बंगाल SIR का सच: हफ्ते में सातों दिन काम हुए, फिर भी 12 साल लग जाएंगे 37 लाख केस का फैसला आने में

बंगाल SIR का सच: हफ्ते में सातों दिन काम हुए, फिर भी 12 साल लग जाएंगे 37 लाख केस का फैसला आने में


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पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के SIR के तहत बाहर किए गए लाखों नागरिकों की किस्मत अब अदालती फाइलों के लंबे इंतजार में उलझकर रह गई है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित अपीलीय ट्रिब्यूनल जिस बेहद सुस्त गति से काम कर रहे हैं, उसे देखते हुए इन वोटरों के दावों पर अंतिम मुहर लगने में 12 साल से ज्यादा का वक्त लग सकता है.

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पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान बाहर किए गए लाखों मतदाताओं के सिर पर अब एक दशक से ज्यादा समय तक अपने मताधिकार से वंचित रहने का खतरा मंडरा रहा है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित अपीलीय ट्रिब्यूनलों की मौजूदा सुस्त रफ्तार को देखें तो इन लोगों के नामों पर अंतिम फैसला आने में करीब 12 साल से भी अधिक का समय लग जाएगा. चुनाव आयोग द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल ताजा हलफनामे से सामने आए आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं.

हलफनामे के मुताबिक, अप्रैल के मध्य से काम शुरू करने के बाद से पिछले पांच महीनों में ट्रिब्यूनल केवल 1,26,194 अर्जियों का ही निपटारा कर पाए हैं. यदि शनिवार और रविवार जैसे छुट्टियों के दिनों को भी काम के दिनों में शामिल कर लिया जाए, तो भी महीने में औसतन महज 25,238 मामलों की ही सुनवाई हो पा रही है. वहीं 16 सितंबर तक ट्रिब्यूनल के पास पेंडिंग मुकदमों की कुल संख्या 37,05,235 तक पहुंच चुकी है.

आंकड़ों में समझें इंसाफ की कछुआ चाल
अगर ट्रिब्यूनल हफ्ते के सातों दिन बिना किसी छुट्टी के लगातार काम करते रहें, तब भी पेंडिंग 37 लाख से ज्यादा मामलों को पूरी तरह निपटाने में करीब 146 महीने यानी 12 साल 2 महीने का लंबा वक्त लग जाएगा. इसका सीधा मतलब यह है कि जिन अनगिनत नागरिकों के नाम मतदाता सूची से काटे गए हैं, वे कई आगामी लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय चुनावों में वोट डालने के बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार से लंबे समय तक महरूम रह सकते हैं. चुनाव आयोग के इन आंकड़ों ने अब चुनावी प्रक्रिया और नागरिकों के अधिकारों की बहाली की रफ्तार पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.



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