OPINION: पंजाब चुनाव में फिर गूंजने लगा नशे का पुराना राग, सीमा पार साजिश का बहाना कब तक?

OPINION: पंजाब चुनाव में फिर गूंजने लगा नशे का पुराना राग, सीमा पार साजिश का बहाना कब तक?


पंजाब का चुनाव सिर पर है और फिर वही पुराना राग शुरू हो गया है. दल नशे को सबसे बड़ा मुद्दा बनाकर मैदान में उतर रहे हैं. पिछली बार सत्ता संभालने वाली पार्टी ने वादा किया था कि आधे साल में नशे का कारोबार समेट दिया जाएगा. पांच साल बीत चुके. सड़कें, गांव और युवा वही दर्द झेल रहे हैं. अब वही दल राजनीतिक उलझनों और सीमा पार साजिश का हवाला दे रहा है.

यह पूछना जरूरी है कि नशा क्या सिर्फ वोट मांगने का औजार है. और क्या यह बीमारी केवल पंजाब तक सीमित है. दोनों सवालों का उत्तर एक ही है. नहीं. बीते दिनों पंजाब के डेरा बस्सी, मोहाली और पटियाला जैसे शहरों में घूमते हुए कई पत्रकारों, युवाओं और महिलाओं से बात हुई. सबका कहना था कि नशा पंजाब को खोखला कर चुका है. इस समस्या का हल होना चाहिए.

भारत के लिए यह महज राज्य की समस्या नहीं, राष्ट्र की आपदा है. इससे पार पाने के लिए वैसा ही इकट्ठा संकल्प चाहिए जैसा नक्सलवाद के खिलाफ चला. तब पीड़ित राज्यों ने केंद्र के साथ मिलकर काम किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे देश को नशा मुक्त करने का लक्ष्य दिया है. गृह मंत्री अमित शाह उस लक्ष्य को जमीन पर उतारने के रास्ते बना रहे हैं.

लत रातोंरात नहीं लगती. पहले मजा होता है, फिर दिखावा. कुछ के लिए यह स्टेटस भी बन जाता है. धीरे-धीरे वही शौक जाल बन जाता है. पैसा खत्म होता है, परिवार टूटता है, विश्वास जाता है और कई घरों में अंतिम संस्कार भी इसी रास्ते आ जाता है. जो इस धंधे को चलाते हैं, वे अक्सर छोटे जुर्म से बड़े अपराध तक पहुंच जाते हैं.

नशेड़ी को सामान्य जिंदगी में लौटाना हर सरकार के लिए कठिन काम है. अस्पताल और काउंसलिंग तब तक अधूरे रहेंगे जब तक बाजार में माल आता रहेगा. सिर्फ उपदेश से आदत नहीं छूटती. जबरदस्ती छुड़ाने की कोशिश कई बार जान भी ले चुकी है.

यह केवल शरीर का रोग नहीं. यह घर तोड़ता है और समाज की जड़ें कमजोर करता है. गांव में भी है, महानगर में भी है, सीमा पर भी है और देश के भीतर भी. अपराध से इसका रिश्ता गहरा है. छोटी गैंग से लेकर विदेशी सिंडिकेट तक एक ही श्रृंखला जुड़ी हुई है. इसलिए यह लड़ाई थोड़े पोस्टर और कुछ गिरफ्तारियों से नहीं जीती जा सकती.

मोदी सरकार ने इसे चुनावी मौसम का विषय न मानकर लंबी लड़ाई की तरह देखा है. सरकारी एजेंसियां, राज्य और आम लोग को साथ लेकर नशे से लड़ने की कोशिश की गई है. सोच साफ है. सरकार अकेली नहीं लड़ सकती. समाज अगर चुप रहा तो नशा फिर घर कर जाएगा.

2019 में अमित शाह ने ड्रग नेटवर्क के खिलाफ एक समन्वित अभियान की नींव रखी. तब से काम रोडमैप के साथ चल रहा है. लक्ष्य 2029 तक देश को नशा मुक्त बनाना है. 2047 का विकसित भारत तभी संभव है जब यह व्यापार और यह आदत दोनों खत्म हों. इस साल जून में 2026-2029 का विजन दस्तावेज आया. उसमें तीन साल का खाका है. सबसे ऊपर खुफिया जानकारी है और उसी जानकारी पर चलने वाले ऑपरेशन हैं. कच्चे माल और सिंथेटिक ड्रग्स की सप्लाई तोड़ने का काम भी उसी योजना का हिस्सा है.

धंधे को जड़ से काटने के लिए शाह का फॉर्मूला तीन शब्दों में है. पहले पता लगाओ, फिर पहुंच रोकों, फिर माल नष्ट करो. अंतरराष्ट्रीय गिरोहों से भिड़ंत है, इसलिए तैयारी भी उसी नाप की रखी गई है.

पंजाब को केंद्र ने चुनावी नक्शे से अलग देखकर संवेदनशील क्षेत्र माना है. अमृतसर, गुरदासपुर, तरनतारन, लुधियाना, फिरोजपुर और फाजिल्का सबसे ज्यादा चपेट में हैं. इन्हें अति संवेदनशील ड्रग जोन कहा गया है. पांच जिले पाकिस्तान से सटी सीमा पर हैं. ड्रोन से आने वाले माल के सबूत बार-बार मिले हैं. गृह मंत्रालय चाहता है कि मार्च 2027 तक सीमा पर एंटी-ड्रोन सिस्टम और मजबूत निगरानी लग जाए. नार्को-आतंक से जुड़े करीब सौ फरार लोगों की पहचान हो चुकी है. उन पर कार्रवाई चल रही है.

गृह मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, देश में सौ से अधिक बड़े नेटवर्क चल रहे थे. उन्हें तोड़ने के अभियान जारी हैं और नतीजे भी आए हैं. 2019 से जुलाई 2026 के बीच 93.3 लाख किलो से अधिक नशीले पदार्थ जब्त हुए. कीमत करीब 1.53 लाख करोड़ रुपये बताई गई. शून्य सहनशीलता के तहत विदेश बैठे अपराधियों को लौटाने का काम तेज हुआ है. देश के अंदर छापे जारी हैं. 2024 में अकेले 25,330 करोड़ रुपये का माल पकड़ा गया. अगस्त में वीरेंद्र सिंह बसोया को संयुक्त अरब अमीरात से लाया गया. ऑपरेशन ग्लोबल हंट में मोहम्मद सलीम डोला तुर्की से आए. राजस्थान के एक छापे में चार लोग गिरफ्तार हुए.

2029 तक लक्ष्य पूरा करने के लिए नार्को समन्वय केंद्र 334 से बढ़ाकर 1,751 किए जा रहे हैं. पंजाब में जागरूकता के लिए नशा मुक्त पंजाब यात्राएं निकाली गई हैं. सिलसिला 30 सितंबर को जालंधर में रुकेगा. संभावना है कि गृह मंत्री वहीं लोगों से सीधे बात करें.

अगर नशा सिर्फ मंच का विषय रह गया तो सबसे महंगी कीमत युवा चुकाएंगे. आपूर्ति खुली रही तो नारे खोखले रहेंगे. घर अगर चुप रहे तो सरकार का हाथ छोटा पड़ जाएगा. पंजाब की तकलीफ पूरे देश के लिए घंटी है. चुनाव आए या जाए, यह लड़ाई तब तक अधूरी है जब तक संकल्प मौसम के साथ न बदले.



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