लखनऊ: यूपी चुनाव 2027 को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच होने वाले गठबंधन की चर्चा जोरों पर है. एक तरफ सहारनपुर से कांग्रेस के सांसद इमरान मसूद समाजवादी पार्टी पर हमलावर हैं. वहीं सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने गुरुवार को राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र से पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसख्ंयक) रथ यात्रा शुरू की. इसके साथ ही दोनों दलों के बीच सीट शेयरिंग को लेकर खींचतान बढ़ने की बात कही जा रही है. हालांकि अखिलेश यादव की ओर से अमेठी की धरती ये दोहराया जाना कि सीट शेयरिंग का फॉर्मूला केवल जीत का होगा. उनके इस बयान से यूपी कांग्रेस के कई नेता खफा बताए जा रहे हैं.
दूसरी तरफ सत्ताधारी बीजेपी को समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन पर बोलने का बैठे बिठाए मौका मिल गया है. बीजेपी के तमाम नेता टीवी चैनलों से लेकर जनसभाओं में लगातार यह बात दोहरा रहे हैं कि कांग्रेस विरोध में जिस समाजवादी पार्टी का निर्माण हुआ आज अखिलेश यादव उसी कांग्रेस के साथ गलबहिंया कर रहे हैं. ऐसे में नये जमाने के वोटरों के सामने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के रिश्तों को लेकर कंफ्यूजन पैदा हो रहा है. तो चलिए ज्यादा कंफ्यूज होने की जरूरत नहीं है और जानते हैं कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के खट्टे मीठे रिश्तों की कहानी.
जब मुलायम सिंह यादव की पहली सरकार को बचाई थी कांग्रेस
11 अक्टूबर 1988 को जयप्रकाश नारायण की जयंती के अवसर पर विश्वनाथ प्रताप सिंह उर्फ वीपी सिंह ने कांग्रेस से बगावत तक अलग हुए और जनता दल के रूप में नई राजनीतिक पार्टी लॉन्च की. इसी बीच देवीलाल चौधरी और वीपी सिंह के प्रयास से जनता दल की तरफ से 5 दिसंबर 1989 को मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने. उस समय कांग्रेस के विरोध में ही जनता दल बनी थी. मुलायम सिंह यादव की भी पूरा राजनीतिक सफर कांग्रेस विरोध में ही था.
1989 में 425 विधायकों की ताकत वाले यूपी विधानसभा में जनता दल को 208 सीटें मिली थीं, जो बहुमत से थोड़ा कम थीं। मुलायम सिंह यादव की अगुवाई में जब जनता दल की सरकार बनी तब बीजेपी के 57 विधायकों का उनकी सरकार को बाहर से समर्थन था. लेकिन अक्टूबर-नवंबर 1990 में अयोध्या में कारसेवा के दौरान मुलायम सिंह यादव की सरकार ने गोलियां चलवाई. वहीं बिहार में जनता दल के तत्कालनी मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा रोक दी थी, जिसके बाद बीजेपी ने मुलायम सिंह यादव से अपना समर्थन वापस ले लिया था.
एनडी तिवारी का तर्क था कि कांग्रेस को यह बताने की जरूरत ही क्या है कि वह धर्म निरपेक्ष हैं, हम तो ये हैं ही. लेकिन उनका तर्क राजीव गांधी के सामने बिलकुल भी नहीं टिक सका और गुलाम नबी आजाद सहित कुछ और नेताओं की सलाह मान ली गई. माना जाता है कि बीजेपी विरोध में वाम दल भी कांग्रेस से मुलायम सिंह यादव की सरकार को बचाने का दबाव बना रहे थे.
राजीव गांधी की सहमति से ही मुलायम सिंह यादव की पहली सरकार को बचाई गई थी.
आखिरकार 94 विधायकों वाली कांग्रेस ने बाहर से समर्थन देकर मुलायम सिंह यादव की सरकार को गिरने से बचा लिया. कुछ ही दिनों बाद एनडी तिवारी सरीखे नेताओं ने एक बार फिर से पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को समझाने की कोशिश की- ‘चलिए उस वक्त तो मौके की नजाकत को देखते हुए मुलायम सिंह यादव की सरकार को बचा लिया गया, लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि मुलायम जिस किस्म के नेता हैं, वह किसी भी वक्त विधानसभा भंग करने की घोषणा कर सकते हैं, ऐसे में अगर उनके ऐसा करने से पहले ही कांग्रेस सरकार गिरा देती है तो कारसेवकों को गोली चलाए जाने की घटना से राज्य में नाराज हुए लोगों का वोट कांग्रेस को मिल सकता है.’
मुलायम सिंह यादव ने किया ऐसा खेल कि टूट गई यूपी में कांग्रेस की कमर
काफी समझाने बुझाने के बाद तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी इस फैसले के लिए तैयार हुए. लेकिन इसी बीच 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर की एक चुनावी जनसभा में राजीव गांधी की हत्या हो गई. उसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष बने पीवी नरसिम्हा राव और एनडी तिवारी के रिश्ते अच्छे थे इसलिए मुलायम सिंह यादव की सरकार गिराने के फैसले पर आगे बढ़ने पर ही कहा गया. मुलायम सिंह यादव की सरकार से समर्थन लेने के लिए तत्कालीन राज्यपाल बी. सत्यनारायण रेड्डी से कांग्रेस ने समय मांगा. राज्यपाल ने 24 जून 1991 को सुबह 10 बजे मिलने का समय दिया.
कांग्रेस की इस हरकत के बारे में मुलायम सिंह यादव को पता चल गई. कहा जाता है कि राजभवन से ही किसी ने यह सूचना मुलायम सिंह यादव को लीक कर दी. इसके बाद मुलायम सिंह यादव ने 24 जून 1991 को सुबह पांच बजे ही राजभवन पहुंचे और विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर दी. इस तरह एनडीए तिवारी और कांग्रेस की सारी प्लानिंग धरी रह गई. यह पहला मौका था जब उत्तर प्रदेश में यह संदेश गया कि कांग्रेस ने अयोध्या में कार सेवकों पर गोली चलाने वालों की सरकार बचाई. बीजेपी ने इस मुद्दे को 1991 के मध्यावधि चुनाव में जोरशोर से उठाया, नतीजा यह हुआ कि यहीं से कांग्रेस उत्तर प्रदेश में कमजोर होनी शुरू हो गई, जो आज तक बरकरार है.