक रहमान की मां खालिदा जिया प्रधानमंत्री थीं. उस समय भी हमारे बीच कई मुद्दों पर मतभेद थे, लेकिन खालिदा जिया हमेशा शिष्ट और मिलने के लिए तैयार रहती थीं. आज के हालात उससे बिल्कुल अलग हैं. इसके अलावा, तारिक रहमान ने चीन जाकर मोंगला पोर्ट और तीस्ता नदी जैसे प्रोजेक्ट्स पर आगे बढ़ने का फैसला किया है. ये प्रोजेक्ट्स भारत की सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं. शेख हसीना ने हमेशा भारत की सुरक्षा चिंताओं का सम्मान किया था, लेकिन मौजूदा सरकार ने उस लाल रेखा को पार कर दिया है’.
पूर्व राजनयिक वीणा सीकरी, जिन्होंने दिसंबर 2003 से नवंबर 2006 के बीच बांग्लादेश में भारत की उच्चायुक्त के तौर पर काम किया (Facebook: Unofficial: Diplomats of India)
सवाल 3: कुछ लोगों का कहना है कि भारत को बांग्लादेश के साथ थोड़ा सख्त होना चाहिए था. क्या भारत सरकार तारिक रहमान पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान है?
जवाब: मैं इसे भारत की ‘कमजोरी’ कहने के बजाय ‘रणनीतिक धैर्य’ कहूंगी. जब से तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बीएनपी सरकार सत्ता में आई है, भारत ने दोस्ती का हाथ आगे बढ़ाया है. भारत ने बांग्लादेश की आम जनता के फायदे के लिए जरूरी सामानों की सप्लाई चेन को कभी नहीं रोका. भारत और बांग्लादेश लगभग 4,000 किलोमीटर लंबी जमीनी सीमा साझा करते हैं. बांग्लादेश के अंदरूनी हालात का सीधा असर हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ता है. इसलिए भारत हमेशा बातचीत के जरिए शांतिपूर्ण रास्ता निकालना चाहता है. लेकिन अगर बांग्लादेश लगातार रिश्तों को नुकसान पहुंचाएगा, तो ये सिलसिला लंबे समय तक नहीं चल सकता.
सवाल 4: आलोचकों का मानना है कि भारत ने अपनी सारी उम्मीदें सिर्फ शेख हसीना पर टिकाकर गलती की. आप इस पर क्या कहेंगी?
जवाब: ये कहना गलत होगा कि भारत सिर्फ किसी एक इंसान का समर्थन कर रहा था. भारत का मूल हित बांग्लादेश देश और वहां के लोगों के साथ जुड़ा है. भारत हमेशा सत्ता में मौजूद सरकार के साथ काम करता है. जब शेख हसीना प्रधानमंत्री थीं, तब दोनों देशों के रिश्ते काफी आगे बढ़े क्योंकि उन्होंने भारत की सुरक्षा चिंताओं का पूरा ध्यान रखा. भारत आज भी तारिक रहमान की सरकार के साथ सहयोग करने को तैयार है. सवाल ये है कि क्या बांग्लादेश का नई सरकार, भारत की सुरक्षा चिंताओं का सम्मान करते हुए रिश्ता बनाने के लिए तैयार है? हाल ही में तारिक रहमान सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ने शेख हसीना और अवामी लीग को ‘फासिस्ट’ कहा, जो उनकी लोकतांत्रिक सोच पर सवाल उठाता है.
सवाल 5: शेख हसीना ने कहा है कि वो दिसंबर में बांग्लादेश वापस लौटना चाहती हैं. क्या मौजूदा माहौल में ये संभव है?
जवाब: शेख हसीना ने खुद सार्वजनिक रूप से कहा है कि वो बांग्लादेश वापस लौटकर कानूनी प्रक्रिया का सामना करना चाहती हैं और अपने खिलाफ आई मौत की सजा के फैसले को अदालत में चुनौती देना चाहती हैं. मुझे लगता है कि वो वापस जाने के लिए पूरी तरह सीरियस हैं. जब शेख हसीना खुद देश लौटकर कानून का सामना करने को तैयार हैं, तो बांग्लादेश सरकार का बार-बार उनके प्रत्यर्पण की मांग करना बेमतलब लगता है. वो दिसंबर में वापस लौट पाती हैं या नहीं, ये उस समय के राजनीतिक और सुरक्षा माहौल पर निर्भर करेगा, लेकिन उनकी मंशा साफ है.
सवाल 6: आप ढाका में रह चुकी हैं और बांग्लादेश को करीब से समझती हैं. वहां हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर खतरा कितना गंभीर है?
जवाब: बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों की स्थिति बेहद चिंताजनक है. ये वहां की लगभग 9 प्रतिशत आबादी के अस्तित्व का सवाल बन चुका है, जिसमें हिंदू, ईसाई, बौद्ध और अहमदी शामिल हैं. पुरानी सरकारों के दौरान भी सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं होती थीं, लेकिन उन्हें जल्द ही काबू में कर लिया जाता था. लेकिन पिछले दो सालों में अल्पसंख्यकों पर जिस तरह बार-बार, भीषण और क्रूर हमले हुए हैं, वो डराने वाले हैं. अल्पसंख्यकों को उनकी नौकरियों से निकाला जा रहा है और देश छोड़ने की धमकियां दी जा रही हैं. ऐसा लगता है कि हमला करने वाले कट्टरपंथियों को वहां के प्रशासन का समर्थन मिला हुआ है.
वीणा ने कहा कि ‘यूनुस सरकार के समय भी यही हुआ और अब तारिक रहमान के दौर में भी ये जारी है. चिन्मय दास जैसे हिंदू नेता को पिछले दो सालों से जेल में बंद रखा गया है, जो बेहद दुखद उदाहरण है. वहां का मीडिया पूरी तरह सरकार के दबाव में है. सैकड़ों वरिष्ठ पत्रकार बिना किसी ट्रायल या FIR के दो सालों से जेल में हैं, जिसकी वजह से अल्पसंख्यकों पर हो रहे जुल्म की खबरें दबा दी जाती हैं. जब भारतीय मीडिया इन घटनाओं को दिखाता है, तो उसे ‘फेक न्यूज’ कहकर खारिज कर दिया जाता है’.
उन्होंने आगे बताया कि ‘अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सिर्फ भारत-बांग्लादेश का विवाद नहीं है, ये बुनियादी मानव अधिकार का मुद्दा है. भारत को इस मुद्दे को बांग्लादेश सरकार के साथ-साथ पश्चिमी देशों के सामने भी कूटनीतिक बातचीत में पूरी मजबूती से उठाते रहना होगा’.