BIPARD में व्याख्यान के नाम पर लाखों का भुगतान, अफसरों और करीबियों को बड़ी रकम मिलने का दावा

BIPARD में व्याख्यान के नाम पर लाखों का भुगतान, अफसरों और करीबियों को बड़ी रकम मिलने का दावा


बिहार इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन एंड रूरल डेवलपमेंट यानी BIPARD में होने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रमों से जुड़ी भुगतान व्यवस्था को लेकर एक और बड़ा सवाल सामने आया है. दस्तावेजों के मुताबिक कई अधिकारियों, BIPARD से जुड़े लोगों और कुछ बाहरी व्यक्तियों को अतिथि व्याख्यान के नाम पर लाखों रुपये का भुगतान किया गया है. सिर्फ सामने आए आठ नामों का कुल भुगतान करीब 1 करोड़ 80 लाख रुपये बैठता है. इनमें एक फैकल्टी को तीन वित्तीय अवधियों में 83 लाख रुपये से ज्यादा मिलने का विवरण है और दस्तावेजों के मुताबिक बिपार्ड पटना और गया दोनों जगह से भारी भुगतान हुआ है.

BIPARD में ट्रेनिंग, फिर व्याख्यान के नाम पर अलग भुगतान क्यों

बता दें कि BIPARD बिहार सरकार का प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थान है, जहां सरकारी सेवकों के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण से जुड़े कार्यक्रम संचालित होते हैं. संस्थान की आधिकारिक वेबसाइट भी इसे सरकारी अधिकारियों के प्रशिक्षण से जुड़े संस्थान के रूप में दर्शाती है. BIPARD का पटना और गया में प्रशिक्षण ढांचा है और संस्थान की गतिविधियों में विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रम शामिल हैं. News18 को उपलब्ध दस्तावेजों में अलग-अलग वर्षों में Lecture/Honorarium के नाम पर किए गए भुगतान का विवरण है. यही आंकड़े अब पूरी भुगतान प्रक्रिया पर सवाल खड़ा कर रहे हैं.

बड़े नाम, 1.80 करोड़ से ज्यादा का भुगतान

उपलब्ध भुगतान विवरण को जोड़ने पर इन आठ नामों को कुल 1,80,38,950 रुपये का भुगतान दर्ज है. इन आंकड़ों में सबसे अलग मामला आशीष मनस्विन का दिखता है. उपलब्ध दस्तावेज के मुताबिक 2023-24 में 11.48 लाख, 2024-25 में 9.25 लाख और अप्रैल से अगस्त 2025 के बीच 62.82 लाख रुपये का भुगतान दर्ज है. तीनों अवधियों का कुल 83.55 लाख रुपये है.

  • अविनाश कुमार झा, सामान्य प्रशासन विभाग के अधिकारी. तीन साल में कुल 12 लाख 56 हजार 150 रुपये.
  • गोपाल मीणा, IAS. कुल 14 लाख 45 हजार रुपये.
  • हिम्मेश्वर सिंह, सामान्य प्रशासन विभाग. कुल 17 लाख 92 हजार 450 रुपये.
  • रवि कांत देव, कारा अधिकारी. कुल 17 लाख 70 हजार 75 रुपये.
  • पप्पू कुमार चंद्रवंशी, BRS. कुल 7 लाख 13 हजार रुपये.
  • कामेश्वर ओझा, FA, CNLU. कुल 18 लाख 17 हजार 675 रुपये.
  • बिपार्ड गया के एक अधिकारी ने इनके ज्यादा भुगतान की शिकायत भी की थी.
  • ज्योति रानी, पत्नी नीरज झा पूर्व बेउर जेल अधीक्षक. कुल 8 लाख 89 हजार 200 रुपये.
  • नौशाद अहमद खान, सेवानिवृत्त BDO. आरोप है कि ये तीन जगह से पैसा ले रहे हैं. पेंशन,
  • बिपार्ड गया में फैकल्टी की मासिक सैलरी और व्याख्यान का अलग भुगतान.
  • संगीता रेड्डी, फैकल्टी बिपार्ड गया. इन्हें मासिक सैलरी के अलावा व्याख्यान का भी भुगतान मिला है.
  • मिनती चकलानवीस, पटना वुमेंस कॉलेज में मास कम्युनिकेशन की HOD. इन्हें 20 लाख से अधिक का भुगतान किया गया है.
  • गौतम आर्या, पहले बिपार्ड गया में थे, अभी शेखपुरा में पदस्थ हैं. सुपौल में इन पर गबन का आरोप भी लग चुका है.

कुछ नाम सरकारी सेवा से जुड़े, कुछ BIPARD से

सूची में कई ऐसे नाम हैं जो सरकारी सेवा से जुड़े बताए गए हैं. इसमें सामान्य प्रशासन विभाग के अधिकारी, कारा विभाग से जुड़े अधिकारी और BRS अधिकारी शामिल हैं. इसके अलावा BIPARD के अपने फैकल्टी से जुड़े नाम भी हैं. संगीता रेड्डी, BIPARD गया की फैकल्टी, को भी व्याख्यान के लिए भुगतान किए जाने का दावा दस्तावेजों में सामने आया है. सवाल यह है कि नियमित वेतन पाने वाले फैकल्टी को अलग से Lecture Honorarium किन परिस्थितियों में दिया गया. इसी तरह नौशाद अहमद खान, जो सेवानिवृत्त BDO बताए गए हैं, के बारे में आरोप है कि उन्हें पेंशन के साथ BIPARD में फैकल्टी के रूप में मासिक भुगतान और व्याख्यान के लिए अलग भुगतान मिला.

एक शिकायत के बाद भी जारी रहा भुगतान?

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक कामेश्वर ओझा को किए गए भुगतान को लेकर BIPARD गया के एक अधिकारी की ओर से शिकायत भी की गई थी. इसके बावजूद व्याख्यान और भुगतान जारी रहने का आरोप है. इसी सूची में मिनती चकलानवीस, पटना वीमेंस कॉलेज की पूर्व मास कम्युनिकेशन HOD, का नाम भी है. उन्हें BIPARD की ओर से 20 लाख रुपये से अधिक भुगतान किए जाने का दावा किया गया है.

सरकारी अधिकारी को व्याख्यान के पैसे लेने से पहले अनुमति जरूरी?

यहीं से मामला सिर्फ भुगतान की रकम का नहीं, बल्कि सरकारी सेवा नियमों का भी हो जाता है.
बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली, 1976 के नियम 16(5) के मुताबिक कोई सरकारी सेवक किसी सार्वजनिक निकाय या निजी व्यक्ति के लिए किए गए काम के बदले शुल्क सरकार या निर्धारित प्राधिकारी की मंजूरी के बिना स्वीकार नहीं कर सकता. नियम 16 में सरकारी सेवक के बाहरी काम और रोजगार से जुड़े प्रावधान भी हैं. इसलिए इस मामले में अहम सवाल यह है कि जिन सरकारी अधिकारियों को BIPARD से व्याख्यान का भुगतान मिला, क्या उन्होंने अपने मूल विभाग से आवश्यक अनुमति ली थी? अगर अनुमति ली गई थी तो उसकी प्रतियां क्या हैं और क्या भुगतान उन्हीं स्वीकृत शर्तों के अनुसार हुआ? ऐसे में सिर्फ भुगतान नहीं, व्याख्यानों की संख्या और दर भी जांच के दायरे में है.

RTI के बाद शिकायत, अब जांच की बारी

इस पूरे मामले को लेकर एक RTI कार्यकर्ता ने निगरानी अन्वेषण ब्यूरो और आर्थिक अपराध इकाई को शिकायत भेजे जाने की जानकारी दी है. शिकायत में भुगतान, सरकारी अधिकारियों की भूमिका और अनुमति से जुड़े सवाल उठाए गए हैं और दस्तावेजों में दर्ज बड़ी रकम और सरकारी अधिकारियों से जुड़े नामों ने व्याख्यान भुगतान की पूरी व्यवस्था की जांच की जरूरत जरूर पैदा कर दी है. अब सवाल यह है कि BIPARD इन भुगतान की स्वीकृति, व्याख्यान की संख्या, उपस्थिति, भुगतान दर और संबंधित अधिकारियों की विभागीय अनुमति के दस्तावेज सार्वजनिक करता है या नहीं. क्योंकि अगर हर भुगतान नियम और रिकॉर्ड के मुताबिक हुआ है तो वही दस्तावेज इस पूरे विवाद का सबसे सीधा जवाब भी हो सकते हैं.



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