गुरु नानक देव जीवन के अंतिम दिनों में करतारपुर क्यों चले गए? दाह संस्कार हुआ या दफनाए गए, फूल का किस्सा

गुरु नानक देव जीवन के अंतिम दिनों में करतारपुर क्यों चले गए? दाह संस्कार हुआ या दफनाए गए, फूल का किस्सा


Guru Nanak Dev Ji: सिखों के लिए आज का दिन मायने रखता है. इस दिन ही सिख धर्म के संस्थापक और पहले गुरु नानक देव जी का निधन हुआ था. इसको अनुयायी ज्योति जोत में समा जाना कहते हैं. वह साल 1539 में 22 सितंबर की तारीख थी. यानी कि आज 2026 की इस तारीख से 487 साल पहले की यह बात है. उन्हें बाबा नानक, नानकशाह और नानक देव जी जैसे कई नामों से जाना जाता है. उनकी पहचान है कि वह एक महान दार्शनिक, समाज सुधारक, योगी और कवि थे जिन्होंने समाज में फैली कुरीतियों को दूर करके मानवता का रास्ता दिखलाया. हालांकि सवाल है कि वह अपने जीवन के अंतिम दिनों में करतारपुर क्यों चले गए, जो आज के पाकिस्तान में स्थित है? जहां सिखों के पहुंचने के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच एक कॉरिडोर भी बना है. उनके निधन पर हिंदुओं और मुस्लिमों में विवाद क्यों हो गया था? यह विवाद दाह संस्कार और दफनाए जाने को लेकर था. इसका समाधान फूल से कैसे हुआ था?

अपने अंतिम दिनों में करतारपुर क्यों गए?
गुरु नानक देव जी जन्म राय भोई की तलवंडी यानी आज के ननकाना साहिब में हुआ था. अपने जीवन के अंतिम कुछ साल उन्होंने करतारपुर में गुजारे. वह किसी मजबूरी में नहीं गए थे, बल्कि उन्होंने खुद ही इस नगर को बसाया था और अपनी उदासियों यानी धार्मिक यात्राओं को पूरा करने के बाद इसे अपना आध्यात्मिक गढ़ बनाया था.

गुरु नानक देव जी ने दुनिया को सिखाया कि ईश्वर को पाने के लिए संसार या परिवार का त्याग करना जरूरी नहीं है. अपनी 24 सालों की लंबी यात्राओं यानी उदासी को पूरा करने के बाद उन्होंने अपने यात्रा के वस्त्र त्याग दिए और एक साधारण गृहस्थ तथा किसान की वेशभूषा अपनाई. वे यहां अपने परिवार पत्नी और बेटों के साथ रहने लगे. गुरु जी केवल उपदेश देने में विश्वास नहीं रखते थे, बल्कि उसे खुद करके दिखाते भी थे.

करतारपुर में उन्होंने खुद अपने हाथों से खेतों में खेती की और अनाज उगाया. इसके जरिए उन्होंने संदेश दिया कि ईमानदारी से मेहनत करके कमाना और जीवन यापन करना ही सच्ची आध्यात्मिकता है. पहले सिख समुदाय और ‘संगत-पंगत’ की स्थापना की. गुरु जी एक ऐसे समाज की नींव रखना चाहते थे, जहां कोई जाति-पाति या ऊंच-नीच का भेद ना हो.

करतारपुर में उन्होंने संगत और पंगत की व्यवस्था को पूरी तरह से स्थापित किया. इसमें संगत यानी एक साथ मिलकर ईश्वर का नाम जपना और पंगत यानी एक ही पंक्ति में बैठकर लंगर छकने की व्यवस्था को पूरी तरह स्थापित किया. यहां राजा-रंक, हिंदू-मुसलमान सब एक समान थे.

उन्होंने करतारपुर में ही अपने उत्तराधिकारी का चयन किया. अपने सिद्धांतों और गद्दी को आगे बढ़ाने के लिए शिष्य लहना सिंह को परीक्षा के बाद चुना. उनका नाम गुरु अंगद देव जी रखा, जो सिखों के दूसरे गुरु कहलाए. जब देश बाहरी आक्रमणों और आंतरिक सामाजिक कुरीतियों से जूझ रहा था, तब उन्होंने रावी नदी के किनारे करतारपुर में ही शांत और पवित्र स्थल को चुना, जिससे लोग शांति से प्रभु भक्ति में रम सकें.

हिंदू-मुस्लिमों में कैसा विवाद?
गुरु नानक देव जी के ज्योति ज्योत समाने यानी संसार त्यागने को लेकर एक ऐतिहासिक घटना भी जुड़ी हुई है. दरअसल अंतिम समय में उनके हिंदू, सिख और मुस्लिम अनुयायियों के बीच विवाद खड़ा हो गया. हिंदू और सिख श्रद्धालु चाहते थे कि गुरु जी का उनके हिंदू संस्कारों के अनुसार दाह-संस्कार किया जाए. वहीं मुस्लिम श्रद्धालु उन्हें अपना पीर मानते थे और चाहते थे कि उन्हें दफनाया जाए. इस मामले में तनाव बढ़ता देखकर गुरु ने गजब की युक्ति निकाली.

गुरु नानक देव ने दोनों पक्षों से ताजे फूल लाने को कहा. उन्होंने हिंदुओं और सिखों से कहा कि वे उनके दाहिने तरफ फूल रखें, और मुसलमानों से कहा कि वे उनके बायीं ओर फूल रखें. उन्होंने एक शर्त रखी कि वे रातभर चादर ओढ़कर विश्राम करेंगे. सुबह होने पर, जिस पक्ष के फूल बिल्कुल ताजे और खिले हुए रहेंगे, वही पक्ष उनके पार्थिव शरीर को लेकर अंतिम फैसला करेगा.

फूल का किस्सा क्या है?
प्रचलित लोक कथाओं के अनुसार पूरी संगत रातभर डर और उत्सुकता के साथ गुरु जी के शरीर के पास बैठी प्रार्थना करती रही. हर कोई यह देखने का इंतजार कर रहा था कि किसके फूल ताजे बचेंगे. अगली सुबह जब दोनों पक्षों ने मिलकर गुरु जी के शरीर से सफेद चादर को हटाया, तो नजारा देखकर सब हैरान रह गए. चादर के नीचे गुरु नानक देव जी का पार्थिव शरीर गायब था. वहां केवल एक अलौकिक सुगंध ही बची थी. गुरु जी के शरीर के स्थान पर केवल ताजे, महकते हुए फूल पड़े थे. दाहिनी और बाईं दोनों तरफ के फूल पूरी तरह से ताजे और खिले हुए थे, मानो उन्हें अभी-अभी तोड़ा गया हो.

क्या समाधान निकला?
इस चमत्कार को देखकर हिंदू और मुसलमान दोनों ही रो पड़े और समझ गए कि गुरु नानक देव जी सीमाओं और मजहबों से परे थे. वे अपने उस उपदेश को सच कए गए, जिसमें ‘ना कोई हिंदू, ना कोई मुसलमान’ की बातें थीं. दोनों पक्षों ने आपस में कोई विवाद किए बिना उन फूलों और उस पवित्र सफेद चादर को आधा-आधा बांट लिया.

हिंदुओं और सिखों ने अपने हिस्से के फूलों और चादर का करतारपुर में रावी नदी के किनारे दाह-संस्कार किया और एक हिंदू समाधि अंगीठा साहिब बनाई. वहीं, मुसलमानों ने अपने हिस्से के फूलों और चादर को पूरी श्रद्धा से दफनाकर एक मजार बनाई. पाकिस्तान के गुरुद्वारा दरबार साहिब करतारपुर परिसर में यह अनोखा नजारा देखा जा सकता है, जहां गुरु नानक देव जी की याद में बनी समाधि और मजार दोनों एक ही परिसर में अगल-बगल स्थित हैं.



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