UN में कश्मीर-कश्मीर क्यों चिल्ला रहा तुर्की? पाकिस्तान के इस्लामिक दोस्त का इरादा क्या? राग अलापने की वजह

UN में कश्मीर-कश्मीर क्यों चिल्ला रहा तुर्की? पाकिस्तान के इस्लामिक दोस्त का इरादा क्या? राग अलापने की वजह


Kashmir Issue and Islamic NATO: मक्का पैक्ट के बाद तुर्की ने इस्लामिक नाटो के अपने यार पाकिस्तान के साथ दोस्ती का बांग देना शुरू कर दिया है. संयुक्त राष्ट्र में फिर से कश्मीर का राग अलापा गया है. तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तय्यप एर्दोगन ने 2019 से लेकर अब तक संयुक्त राष्ट्र महासभा में 7 बार भारत-पाकिस्तान के बीच नासूर बन चुके कश्मीर मुद्दे को उठाया है. भारत ने तुर्की की तरफ से इस टिप्पणी को अपने अंदरूनी मामलों में गैरजरूरी हस्तक्षेप बताते हुए लगातार खारिज किया है. इसके साथ ही कहा है कि जम्मू-कश्मीर से जुड़े सभी मामले पूरी तरह से द्विपक्षीय हैं और 1972 के शिमला समझौते के तहत आते हैं. हालांकि इसमें अहम सवाल ये है कि तुर्की ऐसा क्यों कर रहा है?

एर्दोगन ने आखिर क्या कहा?
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की मौजूदगी में बोलते हुए एर्दोगन ने साफ तौर पर कहा कि दक्षिण एशिया में यह महत्वपूर्ण है कि कश्मीर मुद्दे सहित सभी विवादों का समाधान संयुक्त राष्ट्र चार्टर सहित जरूरी प्रस्तावों के स्ट्रक्चर के अंदर बातचीत के जरिए किया जाए. उन्होंने आगे कहा कि अगर कुछ क्रिएटिव कदम उठाए जाएं, तो सभी मुद्दों का समाधान संभव हो सकता है.

एर्दोगन बार-बार कश्मीर मुद्दा क्यों उठाते हैं?
तुर्की असल में पाकिस्तान के साथ राजनीतिक और रणनीतिक संबंध बनाए रखता है, जिसमें मक्का संधि जैसे हालिया सुरक्षा सहयोग समझौते शामिल हैं. एर्दोगन बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों का उपयोग मुस्लिमों से जुड़े मुद्दों के लिए एक ग्लोबल आवाज के रूप में खुद को पेश करने के साथ ही क्षेत्रीय विवादों में बातचीत और संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में मध्यस्थता की वकालत करने के लिए करते हैं.

युनाइटेड नेशन जनरल असेंबली में एर्दोगन की तरफ से कश्मीर का मुद्दा 7 बार उठाया जा चुका है. तुर्की आधिकारिक तौर पर बताता है कि दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एकतरफा कदमों की बजाय संयुक्त राष्ट्र चार्टर और प्रासंगिक रिजॉल्यूशन के माध्यम से विवादों को हल करने की जरूरत है.

कब-कब उठाया मुद्दा?

  • 2019: जम्मू और कश्मीर में आर्टिकल 370 के प्रावधानों को समाप्त किए जाने के बाद एर्दोगन ने यूएन में मुद्दा उठाया.
  • 2020: कोविड के दौरान संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 75वें सेशन को वर्चुअल तौर पर संबोधित करते हुए भी एर्दोगन ने मुद्दा उठाया.
  • 2021: संयुक्त राष्ट्र महासभा के 76वें सत्र में कश्मीर में शांति और खुशहाली के मुद्दे पर बात की.
  • 2022 और 2023: संयुक्त राष्ट्र के नियमों के तहत बातचीत और संवाद के लिए रेफरेंस देना जारी रखा.
  • 2025 और 2026: तुर्की ने दोनों ही साल में कश्मीर के मुद्दे को चर्चा में लाने का काम किया. पाकिस्तानी लीडरशिप की मौजूदगी में संयुक्त राष्ट्र के रिजॉल्युशन पर जोर दिया.

मक्का संधि के बाद इस बयान का क्या मतलब
एर्दोगन के बयानों का इस साल और भी अधिक महत्व है क्योंकि यह 7 अगस्त, 2026 को मक्का संयुक्त रक्षा समझौते या फिर मक्का संधि पर हस्ताक्षर के कुछ हफ्तों के बाद आया है.

मक्का संधि असल में तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक ऐतिहासिक नाटो (NATO) के जैसा सैन्य गठबंधन है. इसमें आर्टिकल 5 के जैसा एक क्लॉज शामिल है, जहां किसी एक सदस्य पर हुआ हमला तीनों पर हमला माना जाता है. इस गुट के अंदर, सऊदी अरब फाइनैंशियल मदद मुहैया कराता है. वहीं तुर्की हाई टेक्निक वाली डिफेंस उपकरण सप्लाई करता है और पाकिस्तान का रोल सैनिकों की फौज देना है.

उनके भाषण के रणनीतिक मायने क्या हैं?
पाकिस्तान के साथ रक्षा संधि में शामिल होने के तुरंत बाद कश्मीर मुद्दे को उठाकर, एर्दोगन यह संकेत दे रहे हैं कि पाकिस्तान के लिए तुर्की का समर्थन अब केवल मौखिक या कूटनीतिक नहीं है, बल्कि एक औपचारिक सैन्य गठबंधन की तरफ से समर्थित है.

अपने भाषण में कश्मीर मुद्दे को शामिल करना ग्लोबल मंच पर पाकिस्तान के प्रमुख विदेश नीति के मकसद के प्रति तुर्की की कमिटमेंट को मजबूत करता है. यह पाकिस्तान को दिखाता है कि उसके नए रक्षा साझेदार संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसके नैरेटिव को सपोर्ट करेंगे.

एर्दोगन के कॉमेंट्स ने नई दिल्ली के साथ कूटनीतिक तनाव को फिर से बढ़ा दिया है. भारत ने सख्ती से यह रुख बनाए रखा है कि जम्मू-कश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग है और किसी भी विवाद को 1972 के शिमला समझौते के तहत पूरी तरह द्विपक्षीय बातचीत से हल किया जाना चाहिए. किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता या संयुक्त राष्ट्र ढांचे के हस्तक्षेप को खारिज करते हुए.

एक्सपर्ट्स इस मक्का संधि के बाद की बयानबाजी को एक संकेत के रूप में देखते हैं कि तुर्की खुद को पाकिस्तान के सुरक्षा दायरे में मजबूती से स्थापित कर रहा है. इससे अंकारा के साथ भविष्य में भारत के व्यापार, रक्षा और कूटनीतिक संबंधों में मुश्किल आ सकती हैं.



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