श्राद्ध पक्ष में गूंजे निमाड़ी लोकगीत, गोबर के मांडनों से महकी दीवारें, जानें 16 दिन के संझा पर्व की अनोखी परंपरा

श्राद्ध पक्ष में गूंजे निमाड़ी लोकगीत, गोबर के मांडनों से महकी दीवारें, जानें 16 दिन के संझा पर्व की अनोखी परंपरा


Sanjha Festival: श्राद्ध पक्ष शुरू होते ही निमाड़ क्षेत्र में संझा लोकपर्व भी आरंभ हो जाता है. ग्रामीण अंचल में संझा पर्व के दौरान घरों की दीवारों पर गोबर से बने मांडने, फूल-पत्तियों की सजावट और पारंपरिक निमाड़ी गीत इस लोकपर्व की खास पहचान हैं. 16 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में कुंवारी कन्याएं हर दिन अपनी सखियों के साथ संझा माता (गोरी) की आराधना करती हैं. इस बार यह पर्व 26 सितंबर से आरम्भ हो रहा है.

‘छोटी सी गाड़ी लुढ़कती जाय’, ‘काजल टिकी लेओ भाई’, ‘संजा बईन का लाड़ा जी, लुगड़ो लाया जाड़ा जी’ जैसे पारंपरिक निमाड़ी गीतों के मधुर स्वर शाम होते गूंजने लगते है. बालिकाएं एक-दूसरे के घर जाकर यह गीत गाती हैं और हास परिहास करती है. इसके साथ ही दीवारों पर गोबर से देवी देवताओं सहित चांद, सूरज की अलग-अलग आकृतियां बनाई जाती हैं और उन्हें फूल-पत्तियों से सजाया जाता है.

16 दिनों तक चलती है परंपरा
निमाड़ में संझा लोकपर्व भाद्रपद माह की पूर्णिमा से पितृ मोक्ष अमावस्या तक मनाया जाता है. हर दिन मांडने में अलग-अलग आकृतियां बनाई जाती हैं. इनमें चांद, सूरज, सितारे, ऊंट, घोड़े, हाथी, गुड्डा-गुड़िया और भगवान गणेश, शिव-पार्वती सहित अन्य देवी-देवताओं की आकृतियां शामिल होती हैं. बालिकाएं इन आकृतियों को सजाने के साथ गीत गाकर संझा माता आराधना करती हैं.

संस्कारों की पाठशाला है लोकपर्व
आचार्य पंडित पंकज मेहता बताते है कि, संझा निमाड़ की पुरानी लोक कला है, जो एक तरह से संस्कारों की पाठशाला भी है. इसमें बाल्यावस्था में ही बालिकाओं को घर गृहस्थी का ज्ञान प्राप्त होता है. विवाह के बाद गृहस्थ जीवन में प्रवेश के बाद अपने घर को कैसे संवारना, हमारे आसपास मौजूद छोटी-छोटी चीजों का सदुपयोग, तीज-त्यौहारों से जुड़े रहना एवं उन्हें सही ढंग से मनाने की सीख यही से मिलती है.

गोरा की सखी मानती है बालिकाएं
वे बताते है कि, माता गोरी ने शिव को पाने के लिए बचपन से आराधना प्रारंभ कर दी थी. खेलकूद के दौरान सखियां गोरी के साथ हास परिहास करती और शाम होते ही कहने लगती की “संझा तू थारा घरे जा, नी तो थारी माय मारेगी,” इसके पीछे भाव यह होता था कि अंधेरा होने के बाद बाहर नहीं घूमना चाहिए. जंगली जानवरों का खतरा रहता है. ठीक उसी प्रकार अब इस लोकपर्व के दौरान बालिकाएं माता गौरी को अपनी सखी मानकर उनके साथ खेलती हैं.  इसे देवी भगवती की बाल रूप में उपासना का पर्व भी माना जाता है.

प्रसाद के साथ पूछी जाती हैं पहेलियां
संझा पर्व की एक खास परंपरा प्रसाद और पहेलियों से भी जुड़ी है. गीत गाने के बाद एक बालिका बंद डिब्बे में प्रसाद लेकर आती है. प्रसाद बांटते समय दूसरी बालिकाओं से पहेलियां पूछी जाती हैं. उत्तर नहीं बता पाने पर उसे मजाक में ‘अक्कल फूटी’ कहा जाता है अर्थात यह मान लेना कि उत्तर ज्ञात नहीं है और बाद में सही जवाब बताया जाता है. इससे पर्व में मनोरंजन और आपसी मेलजोल भी बना रहता है.

दरवाजे पर देवी की आकृति का खास महत्व
तरुणा तंवर बताती है कि, संझा पर्व में घर के प्रवेश द्वार पर देवी की आकृति बनाने की परंपरा विशेष महत्व रखती है. इससे जुड़ी मान्यता महाभारत काल से जोड़ी जाती है. कहा जाता है कि संजा बाई यानी माता पार्वती विवाह के बाद पहली बार मायके आई थीं और उनका स्वागत घर के दरवाजे पर किया गया था. इसी वजह से संझा पर्व में देवी की आकृति प्रवेश द्वार पर बनाई जाती है और उनका पूजन किया जाता है.



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