अब अगले साल होंगे राधारानी के दर्शन, कपाट बंद होते समय रो पड़े भक्त, जानें विदिशा के राधिका कुंज की महिमा

अब अगले साल होंगे राधारानी के दर्शन, कपाट बंद होते समय रो पड़े भक्त, जानें विदिशा के राधिका कुंज की महिमा


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Vidisha Radhika Kunj: मध्य प्रदेश के विदिशा स्थित राधिका कुंज के प्राचीन राधारानी मंदिर के पट राधा अष्टमी पर साल में सिर्फ एक दिन के लिए खोले गए. श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से दर्शन किए. इसके बाद 338 साल पुरानी परंपरा के अनुसार मंदिर के पट अगले एक साल के लिए फिर बंद कर दिए गए हैं. इस भक्त भावुक हो उठे…

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कपाट बंद होने से पहले भावुक हो गए भक्त.

Vidisha News: मध्य प्रदेश के विदिशा स्थित राधिका कुंज के प्राचीन राधारानी मंदिर में राधा अष्टमी का पावन पर्व बड़े ही धूमधाम और भक्तिभाव के साथ मनाया गया. इस विशेष अवसर पर मंदिर परिसर में दिनभर भक्तिमय माहौल बना रहा. राधारानी के पावन दर्शन करने के लिए सुबह से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा.

मंदिर परिसर में चारों तरफ भक्ति के जयकारे गूंज रहे थे. दर्शन करने आए श्रद्धालु राधारानी की भक्ति में लीन और भाव-विभोर नजर आए. लेकिन, जैसे ही दिनभर दर्शन के बाद रात को 12 बजे मंदिर के कपाट बंद होने लगे, भक्त भावुक हो गए. क्योंकि, अब राधारानी के दर्शन एक साल बाद अगली राधाष्टमी पर्व को होंगे.

साल में केवल एक दिन खुलते हैं पट
विदिशा के इस विशाल राधारानी मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह साल में सिर्फ एक दिन ही खुलता है. इस एक दिन यहां दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है. दिनभर चले दर्शन-पूजन के बाद खुशियों के बीच एक भावुक पल भी आया. राधारानी के पावन पट को एक वर्ष की अवधि के लिए बंद कर दिया गया. इस दौरान वहां मौजूद हर श्रद्धालु की आंखें नम हो गईं. अब इस मंदिर के पट अगली राधा अष्टमी पर ही आम भक्तों के दर्शन के लिए खोले जाएंगे.

338 साल पुराना मंदिर का इतिहास
यह प्राचीन मंदिर सिर्फ श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र नहीं है. यह मंदिर अपने आप में करीब 338 साल पुरानी एक ऐतिहासिक लोकगाथा को समेटे हुए है. प्रचलित लोकगाथा के अनुसार, मुगल आक्रमण के दौर में राधाजी की निधियों को बचाने का प्रयास किया गया था. उस समय भक्तों ने इन निधियों को वृंदावन से विदिशा तक सुरक्षित पहुंचाया था. स्वामी परिवार के सदस्य आक्रमणकारियों से बचाने के लिए राधाजी की मूर्ति और सप्त सखी मंडल सहित अन्य पवित्र निधियों को लेकर वृंदावन से विदिशा पहुंचे थे.

किले के बाहर झोपड़ी में स्थापित की गई थीं निधियां
मंदिर के पुजारी के अनुसार, करीब 338 वर्ष पहले स्वामी परिवार के सदस्य राधाजी की इन निधियों को लेकर विदिशा आए थे. उस समय उन्होंने सुरक्षा की दृष्टि से विदिशा किले के बाहर एक निर्जन स्थान चुना. वहां एक छोटी सी झोपड़ी बनाकर इन पवित्र निधियों को स्थापित किया गया था।

मुगल दौर से चली आ रही गुप्त पूजा की परंपरा
उस दौर में मुगल आक्रमण का भारी भय रहता था. इसी भय के कारण यहां सार्वजनिक रूप से पूजा-अर्चना नहीं की जाती थी. आम श्रद्धालुओं के लिए वर्ष में केवल एक दिन यानी राधा अष्टमी पर ही दर्शन के पट खोले जाते थे. वहीं, शेष पूरे वर्ष स्वामी परिवार की ओर से गुप्त रूप से ही पूजा-अर्चना की जाती थी. समय बदला और हालात भी बदल गए. लेकिन, सैकड़ों सालों पुरानी यह अनूठी परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ कायम है. आज भी साल में सिर्फ एक दिन राधा अष्टमी पर ही राधारानी के पट खुलते हैं.



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