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शरदचंद्र चट्टोपाध्याय का हमेशा याद रहने वाला नॉवेल ‘देवदास’ सिर्फ एक कहानी नहीं है, बल्कि भारतीय सिनेमा की आत्मा में गहराई से बसा एक एपिक है, जिसने हर पीढ़ी के दर्शकों को प्रभावित किया है. 1928 के साइलेंट स्क्रीन से लेकर 2002 की शानदार और रंगीन दुनिया तक, इस दुखद प्रेम कहानी पर 7 से ज्यादा लैंडमार्क फिल्में बनी हैं. हर जमाने के महान डायरेक्टर और एक्टर ने पारो, चंद्रमुखी और देवदास के प्यार, चाहत और जुदाई को अपने अनोखे तरीकों से जिंदा किया है. चाहे वह दिलीप कुमार की जबरदस्त परफॉर्मेंस हो या शाहरुख खान का इमोशनल किरदार, ‘देवदास’ सिनेमा के इतिहास की सबसे पॉपुलर अमर मास्टरपीस में से एक है.
नई दिल्ली. मशहूर बंगाली लेखक शरदचंद्र चट्टोपाध्याय का 1917 में लिखा गया सदाबहार नॉवेल ‘देवदास’ आज भी इंडियन सिनेमा की सबसे पसंदीदा कहानियों में से एक है. इस दुखद प्रेम कहानी की पॉपुलैरिटी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस पर एक ही टाइटल से अलग-अलग भाषाओं और जमाने में 7 से ज्यादा यादगार फिल्में बनी हैं. साइलेंट सिनेमा के जमाने से लेकर संजय लीला भंसाली की शानदार कलर फिल्मों तक, हर डायरेक्टर ने इस कहानी को अपने नजरिए से दिखाया है. दिलीप कुमार और शाहरुख खान वाली फिल्में सबसे ज्यादा पॉपुलर रहीं.
1928 की साइलेंट फिल्म- ‘देवदास’ का स्क्रीन पर पहली बार आना: 1928 में इंडियन सिनेमा के शुरुआती दिनों में डायरेक्टर नरेश मित्रा ने पहली बार इस मशहूर नॉवेल को ब्लैक एंड व्हाइट साइलेंट स्क्रीन पर उतारा. फणी बर्मा ने देवदास का और तारकबाला ने पारो का रोल किया. यह फिल्म बिना किसी डायलॉग के सिर्फ विजुअल्स और एक्टिंग का इस्तेमाल करके प्यार और जुदाई की दुखद कहानी को बड़े पर्दे पर लाने की एक बड़ी कोशिश बन गई.
1935 का बंगाली वर्शन- टॉकीज के दौर की पहली शुरुआत: जब इंडियन सिनेमा में साउंड (टॉकीज) का दौर शुरू हुआ, तो मशहूर डायरेक्टर प्रमथेश बरुआ ने 1935 में पहला बंगाली वर्शन बनाया, जिसमें खुद देवदास ने एक्टिंग की थी. जमुना बरुआ ने पारो का रोल किया था. इस फिल्म ने पहली बार स्क्रीन पर देवदास के दुख भरे किरदार को गहराई से दिखाया जो जुदाई, शराब और चाहत से भरा था.
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1936 का हिंदी वर्शन- केएल सहगल का दिल को छू लेने वाला इंप्रेशन: 1935 की फिल्म की सफलता के बाद, डायरेक्टर प्रमथेश बरुआ ने 1936 में फिल्म को हिंदी में दोबारा बनाया. मशहूर सिंगर और एक्टर कुंदन लाल (केएल) सहगल ने देवदास का रोल किया. सहगल की दिल को छू लेने वाली आवाज और उनके गाए गानों ने इस हिंदी वर्शन को अमर कर दिया, जिससे ‘देवदास’ का नाम इंडियन सबकॉन्टिनेंट के कोने-कोने तक पहुंच गया.
1953 की ‘देवदासु’- साउथ इंडियन सिनेमा की एक कल्ट क्लासिक: साउथ इंडियन सिनेमा ने 1953 में वेदांतम राघवैया के डायरेक्शन में इस कहानी को तेलुगु और तमिल में ‘देवदासु’ के नाम से रीमेक किया. लेजेंडरी एक्टर अक्किनेनी नागेश्वर राव (एएनआर) और सावित्री स्टारिंग इस फिल्म को साउथ इंडियन सिनेमा की सबसे बड़ी क्लासिक्स में से एक माना जाता है. एएनआर की परफॉर्मेंस को आज भी तेलुगु फिल्म हिस्ट्री में एक माइलस्टोन माना जाता है.
1955 का हिंदी सिनेमा- दिलीप कुमार की मास्टरपीस: 1955 में बिमल रॉय द्वारा डायरेक्ट की गई ‘देवदास’ को हिंदी सिनेमा के सबसे ऑथेंटिक और पावरफुल अडैप्टेशन में से एक माना जाता है. दिलीप कुमार ने देवदास का टाइमलेस रोल निभाया, जबकि सुचित्रा सेन ने पारो और वैजयंतीमाला ने चंद्रमुखी का रोल किया. दिलीप कुमार की परफॉर्मेंस की गहराई ने इस फिल्म को दुनिया भर के सिनेमाई लेजेंड्स के बीच अमर कर दिया है.
1979 का बंगाली सिनेमा- सौमित्र और उत्तम कुमार का संगम: 1979 में बंगाली सिनेमा ने एक बार फिर इस कहानी को बड़े पर्दे पर उतारा, जिसे दिलीप रॉय ने डायरेक्ट किया था. फिल्म की सबसे बड़ी USP इसकी स्टार कास्ट थी. लेजेंडरी सौमित्र चटर्जी ने देवदास का रोल किया था और बंगाली सिनेमा के ‘महानायक’ उत्तम कुमार ने चुन्नीलाल का रोल किया था. इस फिल्म ने बंगाली दर्शकों को एक नया सिनेमाई एक्सपीरियंस दिया.
2002 का मॉडर्न सिनेमा- संजय लीला भंसाली की ग्रैंड मास्टरपीस: 2002 में डायरेक्टर संजय लीला भंसाली ने मॉडर्न टेक्नोलॉजी, शानदार सेट और एक ऐसे कैनवस के साथ ‘देवदास’ को फिर से बनाया जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय और माधुरी दीक्षित की शानदार परफॉर्मेंस, पंडित बिरजू महाराज की कोरियोग्राफी और इस्माइल दरबार के म्यूजिक ने इसे ग्लोबल हिट बना दिया. इसे मशहूर कान्स फिल्म फेस्टिवल में भी दिखाया गया था.