Explainer: भारत में शादी के लिए लड़कों की उम्र 21, लड़कियों की 18 साल ही क्यों तय हुई? शारदा ऐक्ट क्या है?

Explainer: भारत में शादी के लिए लड़कों की उम्र 21, लड़कियों की 18 साल ही क्यों तय हुई? शारदा ऐक्ट क्या है?


Marriage Age in India for Girl And Boy: इस दौर में Gen-Z से लेकर मिलेनियल्स तक के लिए My Life, My Rules वाला फंडा लागू होता है. पढ़ाई से लेकर करियर और शादी तक अब अमूमन अपनी मर्जी ही चलती है. युवा खुद ही तय करते हैं कि शादी कब करनी है लेकिन हमेशा से ही ऐसा नहीं था. भारत के सामाज पर गौर करें तो यहां इतिहास में एक ऐसा दौर था जब मासूम बचपन को बिना समझे बूझे ही शादी के बंधन में बांध दिया जाता था. इस कुप्रथा के खिलाफ उठी एक आवाज ने देश की दिशा बदल दी. इसे हम शारदा ऐक्ट के नाम से जानते हैं. ये क्या था और क्यों बनाया गया? इसे लागू करवाने में किसका योगदान था? आज भारत में विवाह की कानूनी उम्र क्या है.

शारदा ऐक्ट केवल एक कानून नहीं था, बल्कि यह भारतीय समाज की उस रूढ़िवादी सोच के खिलाफ एक बड़ी बगावत थी, जो बच्चों से उनका बचपन छीन रही थी। इस कानून ने भविष्य के सुधारों की नींव रखी और आज हम जिस आधुनिक और जागरूक समाज में जी रहे हैं, उसकी दिशा तय करने में इसकी बहुत बड़ी भूमिका रही.

शारदा ऐक्ट क्या है?
शारदा ऐक्ट का आधिकारिक नाम ‘बाल विवाह रोकथाम अधिनियम, 1929’ (Child Marriage Restraint Act, 1929) था. यह ब्रिटिश भारत में पारित एक ऐसा कानून था, जिसका मकसद देश में बाल विवाह की प्रथा पर रोक लगाना था. इस कानून के तहत लड़कियों और लड़कों के लिए शादी की एक न्यूनतम कानूनी उम्र तय कर दी गई थी. इस सीमा से कम उम्र में शादी करने या करवाने वालों के लिए जुर्माने और जेल का प्रावधान किया गया था.

यह कानून क्यों बना?
19वीं और 20वीं शताब्दी की शुरुआत में भारत में बाल विवाह एक भयावह सामाजिक समस्या थी. इसकी मुख्य वजह और नतीजे भी थे.

  • स्वास्थ्य और जान का खतरा: कम उम्र में शादी और फिर जल्दी गर्भधारण की वजह से देश में मातृ मृत्यु दर और बाल मृत्यु दर बहुत अधिक थी. कई छोटी बच्चियां प्रसव के दौरान ही दम तोड़ देती थीं.
  • शिक्षा और विकास का अभाव: बाल विवाह की वजह से बच्चों और खास तौर पर लड़कियों की शिक्षा बीच में ही छूट जाती थी, जिससे उनका मानसिक और बौद्धिक विकास रुक जाता था.
  • कम उम्र में विधवा होना: उस समय बाल विवाह के चलते कई बच्चियां बहुत कम उम्र में ही विधवा हो जाती थीं और उन्हें आजीवन समाज के ताने और अमानवीय जीवन सहना पड़ता था.

इन अमानवीय प्रथाओं से समाज को मुक्ति दिलाने और बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए ही इस कड़े कानून की सख्त जरूरत महसूस हुई.

किसके प्रयास से शारदा ऐक्ट लागू हुआ?
इस ऐतिहासिक कानून को बनवाने और लागू करवाने का श्रेय मुख्य रूप से हरबिलास शारदा नामक शख्स को जाता है. वह अजमेर से एक प्रसिद्ध शिक्षाविद, जज और राजनेता थे. हरबिलास ने 1927 में केंद्रीय विधानसभा में बाल विवाह के खिलाफ एक बिल पेश किया था.

उनके अथक प्रयासों और समाज सुधारकों के भारी दबाव के बाद, कड़े विरोध के बावजूद यह बिल पारित हुआ. उन्हीं के नाम पर इस ऐक्ट को लोकप्रिय रूप से ‘शारदा ऐक्ट’ कहा जाने लगा. इस कानून को बनवाने में डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी, सरोजिनी नायडू जैसी कई समाज सुधारकों का भी बड़ा समर्थन रहा.

भारत में शादी के लिए उम्र से जुड़ा कानून
शारदा ऐक्ट को लेकर गौरतलब ये है कि शुरुआत में लड़कियों के लिए शादी की उम्र 14 साल और लड़कों के लिए 18 साल तय की गई थी. समय के साथ समाज की जरूरतों को देखते हुए इसमें संशोधन किए गए. 1978 में शारदा ऐक्ट में संशोधन करके लड़कियों के लिए विवाह की न्यूनतम उम्र बढ़ाकर 18 साल और लड़कों के लिए 21 साल कर दी गई.

वर्तमान स्थिति पर गौर करें तो आज भी भारत में कानूनी रूप से शादी के लिए न्यूनतम उम्र लड़कियों के लिए 18 साल और लड़कों के लिए 21 साल की है. हालांकि महिलाओं और पुरुषों की उम्र को एक समान 21 साल करने के लिए सरकार की तरफ से विचार और प्रयास जारी हैं, लेकिन कानूनी ढांचा इसी नियम पर आधारित है.

बाल विवाह कानून और सजा
कोई भी शादी जिसमें दुल्हन या दूल्हा इनमें से किसी भी निर्धारित उम्र से कम का है, उसे कानूनी रूप से बाल विवाह माना जाता है. भले ही वह पर्सनल कानूनों या रीति-रिवाजों के अनुसार ही क्यों ना संपन्न हुआ हो. मतलब कि लड़के के लिए 18 साल और लड़की के लिए 21 साल. यह अधिनियम बाल विवाह को एक गंभीर अपराध मानता है और इसमें शामिल होने, इसे आयोजित करने या बढ़ावा देने वाले लोगों के लिए कड़े कानूनी दंड का प्रावधान करता है.

बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 क्या है?
बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 भारत में बाल विवाह को रोकने और उसे दंडनीय अपराध बनाने के लिए मुख्य कानून है. इसने पुराने बाल विवाह रोकथाम अधिनियम, 1929 (शारदा ऐक्ट) की जगह ली जिससे कि सख्त सजा का प्रावधान किया जा सके, नाबालिग पीड़ितों की सुरक्षा की जा सके और पिछले कानूनों की कमियों को दूर किया जा सके.

  • नाबालिग से शादी करने वाले पुरुष के लिए सजा
    प्रावधान (धारा 9): कोई भी वयस्क पुरुष जो 18 साल से अधिक आयु का है और किसी बच्चे से विवाह करता है. तो उसे 2 साल तक की कठोर कैद के साथ ही 1 लाख रुपये तक के जुर्माने या दोनों से दंडित किया जा सकता है.
  • शादी कराने और शामिल लोगों के लिए सजा
    प्रावधान (धारा 10): कोई भी इंसान जो बाल विवाह करता है, आयोजित करता है, उसका संचालन करता है या उसमें सहयोग करता है उसे 2 साल तक के कठोर कारावास और 1 लाख रुपये तक के जुर्माने की सजा हो सकती है. इसमें पुरोहित-पंडित, कैटरर्स, मैरिज गार्डन के मालिक भी शामिल होते हैं. जब तक कि वह यह साबित ना कर दें कि बाल विवाह आयोजन के बारे में उन्हें पता नहीं था.
  • मां-बाप, गार्जियन और प्रमोटरों के लिए सजा
    प्रावधान (धारा 11): माता-पिता, अभिभावक या बच्चे की देखभाल करने वाला कोई भी व्यक्ति या विवाह को बढ़ावा देने या अनुमति देने वाला कोई भी व्यक्ति जो इसे रोकने में विफल रहता है, उसे 2 साल तक के कठोर कारावास और 1 लाख रुपये तक के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है.
  • अपराध की प्रकृति
    बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम के तहत सभी अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती हैं, जिसका मतलब है कि पुलिस बिना वारंट के अपराधियों को गिरफ्तार कर सकती है और जमानत मिलना अधिकार का मामला नहीं है.
  • शादी की स्थिति
    बाल विवाह शुरुआत से ही स्वचालित रूप से अवैध नहीं होता है, लेकिन यह उस पक्ष की इच्छा पर होता है जो शादी के समय नाबालिग था. वह शादी को अमान्य घोषित कराने के लिए जिला कोर्ट में याचिका दायर कर सकता है. लड़की 20 साल की उम्र तक यानी कि 18 साल की होने के 2 साल के अंदर और लड़का 23 साल की उम्र तक याचिका दायर कर सकता है.



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