अमूमन देशभर में शिवलिंग का आकार एक जैसा यानी गोल शिला के रूप में ही होता है. लेकिन केदारनाथ के मंदिर में बना शिवलिंग गोल नहीं बल्कि त्रिभुज जैसा आकार लिए हुए है. इस शिवलिंग पर लाखों भक्त हर साल घी लगाते हैं. आखिर क्या है इस इसकी मान्यता और क्यों है इसका आकार ऐसा, इसके लिए आपको धार्मिक ग्रंथों की मदद लेनी होगी.
केदारनाथ से जुड़ी पांच पांडवों की कथा बड़ी प्रसिद्ध है. हालांकि इस कथा का जिक्र शिव पुराण में सीधे तौर पर नहीं मिलती है. ये कथा स्कन्द पुराण से आती है. महाभारत युद्ध के बाद पांडव युद्ध भूमि में अपने परिवारवालों और गुरुओं के शव देखते हैं, तो विचलित हो जाते हैं. ब्रह्महत्या और स्वजन-वध के पाप से मुक्ति की चाह उन्हें शिव की याद दिलाती है. शिव की आराधना करने और उनका आशीर्वाद लेने पांडव उन्हें खोजते हुए काशी पहुंचते हैं. लेकिन शिव उनसे अप्रसन्न होकर हिमालय चले गए. पांडवों को दर्शन न देने के लिए शिव ने गुप्तकाशी क्षेत्र में बैल का रूप धारण किया. बाकी पांडव तो पहचान नहीं पाए, लेकिन भीम को इस बैल को देखकर शक हुआ. उसने बैल को पकड़ने का प्रयास किया, तब बैल भूमि में समाने लगा. ऐसा माना जाता है कि इस बैल का कूबड़ केदारनाथ में प्रकट हुआ, जहाँ ये शिवलिंग है. यहां पांडवों ने शिव मंदिर की स्थापना की.
केदारनाथ मंदिर
बैल के अन्य अंग अलग-अलग स्थानों पर प्रकट हुए, जिन्हें मिलाकर पंच केदार कहा जाता है:
- केदारनाथ – कूबड़ (पीठ)
- तुंगनाथ – भुजाएँ
- रुद्रनाथ – मुख
- मध्यमहेश्वर – नाभि एवं उदर
- कल्पेश्वर – जटा
स्कन्द पुराण में एक और कथा का जिक्र मिलता है. बदरिकाश्रम में भगवान विष्णु के अवतार नर और नारायण ऋषि कठोर तप कर रहे थे. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए. ऋषियों ने शिव से प्रार्थना की कि वे इसी क्षेत्र में सदैव निवास करें ताकि लोककल्याण हो सके. शिव ने ज्योतिर्लिंग रूप में वहां निवास स्वीकार किया. इसलिए केदारनाथ को बारह ज्योतिर्लिंगों में स्थान मिला है.
केदारनाथ का शिवलिंग एक प्राकृतिक, अनगढ़, त्रिकोणाकार शिला है. इस शिवलिंग के आकार की विशेषता ही इसे अन्य ज्योतिर्लिंगों से अलग बनाती है. इसी कथा से जुड़ी धार्मिक मान्यता है कि केदारनाथ के दर्शन और पूजा से भक्त को पापों से मुक्ति तथा शिवकृपा प्राप्त होती है. कुछ विद्वान यह भी बताते हैं कि त्रिकोण (त्रिकोणीय आकृति) शैव-शाक्त परंपरा में शक्ति, अग्नि और आध्यात्मिक उत्कर्ष का प्रतीक माना जाता है, हालांकि केदारनाथ के संदर्भ में प्रमुख परंपरा उसे शिव के वृषभ-रूप के कूबड़ से जोड़ती है.
सिर्फ केदारनाथ ही नहीं, भारत कई शिवलिंग ऐसे हैं, जिनके आकार अलग हैं. शैव परंपरा में शिवलिंगों के अनेक स्वरूप मिलते हैं, और कई प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग तथा स्वयंभू लिंग अपने विशिष्ट आकार के कारण जाने जाते हैं.
- पशुपतिनाथ (नेपाल) – चतुर्मुख लिंग – काठमांडू के पशुपतिनाथ मंदिर में शिवलिंग के चार मुख हैं. ये शिव के चार रूपों और चार दिशाओं का प्रतीक माने जाते हैं.
- अमरनाथ – हिमलिंग : अमरनाथ गुफा में बर्फ से प्राकृतिक रूप से बनने वाला शिवलिंग है. इसका आकार हर वर्ष बदलता है और चंद्रमा के कला-चक्र से इसके बढ़ने-घटने की मान्यता है.
- तिलभांडेश्वर (वाराणसी) – यह शिवलिंग हर वर्ष तिल (तिलहन के दाने) के बराबर बढ़ता है, ऐसी लोकमान्यता है. इसका आकार सामान्य लिंगों की तुलना में बहुत विशाल है.
- भोजपुर (मध्य प्रदेश) – राजा भोज द्वारा निर्मित भोजेश्वर मंदिर का शिवलिंग भारत के सबसे बड़े एकाश्म (एक ही पत्थर से बने) शिवलिंगों में गिना जाता है. इसकी ऊँचाई लगभग 18 फीट से अधिक बताई जाती है.
- लिंगराज (भुवनेश्वर) – यहाँ का शिवलिंग हरिहर स्वरूप से भी जुड़ा माना जाता है, जहाँ शिव और विष्णु तत्व का समन्वय देखा जाता है.
- स्वयंभू शिवलिंग – कई तीर्थों में शिवलिंग को स्वयंभू माना जाता है, अर्थात् वह मनुष्य द्वारा स्थापित नहीं बल्कि प्राकृतिक रूप से प्रकट हुआ. ऐसे लिंगों के आकार अक्सर अनियमित, अंडाकार, शंक्वाकार या शिलाखंड जैसे होते हैं.
आगम और शिल्पशास्त्र ग्रंथों में शिवलिंगों के कई रूपों का वर्णन मिलता है:
- गोलाकार (वृत्ताकार)
- अंडाकार
- शंक्वाकार
- त्रिकोणीय
- चतुष्कोण आधार वाले
- मुखलिंग (जिन पर शिव का मुख अंकित हो)
केदारनाथ का आकार विशेष क्यों माना जाता है?
अधिकांश मंदिरों में स्थापित शिवलिंग शिल्प-विधान के अनुसार बनाए गए होते हैं, जबकि केदारनाथ का लिंग प्राकृतिक और अनगढ़ स्वरूप का है. यही कारण है कि उसका त्रिकोणीय आकार भक्तों और विद्वानों दोनों के लिए विशेष महत्व रखता है.