इस्लामाबाद: बलूचिस्तान के तपते रेगिस्तानों से पाकिस्तान की सेना की शर्मनाक तस्वीर सामने आई है. बलोच लिबरेशन आर्मी (BLA) से खौफ खाई पाकिस्तानी फौज अपने ही साथी सैनिकों की लाशों को रेगिस्तान में सड़ने के लिए छोड़कर दुम दबाकर भाग खड़ी हुई है. पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर इस खौफनाक मंजर पर मुंह छुपाए बैठे हैं. 1999 के कारगिल युद्ध में अपने मारे गए जवानों के शवों को लेने से इनकार करने वाली पाकिस्तानी सेना की ये वही पुरानी ‘चूहानीति’ है, जो 2026 में भी रत्ती भर नहीं बदली है. न्यूज 18 से खास बातचीत में डिफेंस एक्सपर्ट मेजर गौरव आर्या ने पाकिस्तानी फौज की इस कायराना करतूत की पोल खोलकर रख दी है.
कारगिल की वही पुरानी ‘चूहानीति’, जो 2026 में भी नहीं बदली
1999 के कारगिल युद्ध का वो मंजर पूरी दुनिया को याद है, जब पाकिस्तानी सेना ने अपने ही ‘नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री’ के सैकड़ों जवानों की लाशों को पहचानने तक से इनकार कर दिया था. उस वक्त भारतीय सेना ने अपनी इंसानियत और फौजी परंपरा का परिचय देते हुए उन दुश्मन सैनिकों का पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया था. आज 2026 में बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के इलाकों में वही इतिहास फिर दोहराया जा रहा है.
बलूचिस्तान के दूर-दराज इलाकों में BLA के लड़ाके जब पाकिस्तानी सेना और रेंजर्स की चौकियों पर हमला बोलते हैं, तो पाकिस्तानी फौजी अपने साथियों के शवों को वहीं छोड़कर भाग निकलते हैं. दुनिया की किसी भी इज्जतदार सेना का सबसे पहला नियम होता है- ‘नो वन लेफ्ट बिहाइंड’ यानी अपने किसी भी साथी को पीछे नहीं छोड़ना. लेकिन पाकिस्तानी फौज के लिए ये नियम सिर्फ कागजों तक सीमित है. अपने ही जवानों के शवों को लावारिस छोड़कर भागना, किसी सेना के लिए सबसे कायराना हरकत है.
‘टैक्टिकली ब्रिलियंट और स्ट्रैटेजिकली स्टुपिड’ है मुनीर सेना
रक्षा विशेषज्ञ अभिजीत अय्यर-मित्रा के एक विश्लेषण का जिक्र करते हुए मेजर गौरव आर्या ने बताया कि पाकिस्तानी सेना ‘टैक्टिकली ब्रिलियंट और स्ट्रैटेजिकली स्टुपिड’ है. इसका सीधा और सरल मतलब ये है कि छोटे स्तर पर चालाकी करने, चुपके से किसी इलाके में घुसपैठ करने या अचानक हमला करने में तो ये फौज बहुत उस्ताद बनती है, जैसा कि उन्होंने कारगिल में किया था. लेकिन जैसे ही सामने से करारा पलटवार होता है और जंग का मैदान गर्म होता है, ये फौज पूरी तरह से बिखर जाती है और दबाव सह नहीं पाती.
इसकी सबसे सटीक मिसाल पाकिस्तान की क्रिकेट टीम से मिलती है. जैसे ही मैच में उनके शुरुआती दो खिलाड़ी आउट होते हैं, पूरी टीम ताश के पत्तों की तरह ढह जाती है. यही कमजोरी पाकिस्तानी फौज के डीएनए में शामिल है. चाहे 1971 की जंग हो, कारगिल की लड़ाई हो या फिर बलूचिस्तान का मोर्चा, जरा सा दबाव बढ़ते ही ये सेना मैदान छोड़कर भाग खड़ी होती है.
2026 का खूनी आंकड़ा: बलूचिस्तान बना 700 से ज्यादा सैनिकों की कब्रगाह
साल 2026 पाकिस्तानी सेना के लिए बलूचिस्तान में बेहद खूनी और दर्दनाक साबित हो रहा है. BLA के हमलों में रोजाना औसतन तीन पाकिस्तानी सैनिक अपनी जान गंवा रहे हैं. 2026 के महीने-वार आंकड़े इस खौफनाक हकीकत की गवाही दे रहे हैं.
- जनवरी: 86 सैनिक मारे गए
- फरवरी: 28 सैनिक मारे गए
- मार्च: 80 सैनिक मारे गए
- अप्रैल: 66 सैनिक मारे गए
- मई: 105 सैनिक मारे गए
- जून: 88 सैनिक मारे गए
- जुलाई: 127 सैनिक मारे गए
- अगस्त: 50 से ज्यादा सैनिक मारे गए (अंतिम आंकड़े आने बाकी हैं)
जनवरी से लेकर अगस्त-सितंबर 2026 तक का कुल हिसाब लगाएं तो अब तक 700 से ज्यादा पाकिस्तानी फौजी और रेंजर्स बलूचिस्तान की लड़ाई में ढेर हो चुके हैं. लेकिन इतनी बड़ी संख्या में मौतें होने के बावजूद रावलपिंडी में बैठे जनरलों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है.
जनरल आसिम मुनीर की बेरुखी और मंत्रियों की मौज-मस्ती
पाकिस्तान के पूर्व सैन्य अधिकारी मेजर आदिल राजा ने हाल ही में खुलासा किया था कि पूर्व आर्मी चीफ कमर जावोद बाजवा में भले ही सौ बुराइयां रही हों, लेकिन जब भी कोई सैनिक मारा जाता था, तो वो कम से कम उसके घर जाकर उसके परिवार से मिलते थे. लेकिन मौजूदा सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर पूरी तरह बेपरवाह हैं. उनके अंदर अपने सैनिकों के प्रति सम्मान या हमदर्दी का नामो-निशान नहीं है. उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि बलूचिस्तान में कितने जवानों की लाशें बिछ रही हैं.
वही हाल देश के गृह मंत्री मोहसिन नकवी का है. जिनकी मुख्य जिम्मेदारी देश की अंदरूनी सुरक्षा संभालने की है, वो कभी दुबई में क्रिकेट मैच का मजा ले रहे होते हैं, तो कभी तेहरान और अन्य देशों के दौरों में बिजी रहते हैं. एक तरफ बलूचिस्तान में जवानों के शव लावारिस पड़े सड़ रहे हैं और दूसरी तरफ देश के हुक्मरान विदेशों में बैठकर सौदेबाजी और सियासत चमकाने में लगे हैं.
निहत्थी महिलाओं पर शेखी और BLA के सामने भीगी बिल्ली
जनरल आसिम मुनीर की सैन्य ट्रेनिंग पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. वो किसी बैटलफील्ड एक्शन या अग्रिम मोर्चे की जंग से निकलकर शीर्ष पद तक नहीं पहुंचे हैं, बल्कि कागजी कार्रवाई और स्टाफ ऑफिसर्स वाली ट्रेनिंग से आए हैं. यही वजह है कि उनमें उस फौजी ऑनर की भारी कमी है, जो एक सच्चे कमांडर में होनी चाहिए.
आसिम मुनीर की पूरी ‘मर्दानगी’ और ताकत सिर्फ निहत्थे नागरिकों पर निकलती है. वो पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की तीन बुजुर्ग और निहत्थी बहनों, अलीमा खान, नोरीन नियाजी और डॉ उजमा खान. को गिरफ्तार करवाकर दुनिया को दिखाते हैं कि वो कितने बड़े ‘टाइगर’ हैं. लेकिन जब BLA के सशस्त्र लड़ाकों का सामना होता है, तो उनकी पूरी फौज दुम दबा लेती है. BLA के लड़ाके भी मानते हैं कि अगर पाकिस्तानी फौज आकर अपने मारे गए जवानों के शवों को मांगना चाहे, तो वो उन्हें नहीं रोकेंगे. लेकिन पाकिस्तानी फौज में इतनी हिम्मत भी नहीं बची है कि वह अपने जवानों की पार्थिव देह वापस मांग सके.
भारतीय सेना की दरियादिली और पाकिस्तान का घटियापन
पाकिस्तानी सेना के इस शर्मनाक रवैये की तुलना अगर भारतीय सेना से करें, तो दोनों के संस्कारों में जमीन-आसमान का अंतर दिखता है. भारत ने हमेशा युद्ध के मैदान में भी दुश्मन का सम्मान किया है. 1971 के युद्ध में जब पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों ने सरेंडर किया था, तो भारतीय सेना ने उन्हें तीन साल तक अपने पास रखा, इज्जत से खाना खिलाया और पूरे सम्मान के साथ वापस भेजा था.
दूसरी तरफ पाकिस्तानी फौज न तो अपने देश की वर्दी की साख बचा पाती है और न ही अपने जवानों की कुर्बानों की कद्र करती है. पाकिस्तान में लोग दबी जुबान में मजाक उड़ाते हैं कि उनके फील्ड मार्शल साहब शाम 8 बजे के बाद ‘पटियाला पैग’ में ऐसे खो जाते हैं कि फिर उन्हें देश और फौज की कोई फिक्र ही नहीं रहती.
बलूचिस्तान की गर्म रेत में सड़ती हुई पाकिस्तानी सैनिकों की लाशें इस बात का सबूत हैं कि पाकिस्तान की फौज अंदर से पूरी तरह खोखली हो चुकी है. रावलपिंडी के एसी कमरों में बैठकर अपनी जेबें भरने वाले जनरलों को अपने ही देश के गरीब जवानों की जान की कोई कीमत नहीं मालूम. अगर पाकिस्तानी सेना ने अपनी ये ‘चूहानीति’ और रवैया नहीं बदला, तो बलूचिस्तान की ये आग आने वाले दिनों में पाकिस्तान के वजूद को ही जलाकर राख कर देगी.