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Neurosurgery New Technique: न्यूरोसर्जरी में तकनीक के विकास से कुछ चुनिंदा मामलों में ब्रेन ट्यूमर का इलाज लगभग 40 मिनट में किया जा सकता है. इसी तरह डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (DBS) जैसी तकनीकें पार्किंसन के मरीजों की जीवन गुणवत्ता सुधारने में मदद करती हैं.
दिल्ली. न्यूरोसर्जरी यानी दिमाग और नसों से जुड़ी सर्जरी की फील्ड में पिछले कुछ वर्षों में तकनीक में काफी बदलाव हुआ है. पहले जहां इलाज के ऑप्शन सीमित थे, वहीं अब एडवांस्ड मशीनों और नई तकनीकों की मदद से कई गंभीर बीमारियों का इलाज पहले से ज्यादा सटीक तरीके से किया जा रहा है. इमेजिंग तकनीक से शुरू हुआ यह सफर अब ऐसे इलाज तक पहुंच चुका है, जिनकी कुछ साल पहले कल्पना भी मुश्किल थी.
40 मिनट में ब्रेन ट्यूमर के इलाज का ऑप्शन
आर्टेमिस हॉस्पिटल के न्यूरोसर्जरी एवं सीएनएस रेडियोसर्जरी विभाग के चेयरमैन और साइबरनाइफ सेंटर के को-चीफ डॉ. आदित्य गुप्ता ने बताया कि तकनीक के विकास से ब्रेन ट्यूमर के इलाज में भी नए ऑप्शन सामने आए हैं. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि साइबरनाइफ जैसी तकनीक के जरिए कुछ चुनिंदा मामलों में ब्रेन ट्यूमर का इलाज लगभग 40 मिनट में किया जा सकता है. इस तरह के इलाज में पारंपरिक सर्जरी की तुलना में मरीज को कम परेशानी होती है और रिकवरी भी आसान हो सकती है.
पार्किंसन मरीजों के लिए डीप ब्रेन स्टिमुलेशन
डॉ. आदित्य गुप्ता ने बताया कि आधुनिक न्यूरोसर्जरी का उद्देश्य सिर्फ बीमारी का इलाज करना नहीं, बल्कि मरीज की क्वालिटी ऑफ लाइफ बेहतर करना भी है. इसी दिशा में डीप ब्रेन स्टिमुलेशन यानी DBS एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर सामने आया है. यह तकनीक खासतौर पर पार्किंसन बीमारी से जूझ रहे उन मरीजों के लिए उपयोगी हो सकती है, जिन पर दवाओं का असर कम होने लगता है या जिन्हें हर दो घंटे में दवा लेनी पड़ती है. ऐसे मामलों में मरीज की रोजमर्रा की जिंदगी काफी प्रभावित हो जाती है.
दिमाग में वायर और पेसमेकर से मिलती है मदद
डीप ब्रेन स्टिमुलेशन सर्जरी में दिमाग के एक खास हिस्से में बारीक वायर लगाए जाते हैं. इन वायर को शरीर में लगाए गए पेसमेकर जैसे उपकरण से जोड़ा जाता है. यह उपकरण दिमाग के उन हिस्सों को इलेक्ट्रिकल सिग्नल देता है, जिससे पार्किंसन के लक्षणों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है. डॉक्टर के मुताबिक, सही मरीज का चयन होने पर इस तकनीक से मरीज की गतिविधियों, रोजमर्रा के कामकाज और जीवन की गुणवत्ता में काफी सुधार देखा जा सकता है.
पार्किंसन मरीजों को निराश होने की जरूरत नहीं
डॉ. आदित्य गुप्ता ने कहा कि पार्किंसन बीमारी के मरीजों को अपनी जिंदगी की गुणवत्ता को लेकर निराश होने की जरूरत नहीं है. हालांकि यह इलाज हर मरीज के लिए नहीं होता और इसके लिए मरीज की स्थिति, बीमारी की अवस्था और दवाओं के असर की पूरी तरह जांच की जाती है. सही मरीजों का चयन कर यह तकनीक काफी प्रभावी साबित हो सकती है. डॉक्टर आदित्य का कहना है कि न्यूरोसर्जरी में लगातार हो रहे तकनीकी विकास का सबसे बड़ा उद्देश्य यही है कि मरीजों को बेहतर इलाज मिले और वे ज्यादा बेहतर, स्वतंत्र और सामान्य जीवन जी सकें.