दिल्ली में ‘चिंकी’ सुनाई देना बंद होगा? मिरांडा हाउस में मणिपुर गर्ल का डंका
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दिल्ली यूनिवर्सिटी के मिरांडा हाउस में मणिपुर की मटिल्डा लौरेम्बम प्रेसिडेंट चुनी गई हैं. यह नॉर्थईस्ट के छात्रों के लिए एक ऐतिहासिक जीत है. लेकिन इस जीत के पीछे एक कड़वा सच भी छिपा है. दिल्ली समेत पूरे देश में नॉर्थईस्ट के लोगों को ‘चिंकी’ और ‘मोमो’ जैसे कैजुअल रेसिज्म का सामना करना पड़ता है. एंजेला चकमा और चोंगथम विक्रम सिंह की हत्याएं इसका खौफनाक उदाहरण हैं. यह ओपिनियन पीस इसी दोहरे रवैये पर गहरी चोट करता है.
दिल्ली यूनिवर्सिटी का मिरांडा हाउस देश का टॉप विमेंस कॉलेज है. यहां की छात्र राजनीति में एक नया इतिहास रचा गया है. मणिपुर की मटिल्डा लौरेम्बम 2026-27 के लिए प्रेसिडेंट चुनी गई हैं. वह इस पद तक पहुंचने वाली नॉर्थईस्ट की पहली छात्रा हैं. यह जीत सिर्फ एक इलेक्शन का नतीजा नहीं है. यह उस समुदाय की आवाज है जिसे अक्सर मेनस्ट्रीम से काट दिया जाता है. लेकिन इस जश्न के बीच एक स्याह हकीकत भी है. एक तरफ हम मटिल्डा की शानदार जीत पर तालियां बजाते हैं. दूसरी तरफ दिल्ली और देश के बाकी हिस्सों में नॉर्थईस्ट के बच्चों को ‘चिंकी’ या ‘मोमो’ कहकर चिढ़ाया जाता है. यह कैजुअल रेसिज्म हमारे समाज की नसों में जहर की तरह बह रहा है. जब मणिपुर जल रहा है तब वहां की एक लड़की का यह मुकाम हासिल करना बड़ी बात है. पर क्या यह जीत उस नस्लभेदी सोच को बदल पाएगी.
मिरांडा हाउस में मटिल्डा लौरेम्बम की यह जीत इतनी खास क्यों? मिरांडा हाउस एनआईआरएफ रैंकिंग में हमेशा टॉप पर रहता है. यहां का इलेक्शन पूरे दिल्ली यूनिवर्सिटी के मूड को सेट करता है. मटिल्डा लौरेम्बम ने भारी मार्जिन से यह चुनाव जीता है. उनका प्रेसिडेंट बनना इस बात का सबूत है कि कैंपस में बदलाव की हवा चल रही है. छात्रों ने एक समावेशी और प्रोग्रेसिव लीडरशिप को चुना है. मटिल्डा का मैनिफेस्टो सीधे छात्रों की परेशानी से जुड़ा था. उन्होंने हॉस्टल में सीट बढ़ाने की बात की. बाहरी छात्रों के लिए अकोमोडेशन को आसान बनाने का वादा किया.
इसके अलावा मेंटल हेल्थ और कैंपस में एंटी-डिस्क्रिमिनेशन जैसे मुद्दों को मजबूती से उठाया. यह जीत नॉर्थईस्ट के उन हजारों छात्रों के लिए एक उम्मीद है जो दिल्ली पढ़ने आते हैं. उन्हें अब लगने लगा है कि वे भी इस डेमोक्रेटिक सिस्टम का एक अहम हिस्सा हैं. यह उनके राजनीतिक और सामाजिक अस्तित्व की एक बड़ी छलांग है. मटिल्डा ने डिजिटल लाइब्रेरी एक्सेस और लेबोरेटरी फैसिलिटी को बेहतर बनाने का भी प्रॉमिस किया है. उनके इलेक्शन कैंपेन ने एक नए तरह के स्टूडेंट मूवमेंट की नींव रखी है.
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क्या मिरांडा हाउस में एक चुनाव जीतने से मणिपुर का दर्द भुलाया जा सकता है? मटिल्डा की यह जीत ऐसे वक्त में आई है जब उनका अपना राज्य मणिपुर गहरे संकट से गुजर रहा है. वहां के हालात किसी से छिपे नहीं हैं. हिंसा और तनाव ने लोगों की जिंदगियों को बुरी तरह झकझोर दिया है. ऐसे माहौल में मणिपुर से निकलकर दिल्ली आना और यहां के सबसे बड़े कॉलेज में अपना झंडा गाड़ना आसान नहीं होता. यह जीत उस दर्द पर एक मरहम की तरह है. लेकिन यह मरहम उस गहरे घाव को पूरी तरह नहीं भर सकता.
मणिपुर के युवा जब बाहर निकलते हैं तो वे अपने साथ अपने घर की चिंता लेकर चलते हैं. उन्हें पढ़ाई के प्रेशर के साथ-साथ अपने परिवार की सेफ्टी की भी फिक्र होती है. मटिल्डा का प्रेसिडेंट बनना एक सिंबॉलिक मैसेज है. यह बताता है कि तमाम मुश्किलों के बावजूद वहां के युवाओं में लीडरशिप की असीम क्षमता है. वे सिर्फ पीड़ित बनकर नहीं रहना चाहते हैं. वे सिस्टम में आकर बदलाव लाना चाहते हैं. यह मेंटल बर्नआउट और सर्वाइवल की एक बहुत लंबी लड़ाई है. मटिल्डा की जीत दिखाती है कि उम्मीद अभी जिंदा है.
‘चिंकी’ और ‘मोमो’ जैसे शब्दों के पीछे छिपा कैजुअल रेसिज्म: भारत की राजधानी दिल्ली हो या कोई और बड़ा शहर. नॉर्थईस्ट के लोगों के लिए कैजुअल रेसिज्म रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. मेघालय स्टूडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन की जनरल सेक्रेटरी चेल्सी गाबिल मोमिन का दर्द इसे साफ बयान करता है. उनका कहना है कि लोग उन्हें मोमो या चिंकी कहकर बुलाते हैं. जब वे अपने दोस्तों के साथ अपनी भाषा में बात करते हैं तो लोग उन्हें अजीब नजरों से देखते हैं. यह रेसिज्म इतना नॉर्मल हो गया है कि कई बार लोग इसका विरोध करना भी छोड़ देते हैं. महिलाओं के लिए यह और भी ज्यादा खतरनाक हो जाता है. उन्हें सिर्फ नस्लभेद ही नहीं बल्कि सेक्सुअल हैरेसमेंट का भी सामना करना पड़ता है. चेल्सी बताती हैं कि उनकी मां ने उनसे कहा, ‘कोई धर्म पूछे तो जवाब मत देना’. यह खौफ किस बात का इशारा करता है. यह कैसा समाज है जो अपने ही देश के नागरिकों को एलियन की तरह ट्रीट करता है. हम डायवर्सिटी का जश्न मनाने का दिखावा करते हैं. लेकिन हकीकत में हम इस कैजुअल रेसिज्म के जरिए उनकी पहचान को रोज कुचलते हैं.
एंजेला चकमा और विक्रम सिंह की हत्याएं हमारी नफरत का नतीजा: यह रेसिज्म सिर्फ चिढ़ाने तक सीमित नहीं है. यह कई बार खौफनाक और जानलेवा बन जाता है. दिसंबर 2025 में देहरादून में त्रिपुरा के छात्र एंजेला चकमा की निर्मम हत्या कर दी गई. वह एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी में एमबीए का स्टूडेंट था. उसके पिता मणिपुर में बीएसएफ के जवान हैं. एंजेला का कसूर सिर्फ इतना था कि उसने अपने भाई को रेसिस्ट कमेंट्स से बचाने की कोशिश की थी. हमलावरों ने उन्हें गालियां देते हुए कहा, ‘चाइनीज मोमो’. देहरादून के एसएसपी अजय सिंह ने कहा, ‘यह कोई नस्लभेदी हमला नहीं था’.
लेकिन समुदाय के लोग जानते हैं कि सच्चाई क्या है. इसी तरह सितंबर के महीने में दिल्ली के किलोकरी गांव में मणिपुरी सिंगर चोंगथम विक्रम सिंह को पीट-पीटकर मार डाला गया. 55 साल के विक्रम को एक मामूली सी बात पर इतनी भयानक मौत दी गई. उनकी पड़ोसन चंदन मिरोदा देवी ने उस खौफनाक रात का मंजर बताया है. उन्होंने कुछ लोगों को फोन पर चिल्लाते हुए सुना था. ये सिर्फ मर्डर केस नहीं हैं. ये इस बात का सबूत हैं कि नस्लभेदी नफरत किस हद तक हिंसक हो सकती है.
अपने ही देश में अजनबी और खौफ के साये में जीने को मजबूर नॉर्थईस्ट के छात्र: एंजेला चकमा की हत्या के बाद दिल्ली के जंतर मंतर पर सैकड़ों छात्रों ने कड़कड़ाती ठंड में प्रोटेस्ट किया. छात्रों ने अपने पोस्टर्स के जरिए कहा, ‘हम चाइनीज नहीं इंडियन हैं और नॉर्थईस्ट का होना कोई अपराध नहीं है’. ये पोस्टर सिर्फ कागज के टुकड़े नहीं थे. ये एक समुदाय की वह चीख थी जिसे सिस्टम सुनने से इनकार कर रहा है. नॉर्थईस्ट स्टूडेंट्स सोसायटी डीयू की जनरल सेक्रेटरी अभिलाषा सैकिया ने कहा, ‘ऐसे हमले लगातार बढ़ रहे हैं’. सफदरजंग जैसे इलाकों में जहां मेनस्ट्रीम के लोग भी रहते हैं वहां से सबसे ज्यादा केस आते हैं. छात्रों को पीटा जाता है और उनके साथ बुरा बर्ताव किया जाता है. एनएसयूआई के सदस्य कबीर ने कहा, ‘पुलिस और प्रशासन कोई सख्त एक्शन नहीं लेते’. सबसे दुखद यह है कि जब तक किसी की जान नहीं चली जाती तब तक कोई इस मुद्दे पर बात नहीं करता. छात्र दिल्ली या दूसरे शहरों में सिर्फ अपना करियर बनाने आते हैं. वे यहां प्रोटेस्ट करने या अपनी जान बचाने के लिए नहीं आते. उन्हें एक सुरक्षित माहौल देना सरकार और हमारी जिम्मेदारी है.
क्या मटिल्डा लौरेम्बम की जीत एक नए बदलाव की शुरुआत बन पाएगी?
मटिल्डा लौरेम्बम का मिरांडा हाउस प्रेसिडेंट बनना उम्मीद की एक नई किरण है. उन्होंने अपने कैंपेन में एंटी-डिस्क्रिमिनेशन और जीरो टॉलरेंस की बात की है. उनका यह एजेंडा नॉर्थईस्ट के छात्रों के लिए एक सुरक्षा कवच बन सकता है. यह चुनाव सिर्फ एक कॉलेज का इलेक्शन नहीं है. यह इस बात का मैसेज है कि अब नॉर्थईस्ट के छात्र चुपचाप जुल्म सहने वाले नहीं हैं. वे लीडरशिप रोल्स में आकर खुद अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं. ग्रीवांस रिड्रेसल मैकेनिज्म को मजबूत करने का मटिल्डा का वादा बहुत अहम है. वे सिस्टम का हिस्सा बनकर सिस्टम को बदलने की ताकत रखते हैं. अब वक्त आ गया है कि देश का बाकी हिस्सा भी अपनी सोच बदले. ‘चिंकी’ और ‘चाइनीज’ जैसे भद्दे शब्दों को अपनी डिक्शनरी से बाहर निकाले. कैजुअल रेसिज्म को नॉर्मल मानना बंद करना होगा. मटिल्डा की जीत एक शुरुआत है. प्रशासन के साथ नेगोशिएशन और एनुअल फेस्टिवल की प्लानिंग अब उनके हाथों में है. असली जीत तब होगी जब जंतर मंतर पर किसी छात्र को अपनी भारतीय पहचान साबित करने के लिए पोस्टर नहीं पकड़ना पड़ेगा.