nasa artemis-accords-vs-ilrs : चांद अब लड़ाई का नया मैदान है. 3 दिन पहले ट्रंप ने खुलेआम इसका ऐलान कर दिया. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया ट्रुथ पर चांद की तस्वीर के साथ पोस्ट लिखा कि चांद अमेरिका का है. दरअसल कभी स्पेस रिसर्च का केंद्र रहे मून पर कब्जे की जंग चल रही है. एक तरफ अमेरिका तो दूसरी तरफ चीन और रूस हैं.
इस होड़ ने दुनिया को भी दो हिस्सों में बांट दिया है. अमेरिका अब तक आर्टिमिस अकॉर्ड से 71 देशों को अपने साथ जोड़ चुका तो चीन ने संयुक्त इंटरनेशनल लूनर रिसर्च स्टेशन के नाम पर 13 देश अपने साथ जोड़े हैं. खास बात ये है कि इस जंग में भारत अमेरिका के साथ है तो पाकिस्तान ने चीन का साथ चुना है.
चांद पर बेस की रेस
अमेरिका और चीन के बीच चांद पर बेस बनाने के लिए रेस हो रही है. दोनों ही देस चांद के साउथ पोल पर स्थायी बेस बनाने की कोशिश में बड़े मिशन लॉन्च करने वाले हैं. इसके लिए अमेरिका ने आर्टिमिस प्रोग्राम शुरू किया. यह NASA का ऐसा कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य इंसानों को चांद पर सिर्फ भेजना नहीं है बल्कि वहां स्थायी मौजूदगी बनाना है.
अमेरिका ने इस मिशन में कई देशों को जोड़ा है. इसी समझौते को आर्टिमिस अकॉर्ड नाम दिया गया है. इसके तहत पांच मिशन किए जाएंगे. इनमें दो पूरे हो चुके हैं. अगले साल तीसरा मिशन होगा और चौथे मिशन में इंसानों को चांद पर भेजा जाएगा जो 2028 में होगा. इसके बाद नियमित मिशन लॉन्च होंगे. अमेरिका इसके लिए चंद्रमा की ऑर्बिट में एक छोटा स्पेस स्टेशन भी बनाएगा. वहीं ILRS चीन और रूस का मून बेस मिशन है. यह 2021 में शुरू हुआ था. 2026 से 2030 तक इंसानों को भेजकर यहां तकनीकी परीक्षण किया जाएगा. इसके बाद मून बेस बनेगा.
चांद पर नासा कुछ ऐसा बेस बनाएगा (फोटो-NASA)
आर्टिमिस समझौते की जरूरत क्यों पड़ी?
आर्टिमिस समझौता असल में एक शांतिपूर्ण स्पेस रिसर्च के लिए किया गया है. 2020 में नासा ने इसकी शुरुआत की थी. दरअसल अब तक स्पेस को लेकर जो सबसे बड़ा समझौता था वह 1967 में हुआ था. इसी से स्पेस के बुनियादी नियम आज तक तय होते हैं. हालांकि चंद्रमा पर खनन, संसाधनों के उपयोग और डेटा को एक दूसरे से साझा करने के लिए कोई नियम नहीं था.
अमेरिका ने इसीलिए इस समूह का गठन किया ताकि सभी देश मिलकर स्पेस मिशन में आपसी सहयोग जारी रख सकें और जरूरत पड़ने पर नए नियम बनाए जा सके. हालांकि यह किसी भी ग्रह या उपग्रह पर किसी को भी संप्रभुता का अधिकार नहीं देता. हालांकि यह कहता है कि चांद पर मौजूद संसाधनों का प्रयोग किया जा सकता है.
अमेरिका के साथ कौन-कौन जुड़ा?
अमेरिका के साथ अब तक 71 देश जुड़ चुके हैं. इसमें भारत, जापान, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जर्मनी, दक्षिण कोरिया, सऊदी अरब, यूएई, न्यूजीलैंड और कई यूरोपीय, एशियाई तथा लैटिन अमेरिकी देश शामिल हैं. भारत इसमे 2023 में शामिल हुआ था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका की यात्रा पर गए थे. खास बात ये है कि इस ग्रुप में अमेरिका के बाद भारत ही सबसे बड़ी अंतरिक्ष ताकत है.
चीन के साथ जुड़े देश (फोटो-Reddit)
चीन और रूस के साथ कौन-कौन
चीन और रूस ने मिलकर इंटरनेशनल लूनार रिसर्च स्टेशन नाम का मिशन शुरू किया है. इसमें बेलारूस, अजरबैजान, मिस्र, साउथ अफ्रीका, थाईलैंड, वेनेजुएला और पाकिस्तान शामिल है. इस मिशन को लीड चीन की स्पेस एजेंसी CNSA और रूस की स्पेस एजेंसी रॉस्कॉम्स साथ कर रहे हैं.
मंगल के लिए चंद्रमा को टेस्टिंग ग्राउंड बना रहे
चंद्रमा पर बेस बनाना और पानी और बर्फ की तलाश करना अहम कारण है, मगर असल में इस रेस को मंगल मिशन की तैयारी से जोड़कर देखा जा रहा है. यहां बेस बनाकर यह देखा जाएगा कि कम ग्रैविटी में इंसान आखिर कैसे रह सकता है. यहां पर खाना बनाने और ऑक्सीजन के तरीके खोजे जाएंगे जो मंगल पर काम आ सकती है. यहां ये भी देखा जाएगा कि स्पेस में घर कैसे बनाए जाएं. कई वैज्ञानिक ये भी मानते हैं कि अगर चंद्रमा पर बेस बन गया तो हे सकता है कि मंगल के लिए अगले मिशन यही से लॉन्च किए जाएं.
भारत को इससे क्या फायदा?
स्पेस रिसर्च में दुनिया में भारत अमेरिका, रूस और चीन के बाद चौथे नंबर पर है. भारत के चंद्रयान-4 और चंद्रयान-5 भी कतार में हैं. इसके अलावा गगनयान, मंगल मिशन, वीनस मिशन समेत कई मिशन की तैयारियां चल रही हैं. ऐसे में इसरो को इन मिशनों में सहयोग मिल सकता है. इसके अलावा भविष्य में जो मानव अंतरिक्ष मिशन होंगे उनमें भी भागीदारी के मौके मिल सकते हैं.