नई दिल्ली. देश के सबसे प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक व्यावसायिक घरानों में से एक टाटा समूह (Tata Group) के भीतर जारी कानूनी विवाद ने नया मोड़ ले लिया है. इस हाईप्रोफाइल मामले में टाटा ट्रस्ट्स (Tata Trusts) की ओर से अदालत में पक्ष देश के जाने-माने वकील और कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी रखेंगे. वहीं, टाटा संस की तरफ देश के एक और नामी वकील हरीश साल्वे रखेंगे. सिंघवी इस केस में लीड एडवोकेट यानी मुख्य वकील की भूमिका में हैं. टाटा ट्रस्ट्स के मुख्य वकील की हैसियत से सिंघवी ने कहा, ‘टाटा समूह की ऐतिहासिक विरासत, रतन टाटा के योगदान और ट्रस्ट के भीतर उपजे मतभेदों पर अपना पक्ष बेहद भावुक और कानूनी दृष्टिकोण से रखा. टाटा विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान न होना दुखद.’
टाटा समूह और रतन टाटा के साथ अपने पुराने संबंधों को याद करते हुए अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि दोनों पक्षों के प्रमुख व्यक्तियों के साथ उनके व्यक्तिगत और गहरे संबंध रहे हैं. सिंघवी ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ‘टाटा ग्रुप और रतन टाटा की विरासत से वाकिफ होने के नाते मेरी पहली प्रतिक्रिया बेहद दुख की है कि इस विवाद को आपसी सहमति से क्यों नहीं सुलझाया जा सका. लेकिन अब, चूंकि मुझे एक पक्ष का नेतृत्व करने के लिए पेशेवर रूप से नियुक्त किया गया है, तो मुझे यह कहना होगा कि शेयरधारकों के मौलिक अधिकारों को इस तरह से खत्म नहीं किया जा सकता. अगर शेयरधारक के अधिकारों को दबाया जाएगा, तो यह लाखों कंपनियों के लिए एक विनाशकारी मिसाल बन जाएगा.’
टाटा ग्रुप में विवाद बढ़ता जा रहा है.
टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस में क्या है विवाद?
टाटा समूह के भीतर टाटा ट्रस्ट्स (Tata Trusts) और टाटा संस (Tata Sons) के बीच लंबे समय से प्रशासनिक मतभेद चल रहे हैं, जो अब कानूनी जंग का रूप ले चुके हैं. यह मामला मुख्य रूप से गवर्नेस, ट्रस्टियों के अधिकार, शेयरहोल्डिंग और नियामक हस्तक्षेप से जुड़ा हुआ है. हाल ही में वरिष्ठ अधिवक्ता और कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी को टाटा ट्रस्ट्स की ओर से अदालत में कानूनी नेतृत्व के लिए नियुक्त किया गया है, जिसके बाद इस विवाद ने और जोर पकड़ लिया है.
टाटा ट्रस्ट्स में क्या मुख्य विवाद हैं?
विवाद के पीछे कई कानूनी, रणनीतिक और प्रशासनिक कारण हैं. टाटा संस जो टाटा समूह की मुख्य होल्डिंग कंपनी है में लगभग 66% हिस्सेदारी ‘टाटा ट्रस्ट्स’ के पास है. ऐतिहासिक रूप से टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस के प्रमुख फैसलों में निर्णायक भूमिका रही है. विवाद इस बात को लेकर है कि ट्रस्ट के नियंत्रण और वीटो पावर को किस हद तक सीमित या लागू किया जा सकता है. लेकिन विवाद तब और गहरा गया जब चैरिटी कमिश्नर ने टाटा ट्रस्ट्स के आंतरिक निर्णय लेने के अधिकारों पर अचानक कुछ प्रशासनिक शर्तें और प्रतिबंध लगा दिए. टाटा ट्रस्ट्स का मानना है कि यह हस्तक्षेप ट्रस्ट के आंतरिक कामकाज और उसके 100 साल पुराने ढांचे को नुकसान पहुंचाता है.
टाटा सन्स और टाटा ट्रस्ट में कौन किसका मालिक है. एन. चंद्रशेखरन और नोएल टाटा. फाइल फोटो- रायटर
ट्रस्ट के भीतर सर्वसम्मति और वीटो पावर का मुद्दा
ट्रस्ट के नियमों के अनुसार, कई बड़े फैसलों के लिए ट्रस्टियों के बीच सर्वसम्मति या विशेष वीटो प्रावधानों का पालन करना अनिवार्य होता है. आरोप है कि कुछ प्रशासनिक प्रक्रियाओं में इन नियमों को नजरअंदाज किया जा रहा है. कानूनी विशेषज्ञों और टाटा ट्रस्ट्स के वकीलों का तर्क है कि मुख्य शेयरधारक के रूप में टाटा ट्रस्ट्स के बुनियादी अधिकारों को दबाया नहीं जा सकता, क्योंकि इससे कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. यह विवाद आपसी बातचीत के बजाय अदालती चौखट तक पहुंचने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
1- दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से विवाद सुलझाने की कोशिशें नाकाम रहीं. जब आंतरिक बातचीत और मध्यस्थता के रास्ते बंद हो गए, तो कानूनी लड़ाई ही एकमात्र विकल्प बचा.
2- चैरिटी कमिश्नर द्वारा ट्रस्ट के कामकाज पर लगाए गए प्रतिबंधों को कानूनी रूप से अनुचित माना गया, जिसे अदालत में चुनौती देना जरूरी हो गया.
चैरिटी कमिश्नर के फैसले, 100 साल पुराने रिश्ते पर सवाल
सिंघवी ने चैरिटी कमिश्नर द्वारा ट्रस्ट के आंतरिक फैसलों पर लगाए गए प्रतिबंधों को ‘रहस्यमयी और गलत’ करार दिया. उन्होंने टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच सदी पुराने संबंधों पर जोर देते हुए कहा, ‘दोनों में 100 साल पुराना अटूट रिश्ता है. टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच 100 से अधिक वर्षों से चले आ रहे ऐतिहासिक और संवैधानिक रिश्ते को अचानक अलग करने की कोशिश अकल्पनीय है. यह ट्रस्ट के भीतर सर्वसम्मति और वीटो पावर जैसे पूर्व निर्धारित प्रावधानों की अनदेखी करना पूरी तरह से अनुचित है.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र
सिंघवी ने ऐतिहासिक ‘टाटा बनाम मिस्त्री’ में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को याद दिलाया जिसमें उन्होंने खुद पैरवी की थी. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से टाटा संस के साथ संबंधों में टाटा ट्रस्ट्स की प्रधानता को स्वीकार किया था, जिसे अब चुनिंदा तरीके से भुलाया जा रहा है. शेयरधारकों के मूल अधिकारों को दबाना कॉर्पोरेट जगत के लिए बेहद खतरनाक मिसाल है. अचानक और अजीब तरीके से ट्रस्ट के फैसलों पर रोक लगाना कानूनी रूप से गलत है. जब सौहार्द और आपसी तालमेल खत्म हो जाता है, तो केवल अदालतें ही अंतिम समाधान निकाल सकती हैं.
अभिषेक मनु सिंघवी के इस कड़े कानूनी रुख और टाटा ट्रस्ट्स का नेतृत्व संभालने के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि टाटा समूह का यह अंदरूनी विवाद आने वाले दिनों में देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट पर एक बड़ी और ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई का रूप लेने जा रहा है. यह विवाद टाटा ट्रस्ट्स के शेयरहोल्डर अधिकारों की सुरक्षा, चैरिटी कमिश्नर के हस्तक्षेप के विरोध और टाटा संस में ट्रस्ट की ऐतिहासिक प्रधानता को बनाए रखने की कानूनी जंग है. आपसी समन्वय न बन पाने के कारण अब देश की अदालतें ही इस बात का फैसला करेंगी कि टाटा समूह के प्रशासनिक ढांचे का भविष्य क्या होगा.