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Balaghat News: बालाघाट में वर्ष 1860 में जर्मन मिशनरी जॉर्ज प्लेब्स्ट द्वारा शुरू किया गया प्रसिद्ध मेंगलोरी कवेलू उद्योग अब खत्म होने की कगार पर है. कभी 44 से ज्यादा फैक्ट्रियों और 20,000 से अधिक प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार देने वाला यह उद्योग कंक्रीट के मकानों के बढ़ते चलन और घटती मांग के कारण वीरान हो चुका है
Balaghat News: बालाघाट जिले को अक्सर लोग नक्सलवाद के नाम से याद करते हैं. हालांकि, नक्सलवाद का कलंक अब बालाघाट के माथे से मिट चुका है. खूबसूरत जंगलों और पहाड़ों से घिरा यह जिला अपनी एक खास औद्योगिक पहचान के लिए भी जाना जाता रहा है. यह पहचान है यहां का ऐतिहासिक कवेलू (टाइल्स) उद्योग. ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाने वाला यह उद्योग आज बंद होने की कगार पर पहुँच गया है.
1860 में पड़ी थी उद्योग की नींव
बालाघाट में कवेलू उद्योग की शुरुआत वर्ष 1860 में हुई थी. उस समय यहाँ जर्मन ईसाई मिशनरियों का प्रवेश हुआ था. मिशनरी जॉर्ज प्लेब्स्ट ने यहां मेंगलोरी कवेलू बनाने की पहली फैक्ट्री शुरू की थी. यहां बने कवेलू अपनी मजबूती और बेहतरीन फिनिश के लिए बहुत प्रसिद्ध थे. एक दौर था जब जिस घर पर ये कवेलू लगे होते थे, उसे गांव के एलिट क्लास यानी पटेल का मकान माना जाता था.
आजादी के बाद 44 से ज्यादा फैक्ट्रियां खुलीं
आजादी के बाद इस उद्योग में जबरदस्त उछाल देखने को मिला. वर्ष 1970 के बाद बालाघाट के पास स्थित गर्रा, नवेगांव और सरेखा जैसे गांवों में कवेलू की फैक्ट्रियां स्थापित होने लगीं. देखते ही देखते क्षेत्र में 44 से ज्यादा फैक्ट्रियां शुरू हो गईं. इन फैक्ट्रियों से 20,000 से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता था. यहां के कवेलू मध्य प्रदेश के अलावा महाराष्ट्र, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों तक भेजे जाते थे.
दो सप्ताह में तैयार होती थी एक खेप
कवेलू बनाने की प्रक्रिया काफी मेहनत भरी होती थी. इसकी एक खेप तैयार करने में पूरा दो सप्ताह का समय लगता था. सबसे पहले मिट्टी को आटे की तरह गूंथा जाता था. फिर मशीन और सांचे के जरिए इसे आकार दिया जाता था. इसके बाद कवेलू को दो से तीन दिन तक छायादार जगह पर सुखाया जाता था. नमी सूखने के बाद धूप दिखाई जाती थी और अंत में इसे पकाकर तैयार किया जाता था.
कंक्रीट की छतों से खत्म हुई मांग
समय बदलने के साथ आधुनिकता ने इस पारंपरिक उद्योग को पछाड़ दिया. अब लोग पक्के कंक्रीट की छत वाले मकान बनाने लगे हैं, जिससे कवेलू की दिलचस्पी और मांग खत्म हो गई है. फैक्ट्रियां अब धूल खा रही हैं. अब केवल शौकिया लोग ही कवेलू खरीदने आते हैं. फैक्ट्री मालिकों का कहना है कि अब न तो मुनाफा बचा है और न ही मांग, जिससे फैक्ट्रियों का रखरखाव करना मुश्किल हो गया है.
मजदूरों का पलायन और भविष्य की चिंता
कवेलू फैक्ट्री एसोसिएशन के सदस्य जयेश पटेल के अनुसार, बालाघाट की आधी से ज्यादा फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं और बाकी बंद होने की कगार पर हैं. रोजगार छिनने के कारण स्थानीय मजदूर कमाई के लिए सैकड़ों मील दूर जाने को मजबूर हैं. जयेश पटेल का कहना है कि आत्मनिर्भरता की बात करने वाली सरकार को नए उद्योगों के साथ-साथ इन पुराने पारंपरिक उद्योगों को बचाने पर भी ध्यान देना चाहिए.