100% एटेंडेंस के साथ खाना भी फिर कैसे कुपोषित रहे मासूम? बच्चों की मौतों का मलेरिया और कुपोषण बना कारण

100% एटेंडेंस के साथ खाना भी फिर कैसे कुपोषित रहे मासूम? बच्चों की मौतों का मलेरिया और कुपोषण बना कारण


बालाघाट. मध्य प्रदेश के बालाघाट के बिरसा ब्लॉक से 33 से ज्यादा बैगा बच्चों की मौत का मामला अब भी गरमाया हुआ है. ऐसे में इसकी चर्चा बालाघाट की घाटियों से निकलकर दिल्ली तक पहुंची है. ऐसे में इन दिनों महानगरों के कथित इंफ्लूएंसर को बालाघाट में कंटेंट वायरल कंटेंट दिख रहा है. लेकिन इन सब के इतर लोकल 18 की टीम उन गांवों में हुई बच्चों के मौतों के तथ्यों को खोज रही है.

प्रशासन की रिपोर्ट की मानें तो उन इलाके में हर साल मलेरिया फैलता है. लेकिन इस साल विभाग की लापरवाही ने सरकारी दावों की पोल खोल दी. दूसरी तरफ मीजल्स का आउट ब्रेक हुआ, जिससे की बच्चे प्रभावित हुए. मौतों के पीछे यह एक वजह तो बताई गई. लेकिन कुपोषण भी एक बड़ी वजह थी, जिससे बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता में कई आई और रोग और भी घातक हो गए. देखिए लोकल 18 ने कई दिनों तक दस्तावेजों का अध्ययन किया और अफसरों से चर्चा की. जानिए लोकल 18 की पड़ताल में क्या सामने आया.

अब जानिए कुपोषण के वर्तमान आंकड़ों में
हाल ही में अगस्त 2026 तक के कुपोषण के आंकड़े सामने आए है. इसके मुताबिक, बालाघाट में एक लाख 21 हजार 892 बच्चों का परीक्षण करवाया गया था. इसमें 27 हजार 839 बच्चों कुपोषित पाए गए है. इसमें भी 3741 बच्चे अति कुपोषित की श्रेणी में शामिल है. ऐसे में बालाघाट जिले का लगभग हर चौथा बच्चा कुपोषित है. वहीं, दूसरी तरफ जिस इलाके में महामारी फैली है वहां स्थिति और भी गंभीर है. दरअसल, बैहर विधानसभा में 1111 बच्चे अति कुपोषित है. इसमें बैहर ब्लॉक में 560 और बिरसा में 551 बच्चे अति कुपोषित है. यानी की प्रभावित क्षेत्र से ही बालाघाट जिले के 29.69 प्रतिशत मामले उसी इलाके से आते हैं. 2025 के विधानसभा सत्र के दौरान प्रस्तुत आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में लगभग 1.36 लाख कुपोषित बच्चे थे, जिनमें लगभग 29,830 बच्चे गंभीर कुपोषण से पीड़ित थे.

इधर, क्षेत्रीय विधायक संजय उइके ने जो आंकड़े मीडिया के सामने जारी किए वह कुछ और ही कहते हैं. उन्होंने एक महीने पहले के आंकड़े जारी किए. इसमें जुलाई 2026 तक 1 लाख 15 हजार 828 बच्चों की जांच हुई, जिसमें उम्र के हिसाब से कम ऊंचाई के बच्चों की संख्या 34 हजार 976 यानी 31 प्रतिशत. वहीं, अंडरवेट 26640 यानी 23 प्रतिशत है. वहीं, जिनकी ऊंचाई तो है लेकिन वजन नहीं उनकी संख्या 9 हजार 266 यानी 8 प्रतिशत है.

इतनी योजनाएं तो कुपोषण क्यों
सरकार ने कुपोषण जैसी गंभीर बीमारियों से निपटने के लिए कई योजनाएं चला रही है. ऐसे में सरकार इतनी योजनाएं चला रही है, तो बच्चे कुपोषण का कैसे शिकार हो रहे हैं. यहीं, समझने के लिए लोकल 18 ने सरकारी दफ्तरों से लेकर उन गांवों तक चक्कर लगाए. इसमें क्या निकलकर आया समझिए.

टेक होम राशन ही हुआ बंद
क्षेत्रीय विधायक संजय उइके ने कैग रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहते कि मार्च के महीने से ही टेक होम राशन बंद हो चुका है. वहीं, इससे पहले भी जो टीएचआर यानी टेक होम राशन आ रहा था, उसमें पोषक तत्व ही नहीं थे. ऐसे में बैगा आंचल में बुनियादी खाने की व्यवस्था नहीं थी. वहां पर बिना पोषण वाला टीएचआर सिर्फ पेट भरने लायक ही था. बाद यह पूरी तरह बंद भी हो गया. हालांकि, बोंदारी गांव की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता प्यारी यादव का कहना है कि मई के महीने से स्व सहायता समूह की मदद से यह दलिया के पैकेट बांटे जा रहे हैं.

पोषण ट्रैकर में आंकड़ों का बड़ा खेल!
अधिकारी हवाला देते हैं कि माता-पिता बच्चों को आंगनवाड़ी भेजने के बजाय खेतों और जंगलों में ले जाते हैं. उन्हीं इलाकों में पोषण ट्रैकर शत-प्रतिशत अटेंडेंस बताई जा रही है. जिले में कुपोषण के खिलाफ चल रहे सक्षम आंगनवाड़ी एवं पोषण अभियान 2.0 की जमीनी हकीकत और सरकारी पोर्टल पर दर्ज आंकड़ों के बीच बड़ा अंतर सामने आया है. इसमें सबसे बड़ा सवाल बच्चों की दैनिक उपस्थिति, नाश्ता और गर्म पका भोजन( हॉट कूक मील) बांटने में दर्ज 100 प्रतिशत आंकड़ों को लेकर है. सितंबर-अक्टूबर 2025 में बच्चों की दैनिक हाजिरी 100 प्रतिशत है. इसका हैरान करने वाली यह है कि 5 सितंबर 2025 को मिलाद-उन-नबी/ईद-ए-मिलाद के सरकारी छुट्टी के दिन भी कुछ आंगनबाड़ी केंद्रों पर 100 प्रतिशत बच्चों की उपस्थिति, नाश्ता और गर्म पका भोजन वितरण दर्ज होने का उल्लेख किया गया है.

सुपरवाइजरों पर अवैध वसूली का आरोप
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सुपरवाइजर परियोजना अधिकारी के नाम पर तीन सौ रुपए की वसूली कर रहे हैं. इसकी शिकायत हाल ही में की गई है. ऐसे में सवाल उठता है कि बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए सरकार करोड़ों का बजट पास करते हैं और अफसर महज तीन सौ रुपए के लिए आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को परेशान करते हैं. ऐसे में अफसरों की मंशा भी जाहिर होती है, जो अफसर अपने वर्कर्स से पैसा ले सकते हैं वह सरकारी योजनाओं में सेंधमारी कैसे नहीं कर सकते.

जानकर भी अनजान रहा सिस्टम
जिन इलाकों में महामारी फैली है, उन इलाकों में बच्चे गंभीर रूप से कुपोषण से जूझ रहे थे. ऐसे में सवाल यह उठता है कि सिस्टम जानकर भी अनजान रहा. दरअसल, नक्सल प्रभावित इलाके में सीआरपीएफ, हॉक फोर्स और जिला पुलिस बल भी तैनात है. ऐसे में वह लगातार जिला प्रशासन को सूचित करता था कि वहां पर इस तरह की स्थिति बनी हुई है. इसका साफ उदाहरण हॉक डीएसपी संतोष पटेल है, जो अपनी रील से सिस्टम को सच्चाई भी दिखाते थे.

अधिकारी बोले-देखेंगे और मंत्री की चुप्पी
इस मामले में लोकल 18 बालाघाट महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारी देंवेंद्र कुमार सुंदरीयाल से बात की. उनका कहना है कि वह इस मामले में देखेंगे. वहीं, जनजातीय कार्य मंत्री कुंवर विजय शाह ने सवाल सुनना तक पसंद नहीं किया है. ऐसे में मामले की गंभीरता में अफसरों और नेताओं की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं.

पूर्व परियोजना अधिकारी पर कार्रवाई
बालाघाट महिला एवं बालविकास विभाग की परियोजना अधिकारी दीपमाला सोलंकी पर विभागीय कार्रवाई का भी मामला सामने आया है. वह फिलहाल निलंबित है. हालांकि, वह मामला कुछ और है, जिसमें उन अधिकारी पर कार्रवाई हुई है. अपने काम में देरी की वजह से उन पर निलंबन की कार्रवाई की गई है.

मुसीबत आई तो गांव पहुंच रहा अमला
33 से ज्यादा बैगा बच्चों की मौत के बाद प्रशासन को होश आया है. अब वह दावा कर रहा है कि घर-घर जाकर बच्चों को खाना खिलाया जा रहा है. साथ ही स्वास्थ्य और राजस्व का अमला उन इलाकों में डटा हुआ है. हालांकि, फिलहाल स्थिति सामान्य है लेकिन जरा सी लापरवाही फिर से भयानक रूप ले सकती है.



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