पटना. बिहार में 20 वर्षों तक सीएम रहे नीतीश कुमार में 2 करिश्माई गुण रहे हैं. वह बड़े मायावी व्यक्तित्व के धनी रहे हैं. मायावी ऐसा कि किसी को आसानी से पटा लेना और बड़े त्याग के लिए तैयार करा लेना उनके बाएं हाथ का खेल रहा है. उनका दूसरा करिश्माई गुण यह कि उनके मन की बात समझ पाना किसी के लिए कभी आसान नहीं रहा. दिन-रात साथ रहने वाले भी उनके मन को भांप नहीं पाते. इन 2 गुणों के अलावा भी उनमें कई और गुण भी रहे हैं. राजनीति के खेल में वे राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद जैसे धुरंधर को आसानी से चकमा चकमा देते रहे तो भाजपा को भी उन्होंने अपने लंबे मुख्यमंत्री काल में हमेशा दोयम दर्जे की औकात से कभी आगे बढ़ने नहीं दिया. अब तो वे थक चुके हैं. उम्र बढ़ती जा रही है और सेहत भी साथ नहीं दे रहा. फिर भी उनसे सहयोगी और विरोधी दोनों भय खाते हैं. बहरहाल, यहां हम बात करेंगे उनके 2 सिपहसालारों की, जिन्हें उन्होंने बड़े त्याग के लिए न सिर्फ पटाया, बल्कि उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनने का सपना भी दिखाया. पर, दोनों फिलवक्त राजनीति के बियावान में भटक रहे हैं.
नीतीश के करीबी रहे हैं दोनों नेता
जनता दल यूनाइटेड में नीतीश कुमार के सबसे करीबी माने जाते रहे 2 पूर्व आईएएस अधिकारी- आरसीपी सिंह और मनीष वर्मा की भूमिका पर लंबे समय से चर्चा होती रही है. दोनों ने सिविल सेवा की नौकरी छोड़ कर राजनीति में कदम रखा. चूंकि दोनों को नीतीश कुमार ही राजनीति में लेकर आए, इसलिए वे उनके भरोसेमंद माने गए. पर, 2026 में सियासी समीकरण बदलने और नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद इन दोनों की स्थिति बदल गई है. आरसीपी सिंह तो अब जेडीयू से बाहर ही हो चुके हैं, जबकि मनीष वर्मा संगठनात्मक भूमिका में तो हैं, लेकिन पार्टी के बड़े सियासी फैसलों से वे दूर ही नजर आते हैं. पार्टी पर मजबूत पकड़ कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय झा और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने बना रखी है. संजय झा की पकड़ का आलम यह है कि उन्होंने जेडीयू का नाम अब जनता दल नीतीश रखने का प्रस्ताव रख दिया है. मनीष वर्मा की कोई राय अभी तक सामने नहीं आई है, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा और राज्य सरकार में मंत्री श्रवण कुमार ने संजय झा के प्रस्ताव की तस्दीक कर दी है.
दोनों IAS की नौकरी छोड़ कर आए
आरसीपी सिंह उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी थे. नीतीश कुमार के रेल मंत्री रहते हुए वे उनके संपर्क में आए. वे नीतीश के स्वजातीय (कुर्मी) के अलावा उनके गृह जले नालंदा के निवासी हैं. नीतीश की इच्छा पर बाद में वे बिहार में प्रधान सचिव बने और 2010 के आसपास स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर जेडीयू में शामिल हो गए. वे पार्टी के संगठन महासचिव से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष तक बने और केंद्रीय मंत्री भी रहे. जेडीयू में उनके प्रभाव इतना था कि लोग उन्हें नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी के रूप में देखने लगे. पर, झटके में नीतीश ने उन्हें किनारे कर दिया. बाद में वे भाजपा से जुड़े, लेकिन वहां उन्हें तवज्जो नहीं मिली तो अपनी अलग पार्टी ही बना ली. 2025 के विधानसभा चुना में उन्होंने प्रशांत किशोर के नेतृत्व वाली जन सुराज में अपनी पार्टी का िवल कर दिया. अब वे फिर जेडीयू में लौटने को बेताब हैं, लेकिन नीतीश उन्हें भाव ही नहीं दे रहे.
मनीष वर्मा भी नौकरी छोड़ कर आए
आरसीपी सिंह की तरह ही मनीष वर्मा को भी नीतीश कुमार ने समय से पहले इस्तीफा दिला कर जेडीयू से जोड़ा. वे भी नीतीश के स्वजातीय और नालंदि के रहने वाले है. वे 2000 बैच के ओडिशा कैडर के आईएएस अधिकारी थे. उन्होंने बिहार में कई महत्वपूर्ण पद संभाले. पटना और पूर्णिया के डीएम रहे. बाद में मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव सह अतिरिक्त सलाहकार बने. नीतीश के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम- सात निश्चय में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही. 2021 के आसपास वीआरएस लेकर उन्होंने नीतीश कुमार के कहने पर जेडीयू ज्वाइन की. उन्हें नीतीश ने जेडीयू का राष्ट्रीय महासचिव बनाया. आरसीपी सिंह की तरह ही उनके बारे में भी यह चर्चा होने लगी कि नीतीश के वे ही उत्तराधिकारी होंगे. पार्टी में उनकी सक्रियता भी बढ़ी. उन्हें जिलों का दौरा कर जेडीयू को मजबूत करने का दायित्व नीतीश ने सौंपा. कई जिलों में वे गए भी गए भी. 2026 में वे मुजफ्फरपुर, सारण समेत कई जिलों में संपर्क अभियान चला रहे थे. प्रखंड स्तर पर कार्यकर्ताओं से मिल कर पार्टी को बूथ तक मजबूत करने का संदेश दे रहे थे. अचानक उन्हें दौरा रोक कर फील्ड से वापस बुला लिया गया. तब से उनकी कोई चर्चा नहीं होती. राज्यसभा चुनाव और एमएलसी चुनाव में उन्हें उतारने की कभी कभार चर्चा हुई भी, लेकिन उनकी जगह दूसरों को मौका मिल गया. अब तो राजनीतिक गलियारे में वे गुमनाम हो गए हैं.
RCP को नीतीश ने दी थी खुली छूट
नीतीश कुमार के साथ आरसीपी सिंह जब तक रहे, उन्हें पार्टी और सरकार में बड़ी जिम्मेदारियां मिली थीं. वे लंबे समय तक पार्टी के संगठन को संभालते रहे. नीतीश उनके प्रशासनिक अनुभव पर भरोसा करते थे. आरसीपी को खुली छूट मिली हुई थी, लेकिन पार्टी में उनकी मनमानी और आंतरिक विवादों ने धीरे-धीरे दूरी बढ़ा दी. 2020 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू की सीटें घट कर 43 रह गईं. कई नेताओं ने आरसीपी सिंह पर आरोप लगाया कि उनकी रणनीति और फैसलों ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया. 2022 में पार्टी ने उनसे संपत्ति संबंधी आरोपों पर स्पष्टीकरण मांगा. आरसीपी ने इस्तीफा दे दिया. सच कहें तो नीतीश ने उनसे इस्तीफा मांग लिया. बाद में वे भाजपा से जुड़ गए. फिर जन सुराज के साथ रहे. 2026 में वे जेडीयू में वापसी की कोशिश कर रहे हैं. जून 2026 में नीतीश कुमार से उन्होंने मुलाकात भी की, लेकिन ललन सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं ने साफ कह दिया कि पार्टी को ऐसे नेताओं की जरूरत नहीं है, जिन्होंने इसे कमजोर किया. आरसीपी की वापसी के रास्ते अब बंद दिख रहे हैं.
RCP की वापसी चाहते हैं, वर्मा चुप
आरसीपी सिंह बार-बार संकेत देते रहे हैं कि जेडीयू उनका घर है और वे वापस आना चाहते हैं. नीतीश को अभिभावक बताते हुए उन्होंने रिश्ते की मजबूती का दावा भी किया. पर, पार्टी के अंदर विरोध इतना मजबूत है कि उनकी वापसी लगभग असंभव लगती है. सियासी गलियारों में उनकी चर्चा अब सिर्फ अटकलों तक सीमित रह गई है. ठीक इसके उलट मनीष वर्मा ने चुप्पी साध ली है. वे सार्वजनिक रूप से बयानबाजी से दूर रहते हैं. वे संगठन के काम में व्यस्त दिखते हैं, लेकिन नीतीश कुमार या निशांत कुमार के आसपास की बड़ी राजनीतिक चर्चाओं में उनकी भूमिका कम नजर आती है. मौन साध कर वे अपनी जगह बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं. नीतीश कुमार के चहेते रहे दोनों पूर्व आईएएस अधिकारी अब सियासी केंद्र से दूर हैं. आरसीपी सिंह पूरी तरह किनारे हो चुके हैं, जबकि मनीष वर्मा संगठनात्मक भूमिका में सक्रिय होने के बावजूद बड़े फैसलों से दूर हैं. जेडीयू अब निशांत कुमार और अन्य नेताओं के इर्द-गिर्द नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने पर जोर दे रहा है. पुराने इन भरोसेमंद चेहरों की जरूरत अब उतनी नहीं रह गई है, जितनी कभी थी. यह बदलाव पार्टी के अंदर सत्ता और प्रभाव के नए समीकरण को दर्शाता है.