अमेरिका में जब से ‘रूस ईरान सैंक्शन एक्ट’ पास किया गया है, तब से भारत और चीन पर 100 परसेंट टैरिफ का खतरा मंडरा रहा है. इस बिल से पहले भी रूस से सस्ता तेल खरीदने पर दबाव बनाने की कोशिश हुई, लेकिन भारत ने झुकने से साफ इनकार कर दिया. हाल ही में इस मुद्दे पर भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो की मुलाकात हुई है. संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान हुई इस मीटिंग में जयशंकर ने भारत का रुख साफ कर दिया दिया. जयशंकर ने रूबियो को रूबियो को समझा दिया कि 140 करोड़ देशवासियों की ऊर्जा सुरक्षा भारत के लिए सबसे ऊपर है.
क्या है SRIA कानून, जिससे अमेरिका दे रहा 100% टैरिफ की धमकी?
अमेरिकी संसद ने हाल ही में ‘लिंडसे ओ ग्राहम सेंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट’ (SRIA) नाम का एक कानून पास किया है. ये कानून अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ये असीमित अधिकार देता है कि वो रूस से कच्चा तेल या गैस खरीदने वाले किसी भी देश पर 100% तक का भारी-भरकम टैरिफ लगा सकें.
भारत और चीन इस समय रूस से सबसे ज्यादा कच्चा तेल खरीद रहे हैं, इसलिए इस कानून के पास होते ही हड़कंप मच गया था. कूटनीतिक गलियारों में ये चर्चा तेज हो गई थी कि क्या अमेरिका अब भारत से आने वाले सामानों पर 100% टैक्स थोप देगा? क्या भारत की अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़ेगा? इन्हीं तमाम आशंकाओं के बीच न्यूयॉर्क में जयशंकर और मार्को रूबियो की ये अहम बैठक हुई.
‘भारत के हित सर्वोपरि’: न्यूयॉर्क बैठक के बाद जयशंकर का संदेश
अमरीकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो से हुई इस सीधी बातचीत के बाद विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करके भारत का रुख साफ कर दिया है. जयशंकर ने लिखा ‘UNGA के इतर अमेरिका के विदेश मंत्री रूबियो से मुलाकात हुई. SRIA कानून को लेकर भारत के राष्ट्रीय हितों और हमारी चिंताओं को एक बार फिर उनके सामने मजबूती से दोहराया है. इसके अलावा खाड़ी क्षेत्र और यूक्रेन की मौजूदा हालातं पर भी चर्चा हुई’.
जयशंकर के इस बयान का सीधा सा मतलब था कि भारत अमेरिका के नए कानून के सामने अपने कदम पीछे नहीं खींचने वाला है. भारतीय डेलीगेशन ने अमेरिकी टीम के सामने साफ कर दिया कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के फैसले किसी तीसरे देश के दबाव में आकर नहीं लेगा.
‘जनता सबसे पहले’: राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने अमेरिका को दिया करारा जवाब
जयशंकर की मुलाकात से ठीक पहले अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने भी अमेरिकी संसद के इस फैसले पर भारत का सख्त रुख जाहिर किया था.
क्वात्रा ने दो टूक कहा था कि जब बात ऊर्जा सुरक्षा की आती है तो भारत केवल और केवल ‘पीपल फर्स्ट’ यानी जनता सबसे पहले के सिद्धांत पर काम करता है.
विनय मोहन क्वात्रा ने अमेरिका को सीधे-सीधे समझा दिया था कि हमारे लिए सबसे पहली प्राथमिकता अपने देशवासियों की ऊर्जा सुरक्षा है. उन्होंने साफ किया कि भारत तेल कहां से खरीदेगा, ये फैसला इस बात से तय होता है कि तेल आसानी से मिल रहा है या नहीं, कितना सस्ता है, बाजार के क्या हालात हैं और बिजनेस के लिहाज से हमारे लिए क्या सही रहेगा. इतना ही नहीं, उन्होंने पूरे आंकड़े सामने रखकर अमेरिका को आईना भी दिखा दिया.
- भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल, विदेशों से आयात करता है.
- भारत अपनी जरूरत की 50% प्राकृतिक गैस दूसरे देशों से खरीदता है.
क्वात्रा ने दुनिया को याद दिलाया कि जब युद्धों की वजह से ग्लोबल मार्केट में तेल की किल्लत हुई और कीमतें भड़कीं, तब भारत ने रूस से तेल खरीदकर न केवल अपने देशवासियों को महंगाई से बचाया, बल्कि ग्लोबल ऑयल मार्केट को भी स्थिर रखा. अगर भारत तेल न खरीदता, तो दुनिया भर में कच्चे तेल के दाम आसमान छू रहे होते.
खाड़ी संकट और होर्मुज में तनातनी पर भी हुई बात
जयशंकर और रूबियो की इस मुलाकात में सिर्फ टैरिफ का मुद्दा ही नहीं गूंजा, बल्कि ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ और ‘रेड सी’ में तेल टैंकरों पर हो रहे हमलों पर भी बात हुई. खाड़ी देशों से भारत को बड़े पैमाने पर तेल मिलता है, इसलिए वहां शांति और समुद्री रास्तों की सुरक्षा भारत के लिए बेहद जरूरी है. दोनों नेताओं ने इस बात पर भी मंथन किया कि इस समुद्री रास्ते को सुरक्षित कैसे रखा जाए.
क्या वाकई अमेरिका भारत पर 100% टैरिफ लगाने की गलती करेगा?
अब सवाल उठता है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन भारत पर 100% टैरिफ लगाने का जोखिम उठा सकता है? जानकारों की मानें तो अमेरिका के लिए ऐसा करना लगभग नामुमकिन है.
- इंडो-पैसिफिक में भारत की जरूरत: चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिका को भारत के साथ की सख्त जरूरत है. भारत पर 100% टैरिफ लगाने का मतलब होगा अपने सबसे बड़े रणनीतिक साथी को नाराज करना.
- अमेरिका में भड़क सकती है महंगाई: अगर भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली जाएगी. इससे खुद अमेरिका में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ जाएंगे.
- भारत की स्वतंत्र विदेश नीति: भारत ने पिछले कुछ सालों में साबित कर दिया है कि वो किसी महाशक्ति के दबाव में काम नहीं करता.