kunda Triple Murder Case: उत्तर प्रदेश में प्रतापगढ़ जिले का कुंडा इलाका हमेशा से राजा भैया की वजह से चर्चा में रहा है. साल 2013 की ठंडी आबोहवा में 2 मार्च की एक शाम को बलीपुर गांव में जो खौफनाक तांडव हुआ, उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था. एक जमीन के विवाद से शुरू हुई चिंगारी ने देखते ही देखते दोहरे हत्याकांड और फिर तत्कालीन सर्किल ऑफसर (CO) जियाउल हक की निर्मम हत्या का रूप ले लिया था. इस बहुचर्चित तिहरे हत्याकांड ने सूबे की सियासत में भूचाल ला दिया था, जिसमें बाहुबली नेता और तत्कालीन मंत्री रघुराज प्रताप सिंह उर्फ ‘राजा भैया’ का नाम भी उछला था. 13 साल तक चले इस कानूनी लड़ाई में विशेष सीबीआई कोर्ट ने राजा भैया को क्लीन चीट दे दी है.
ये घटना 2 मार्च 2013 की शाम करीब 7:30 बजे हुई थी. प्रतापगढ़ जिले के कुंडा कोतवाली क्षेत्र के बलीपुर गांव में जमीन के एक पुराने विवाद ने अचानक उग्र रूप ले लिया. इस विवाद के चलते बलीपुर गांव के प्रधान नन्हें यादव को अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया.
प्रधान के हत्या के बाद गरमाया मामला
प्रधान नन्हें यादव की हत्या की खबर जैसे ही गांव और आसपास के इलाकों में फैली, उनके समर्थकों का गुस्सा फूट पड़ा. आक्रोशित भीड़ तुरंत बलीपुर गांव पहुंची और आरोपी पक्ष के घरों को घेरकर आग के हवाले कर दिया. गांव में बड़े पैमाने पर हिंसा और भारी भीड़ के जमा होने की सूचना मिलते ही तत्कालीन कुंडा सीओ जियाउल हक अपनी पुलिस फोर्स के साथ तुरंत मौके पर रवाना हो गए. पुलिस अधिकारी का मकसद किसी तरह हालात को काबू में करना और दोनों पक्षों को शांत कराना था.
सीओ जियाउल हक की हत्या और…
बलीपुर गांव का माहौल उस वक्त पूरी तरह नियंत्रण से बाहर हो चुका था. आक्रोशित और हिंसक भीड़ ने मौके पर पहुंची पुलिस टीम को ही चारों तरफ से घेर लिया. भीड़ को खदेड़ने और स्थिति को काबू में करने के दौरान पुलिस और उपद्रवियों के बीच भारी झड़प हो गई. इसी दौरान चली गोली से प्रधान नन्हें यादव के भाई सुरेश यादव की भी गोली लगने से मौत हो गई.
सुरेश यादव की मौत के बाद भीड़ का गुस्सा इस कदर भड़का कि उन्होंने कानून-व्यवस्था की सारी सीमाएं तोड़ दीं. बेकाबू भीड़ ने सीओ जियाउल हक को घेरकर पहले उनकी बेरहमी से पिटाई की और फिर गोली मारकर उनकी निर्मम हत्या कर दी. एक ही शाम में एक प्रधान, उसके भाई और एक पुलिस सर्किल ऑफिसर की हत्या से पूरे उत्तर प्रदेश की पुलिस व्यवस्था और प्रशासन में हड़कंप मच गया.
इस तिहरे हत्याकांड के बाद कानून-व्यवस्था की स्थिति को संभालते हुए पुलिस ने कुल चार अलग-अलग एफआईआर दर्ज कीं. इस खूनी संघर्ष की आंच लखनऊ की सत्ता तक पहुंच गई, जिसके बाद तत्कालीन राज्य सरकार ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी विवेचना स्थानीय पुलिस से लेकर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दी.
राजा भैया पर लगे आरोप और सीबीआई की जांच का दौर
हत्याकांड के अगले ही दिन, यानी 3 मार्च 2013 को शहीद सीओ जियाउल हक की पत्नी परवीन आजाद ने सामने आकर एक सनसनीखेज शिकायत दर्ज कराई. उन्होंने इस मामले में चौथी एफआईआर दर्ज कराते हुए तत्कालीन कद्दावर मंत्री और निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ ‘राजा भैया’ को भी मुख्य आरोपी के तौर पर नामजद कर दिया. इस नामजदगी के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत में भूचाल आ गया और राजा भैया को अपने मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा.
सीबीआई ने इस हाई-प्रोफाइल मामले की कमान संभालते हुए तमाम पहलुओं पर गहराई से छानबीन शुरू की. चूंकि चारों एफआईआर एक ही घटनाक्रम से जुड़ी थीं, इसलिए सीबीआई ने सभी रिपोर्ट और साक्ष्यों को एक साथ संकलित कर ट्रायल के लिए कोर्ट में एक साझा चार्जशीट दाखिल की. लंबी और गहन तफ्तीश के बाद सीबीआई ने अपनी जांच में पाया कि इस हत्याकांड में राजा भैया की संलिप्तता के ठोस सबूत नहीं मिले हैं, जिसके आधार पर केंद्रीय एजेंसी ने उन्हें क्लीन चिट दे दी.
प्रोटेस्ट याचिका और क्लोजर रिपोर्ट पर अदालती मुहर
सीबीआई ने राजा भैया के खिलाफ नामजद इस मामले में 31 जुलाई 2013 को ही पहली क्लोजर रिपोर्ट अदालत में पेश कर दी थी. लेकिन मृत सीओ की पत्नी और वादिनी परवीन आजाद ने इस क्लोजर रिपोर्ट का पुरजोर विरोध किया और कोर्ट में प्रोटेस्ट प्रार्थना पत्र दाखिल कर दिया. 8 जुलाई 2014 को फिर से केस खुला. दोबारा इसकी विवेचना कराने का आदेश दिया. सीबीआई ने अदालत के आदेश के पालन करते हुए एक बार फिर से साक्ष्यों को खंगाला गया. लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद 22 दिसंबर 2023 को सीबीआई ने अपनी दूसरी क्लोजर रिपोर्ट भी अदालत में दाखिल कर दी. अंततः, विशेष सीबीआई कोर्ट ने दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलें सुनने, पत्रावली पर मौजूद सभी तथ्यों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद सीबीआई की इस क्लोजर रिपोर्ट को पूरी तरह स्वीकार करने का आदेश पारित कर दिया.