अब AI से तस्वीर बनवाकर नहीं, भागलपुर की इस खास साड़ी को पहनकर लीजिए 80 के दशक का असली अनुभव

अब AI से तस्वीर बनवाकर नहीं, भागलपुर की इस खास साड़ी को पहनकर लीजिए 80 के दशक का असली अनुभव


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Bhagalpur 80’s Fashion Returned: भागलपुर में 80 के दशक की प्रसिद्ध ‘कांथा स्टिच’ कला फिर से लौट आई है. खादी कॉटन और तसर सिल्क पर हाथ से बनी ये साड़ियां बिहार, बंगाल और विदेशों में भी लोकप्रिय हो रही हैं. इससे बुनकरों को भी रोजगार मिल रहा है.

भागलपुर. सिल्क सिटी के नाम से मशहूर भागलपुर अब अपनी पुरानी विरासतों को पुनर्जीवित कर रहा है. यहां के बुनकरों ने 80 के दशक की प्रसिद्ध ‘कांथा स्टिच’ कला को एक बार फिर साड़ियों पर उकेरना शुरू किया है. कभी चलन से बाहर हो चुकी यह हाथ की कारीगरी आज के फैशन बाजार में ट्रेंड बन चुकी है, जिसकी मांग बिहार और बंगाल के साथ-साथ विदेशों में भी तेजी से बढ़ रही है. अभी जिस तरीके से 80 के दशक का ट्रेंड चला है, लोग एआई से तस्वीर बनवा रहे हैं, ऐसे में इस साड़ी को पहनकर वे असली में 80 के दशक में चले जाएंगे.

खादी कॉटन और तसर सिल्क पर हाथ का हुनर
बुनकर अब्दुल्ला ओवैसी के अनुसार, वर्तमान में खादी कॉटन और तसर सिल्क की साड़ियों पर यह बारीक काम किया जा रहा है. कांथा स्टिच पूरी तरह सुई-धागे के जरिए हाथ से तैयार की जाने वाली कला है. इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि खादी कॉटन पर होने के कारण ये साड़ियां गर्मी और सर्दी, दोनों मौसमों के लिए आरामदायक होती हैं. इस कला के फिर से जीवित होने से स्थानीय महिलाओं को भी बड़े पैमाने पर रोजगार मिल रहा है. कभी इसकी डिमांड बंगाल व बिहार में बड़े पैमाने पर हुआ करती थी, क्योंकि यहां की लोकप्रिय साड़ियों में से एक रही है.

4 दिन की मेहनत और बेमिसाल फिनिशिंग
एक साड़ी को पूरी तरह तैयार करने में 4 से 5 दिन का समय लगता है. यह प्रक्रिया काफी जटिल है. पहले लूम पर कच्चे धागे से साड़ी तैयार की जाती है, फिर सुई-धागे से हाथ द्वारा बारीक ‘कांथा वर्क’ उकेरा जाता है. अंत में साड़ी को रंगा जाता है और अंतिम फिनिशिंग दी जाती है. कीमत और बाजार का रुझान पूरी तरह हैंडवर्क होने के कारण एक साड़ी की कीमत 3500 से 4000 रुपये के बीच होती है.

हस्तशिल्प के शौकीनों के बीच इसकी बढ़ती लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बंगाल के बाजारों में इसकी सबसे अधिक एडवांस बुकिंग हो रही है. आधुनिक दौर में पुरानी परंपरा का यह मेल न केवल संस्कृति को बचा रहा है, बल्कि भागलपुर के बुनकरों की आर्थिक स्थिति को भी मजबूत कर रहा है. पौराणिक कला एक बार फिर वापस आ रही है और अपनी धरोहर को जीवंत कर रही है.



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