₹10 लाख की FD, 30 लाख की प्रॉपर्टी, इनकम टैक्स की नजर में रहते हैं ये 10 बड़े ट्रांजैक्शन

₹10 लाख की FD, 30 लाख की प्रॉपर्टी, इनकम टैक्स की नजर में रहते हैं ये 10 बड़े ट्रांजैक्शन


अगर आपको लगता है कि इनकम टैक्स विभाग को सिर्फ ITR में बताई गई आपकी कमाई की जानकारी होती है, तो ऐसा नहीं है. बैंक, म्यूचुअल फंड, कंपनियां, पोस्ट ऑफिस और दूसरी रिपोर्टिंग संस्थाएं कुछ बड़े फाइनेंशियल लेन-देन की जानकारी टैक्स विभाग को देती हैं. इसे Statement of Financial Transactions (SFT) कहा जाता है. इसकी जानकारी आपके Annual Information Statement (AIS) में भी दिखाई दे सकती है.

SFT में किसी लेन-देन का दिखना अपने आप में गलत काम या टैक्स चोरी नहीं माना जाता. इसका मकसद बड़े लेन-देन की जानकारी टैक्स विभाग तक पहुंचाना है. परेशानी तब हो सकती है जब आपकी ट्रांजेक्शन आपकी घोषित आय और दूसरे वित्तीय रिकॉर्ड से मेल न खाए. इसलिए ITR भरने से पहले AIS चेक करना जरूरी है.

बैंक खाते में कैश जमा और निकासी

बैंकिंग से जुड़े कई बड़े लेन-देन SFT के तहत रिपोर्ट किए जाते हैं. सेविंग अकाउंट में वित्त वर्ष के दौरान ₹10 लाख या उससे ज्यादा कैश जमा होने पर इसकी जानकारी रिपोर्ट की जा सकती है. वहीं, एक या अधिक करंट अकाउंट में सालभर में ₹50 लाख या उससे ज्यादा कैश जमा या निकासी भी रिपोर्टिंग के दायरे में आती है. बैंक ड्राफ्ट, पे ऑर्डर या बैंकर चेक को ₹10 लाख या उससे ज्यादा कैश देकर खरीदने की जानकारी भी रिपोर्ट हो सकती है. इसी तरह RBI के प्रीपेड इंस्ट्रूमेंट की बड़ी कैश खरीद भी रिपोर्टिंग के दायरे में आती है. कई मामलों में लीमिट एक अकेले लेन-देन की नहीं, बल्कि पूरे वित्त वर्ष में हुए संबंधित लेन-देन के कुल अमाउंट पर देखी जाती है.

क्रेडिट कार्ड और FD पर भी नजर

क्रेडिट कार्ड से जुड़े भुगतान भी SFT में रिपोर्ट हो सकते हैं. अगर किसी फाइनेंशियल ईयर में क्रेडिट कार्ड बिल का ₹1 लाख या उससे ज्यादा भुगतान कैश में किया गया है, तो इसकी जानकारी रिपोर्ट की जा सकती है. शेयर बायबैक में भी 10 लाख रुपये की लीमिट है. या उससे ज्यादा के कुल क्रेडिट कार्ड भुगतान पर भी रिपोर्टिंग होती है.

इसी तरह एक वित्त वर्ष में ₹10 लाख या उससे ज्यादा की FD या टाइम डिपॉजिट करने पर बैंक, पोस्ट ऑफिस आदि रिपोर्टिंग कर सकते हैं. हालांकि, पुराने टाइम डिपॉजिट के सिर्फ रिन्यू होने को नियम में अलग रखा गया है.

3. शेयर, म्यूचुअल फंड और बॉन्ड में निवेश

निवेश से जुड़े बड़े लेन-देन भी टैक्स विभाग की जानकारी में पहुंच सकते हैं. वित्त वर्ष में ₹10 लाख या उससे ज्यादा के शेयरों में निवेश, शेयर एप्लीकेशन मनी, या ₹10 लाख या उससे ज्यादा के बॉन्ड/डिबेंचर से जुड़े लेन-देन रिपोर्ट किए जा सकते हैं.

म्यूचुअल फंड में भी अगर एक या कई स्कीम में कुल ₹10 लाख या उससे ज्यादा का निवेश किया जाता है, तो यह SFT में आ सकता है. इसके अलावा किसी कंपनी के शेयरों के ₹10 लाख या उससे ज्यादा के बायबैक की जानकारी भी रिपोर्टिंग के दायरे में हो सकती है.

4. प्रॉपर्टी और विदेश से जुड़े खर्च

प्रॉपर्टी खरीदने या बेचने से जुड़े बड़े लेन-देन पर भी रिपोर्टिंग होती है. ₹30 लाख या उससे ज्यादा कीमत की जमीन, मकान या फ्लैट की खरीद-बिक्री SFT के दायरे में आ सकती है. कुछ मामलों में स्टांप वैल्यू भी अहम होती है. फॉरेन करेंसी से जुड़े बड़े लेन-देन भी रिपोर्ट हो सकते हैं. इसमें ₹10 लाख या उससे ज्यादा की निर्धारित विदेशी मुद्रा खरीद, फॉरेक्स कार्ड में रकम डालना और विदेश में कार्ड, ट्रैवलर्स चेक या ड्राफ्ट के जरिए बड़ी रकम खर्च करना शामिल हो सकता है.

5. SFT में नाम आने पर क्या नोटिस आएगा?

सबसे जरूरी बात यह है कि SFT में ट्रांजेक्शन रिपोर्ट होने का मतलब सीधे Income Tax Notice आना नहीं है. AIS में SFT की जानकारी इसलिए दिखाई जाती है ताकि टैक्सपेयर अपनी वित्तीय जानकारी को जांच सके. आयकर विभाग के मुताबिक AIS में SFT के साथ TDS/TCS, टैक्स भुगतान और दूसरी वित्तीय जानकारी भी दिखाई जाती है.

मान लीजिए आपकी ITR में आय ₹8 लाख है, लेकिन बैंक खाते में ₹15 लाख कैश जमा हुआ. ऐसे मामले में पैसे के स्रोत को लेकर सवाल उठ सकता है. लेकिन अगर यह रकम पुरानी FD की मैच्योरिटी, संपत्ति बेचने या किसी अन्य वैध सोर्स से मिली है और आपके पास उसका रिकॉर्ड है, तो उसका उचित स्पष्टीकरण दिया जा सकता है.  इसलिए बड़ी रकम का लेन-देन करना अपने आप में गलत नहीं है. जरूरी है कि पैसे का सोर्स स्पष्ट हो, रिकॉर्ड सुरक्षित रखें और ITR भरने से पहले AIS में SFT की जानकारी जरूर मिलाएं. AIS में गलत जानकारी दिखने पर टैक्सपेयर उसमें ऑनलाइन फीडबैक भी दे सकता है.



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