पितृपक्ष में इस विधि से करें तर्पण, मातृ-पितृ कुल की 3 पीढ़ियों का होगा उद्धार
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इस साल 26 सितंबर को ऋषि तर्पण होगा. इसके बाद 27 सितंबर से पितृ तर्पण शुरू होगा. पार्वण विधि से तर्पण करने पर मातृ और पितृ दोनों कुलों की तीन पीढ़ियों का उद्धार होता है और पितरों को मोक्ष मिलता है. दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलानुशासक डॉ. कुणाल कुमार झा ने इस संबंध में विस्तार से बताया है.
दरभंगा: सनातन धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व है. इस दौरान पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म किए जाते हैं. कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलानुशासक डॉ. कुणाल कुमार झा के अनुसार इस वर्ष पितृपक्ष से ठीक एक दिन पहले ‘ऋषि तर्पण’ करने का विधान है.
26 सितंबर से शुरू होगा तर्पण का कार्य
डॉ. कुणाल कुमार झा ने बताया कि इस वर्ष पितृपक्ष की शुरुआत 27 सितंबर से हो रही है. यह 10 अक्टूबर को समाप्त होगा. हालांकि, तर्पण का कार्य एक दिन पहले यानी 26 सितंबर से ही शुरू हो जाएगा .सबसे पहले 26 सितंबर को ऋषि तर्पण किया जाएगा. इसके बाद 27 सितंबर से पितरों के तर्पण की शुरुआत होगी. भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा की तिथि को अगस्त्य मुनि को अर्घ्य दान देने का भी विशेष महत्व बताया गया है.
तीन पीढ़ियों के उद्धार के लिए पार्वण का विधान
पितरों को प्रसन्न और तृप्त करने के लिए तर्पण किया जाता है. शास्त्रों में मातृ पक्ष और पितृ पक्ष की तीन पीढ़ियों के पितरों को तृप्त करने के लिए पार्वण का विधान है. परिवार के जो सदस्य जिस तिथि को दिवंगत (देवलोकवासी) हुए हैं, उसी तिथि को पार्वण श्राद्ध किया जाता है.
पार्वण श्राद्ध करने का लाभ
पार्वण करने से दोनों कुलों (माता और पिता के पक्ष) की तीन-तीन पुश्तों का पिंडदान हो जाता है. साथ ही दोनों कुलों के पिंडों का आपस में मिलन भी होता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृपक्ष में सच्चे मन और सही विधि से किया गया तर्पण और पिंडदान पितरों को मोक्ष प्रदान करता है. इससे परिवार पर पितरों का आशीर्वाद बना रहता है.