Iran Indian Ocean : होर्मुज, लाल सागर और अब सीधे ट्रंप की गर्दन तक पहुंचा ईरान, हिंद महासागर फ्रंट से क्यों कांप रहा अमेरिका?

Iran Indian Ocean : होर्मुज, लाल सागर और अब सीधे ट्रंप की गर्दन तक पहुंचा ईरान, हिंद महासागर फ्रंट से क्यों कांप रहा अमेरिका?


पश्चिम एशिया की आग अब फारस की खाड़ी और लाल सागर की सीमाओं को तोड़कर सीधे हिंद महासागर की लहरों तक आ पहुंची है. ईरान ने धमकी दी है कि वो अब अपनी लड़ाई को सिर्फ होर्मुज जलडमरूमध्य या लाल सागर तक सीमित नहीं रखेगा, बल्कि इसका नया मोर्चा हिंद महासागर में खोलेगा. ये नया मोर्चा सीधा अमेरिकी सुपरपावर की उस सबसे कमजोर नस पर वार करता है, जिसे ‘डिएगो गार्सिया’ कहा जाता है. हिंद महासागर में स्थित ये सैन्य अड्डा ही पूरे इलाके में अमेरिकी नौसेना की ताकत का असली गढ़ है. ईरान की इस नई चाल ने सीधे राष्ट्रपति ट्रंप की रणनीतिक ‘गर्दन’ को अपनी मिसाइलों और घातक ड्रोन के निशाने पर ला दिया है.

डिएगो गार्सिया: जहां फंस गई ट्रंप की ‘गर्दन’

हिंद महासागर के बीचों-बीच स्थित ‘डिएगो गार्सिया’ अमेरिका का एक ऐसा गुप्त और बेहद पावरफुल सैन्य अड्डा है, जहां से वो पूरे पश्चिम एशिया, दक्षिण एशिया और समुद्री रास्तों पर अपना दबदबा बनाए रखता है. अमेरिकी वायुसेना के बड़े बॉम्बर विमान और नौसेना की घातक पनडुब्बियां यहीं से कंट्रोल होती हैं. ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ और ‘ताकत के जरिए शांति’ की पूरी नीति इसी डिएगो गार्सिया जैसे मजबूत ठिकानों के दम पर टिकी हुई है.

लेकिन ईरान ने हिंद महासागर में जंग का नया मोर्चा खोलने की धमकी देकर सीधे इसी रणनीतिक गढ़ पर शिकंजा कस दिया है. ईरान जानता है कि वो अमेरिका के विशालकाय विमानवाहक पोतों का सामने से मुकाबला नहीं कर सकता, लेकिन अगर वो हिंद महासागर के विशाल पानी में अशांति फैलाता है, तो डिएगो गार्सिया से होने वाले अमेरिकी अभियानों और रसद की सप्लाई लाइन पूरी तरह ठप हो जाएगी. ईरान की इस चाल ने ट्रंप प्रशासन को एक ऐसे धर्मसंकट में डाल दिया है, जहां अमेरिका के सबसे सुरक्षित समझे जाने वाले अड्डे पर भी खतरे के बादल मंडराने लगे हैं.

सफवी की चेतावनी और जंग का नया दायरा

ईरान की एजेंसी ‘फार्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई के मिलिट्री सलाहकार यह्या रहीम सफवी ने इस नए खतरे का पूरा खाका दुनिया के सामने रखा है. सफवी ने बिना किसी लाग-लपेट के कहा कि जो लड़ाई फारस की खाड़ी और होर्मुज से शुरू हुई थी, वो पहले ही लाल सागर तक फैल चुकी है. लेकिन अगर अमेरिका और इजरायल ने अपनी हरकतें बंद नहीं कीं, तो ईरान अपनी जवाबी कार्रवाइयों का दायरा सीधे हिंद महासागर और उससे भी आगे तक बढ़ा देगा.

ईरान के इस कड़े रुख से ये पूरी तरह साफ हो गया है कि वो अब सिर्फ अपने तटीय इलाकों में डिफेंसिव खेल खेलने के मूड में नहीं है. अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी दुश्मनी में ये बयान एक बहुत बड़ा टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है. तेहरान ने बार-बार इस बात को दोहराया है कि अगर उसकी संप्रभुता, जमीन या उसके राष्ट्रीय हितों पर रत्ती भर भी आंच आई, तो वो हिंद महासागर में मौजूद अमेरिकी युद्धपोतों और ठिकानों को निशाना बनाने में एक सेकंड की भी देरी नहीं करेगा.

हिंद महासागर में पहले ही उतर चुकी है जंग की आंच

भले ही सफवी के इस बयान को एक नई चेतावनी की तरह देखा जा रहा हो, लेकिन हकीकत ये है कि इस जंग की चिंगारी पहले ही हिंद महासागर में पहुंच चुकी है. इसका सबसे बड़ा और खौफनाक सबूत इसी साल मार्च के महीने में मिला था, जब श्रीलंका के समुद्री तट के पास एक बहुत बड़ी नौसैनिक घटना घटी. भारत में आयोजित एक बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा लेने के बाद जब ईरान का नौसैनिक जहाज IRIS Dena वापस लौट रहा था, तब अमेरिका की एक पनडुब्बी ने उस पर हमला करके उसे समुद्र में डुबो दिया था.

सिंगापुर के जाने-माने थिंक टैंक ‘एस. राजरत्नम स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज’ के डिफेंस एक्सपर्ट्स का कहना है कि श्रीलंका के पास हुई उस घटना ने उसी समय साबित कर दिया था कि ये युद्ध फारस की खाड़ी की सीमाओं को लांघकर हिंद महासागर की लहरों पर उतर चुका है. इसलिए सफवी का ताजा बयान कोई नई बात नहीं है, बल्कि उस खतरनाक सिलसिले का विस्तार है जो पहले ही शुरू हो चुका है. जब श्रीलंका जैसे देश के इतने करीब बड़ा नौसैनिक टकराव हो सकता है, तो इससे साफ है कि पूरे इलाके के लिए सुरक्षा का माहौल बेहद जटिल हो गया है.

ईरान का ‘असिमेट्रिक वॉरफेयर’ और अमेरिकी नौसेना की मजबूरी

पारंपरिक नौसैनिक ताकत, हथियारों की संख्या और बजट के मामले में ईरान सीधे तौर पर अमेरिकी नौसेना का मुकाबला नहीं कर सकता. अमेरिका के पास दुनिया के सबसे आधुनिक एयरक्राफ्ट कैरियर और घातक बेड़े मौजूद हैं. यही वजह है कि ईरान ने अमेरिका को घेरने के लिए एक अलग रास्ता चुना है, जिसे सैन्य भाषा में ‘असिमेट्रिक वॉरफेयर’ कहा जाता है.

इस रणनीति के तहत ईरान विशाल युद्धपोतों पर पैसे बहाने के बजाय कम लागत वाली घातक मिसाइलों, हमलावर ड्रोन, तेज रफ्तार सुसाइड बोट्स, छोटी पनडुब्बियों और तटीय रडार नेटवर्क का इस्तेमाल करता है. अगर ये युद्ध हिंद महासागर तक फैलता है, तो ईरान को पूरे महासागर पर कब्जा करने की जरूरत नहीं होगी. वो सिर्फ ओमान की खाड़ी और अरब सागर जैसे उन चुनिंदा समुद्री रास्तों पर दबाव बनाएगा, जो होर्मुज जलडमरूमध्य को हिंद महासागर से जोड़ते हैं. अगर इन रास्तों पर ईरानी ड्रोन का डर मंडराता है, तो अमेरिकी नौसेना को अपने जहाजों की सुरक्षा के लिए अपनी आधी ताकत यहीं झोंकनी पड़ जाएगी.

वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल की सप्लाई पर बड़ा खतरा

अगर ये युद्ध हिंद महासागर के विशाल समुद्री इलाके में पूरी तरह फैल जाता है, तो इसका सबसे बड़ा और सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ेगा. फारस की खाड़ी, होर्मुज, लाल सागर और हिंद महासागर, ये सभी रास्ते एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और दुनिया का एक-तिहाई से ज्यादा कच्चा तेल और गैस इन्हीं रास्तों से होकर गुजरता है.

जब इन रास्तों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों का खतरा बढ़ता है, तो कमर्शियल जहाजों को अपनी जान बचाने के लिए अफ्रीका का लंबा चक्कर लगाकर जाना पड़ता है. इससे जहाजों का सफर हफ्तों लंबा हो जाता है और उनका इंश्योरेंस प्रीमियम कई गुना बढ़ जाता है. नतीजा ये होता है कि दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल, गैस और रोजमर्रा के सामानों की कीमतें अचानक आसमान छूने लगती हैं. हाल के महीनों में लाल सागर के तनाव ने पहले ही ग्लोबल मार्केट की कमर तोड़ रखी है, और अब हिंद महासागर का नया मोर्चा खुलने से दुनिया भर के बाजारों में मंदी का खौफ फैल गया है.

भारत और क्षेत्रीय देशों के सामने खड़ी होंगी नई चुनौतियां

हिंद महासागर का दायरा पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैला हुआ है. अगर इस पूरे इलाके में सैन्य गतिविधियां और हमले बढ़ते हैं, तो आसपास के सभी देशों की सुरक्षा पर बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा. भारत जैसे देश के लिए ये स्थिति बेहद संवेदनशील है, क्योंकि भारत का लगभग 90 फीसदी समुद्री व्यापार और कच्चे तेल का ज्यादातर आयात इसी हिंद महासागर के रास्ते से होता है.

ईरान की तरफ से आई ये चेतावनी इस बात का सबूत है कि पश्चिम एशिया का ये संकट आसानी से टलने वाला नहीं है. अगर ट्रंप प्रशासन या इजरायल की तरफ से कोई भी नया दुस्साहस होता है, तो उसकी लपटें फारस की खाड़ी से निकलकर पूरे हिंद महासागर को अपनी चपेट में ले लेंगी. ये नया समुद्री मोर्चा न सिर्फ अमेरिकी नौसेना के सब्र की परीक्षा लेगा, बल्कि डिएगो गार्सिया पर बढ़ते दबाव के साथ ट्रंप की पूरी विदेश नीति को बैकफुट पर धकेल देगा.



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