Radha Ashtami Vrat Paran 2026: राधाष्टमी की मध्याह्न पूजा के बाद या अष्टमी तिथि समाप्त होने पर? जानें राधा अष्टमी व्रत पारण का सही समय और नियम

Radha Ashtami Vrat Paran 2026: राधाष्टमी की मध्याह्न पूजा के बाद या अष्टमी तिथि समाप्त होने पर? जानें राधा अष्टमी व्रत पारण का सही समय और नियम


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राधाष्टमी व्रत का पारण कब करना उत्तम और किन चीजों का ध्यान रखें, जानें नियम

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Radha Ashtami Vrat Paran 2026: राधाष्टमी व्रत का पारण कब और कैसे करें, यह जानना हर श्रद्धालु के लिए महत्वपूर्ण है. इस व्रत का पारण सही समय और नियमों के अनुसार करना ही उत्तम फलदायी होता है. इस लेख में हम जानेंगे कि राधा अष्टमी व्रत का पारण किस समय करना चाहिए और किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए, ताकि आपका व्रत सफल हो सके. सही विधि से पारण करने पर ही व्रत का पूर्ण पुण्य प्राप्त होता है.

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Radha Ashtami 2026 Vrat Paran: आज बरसाना समेत देशभर में धूमधाम से राधाष्टमी का पावन पर्व मनाया जा रहा है और बरसाने के लाड़लीजी मंदिर में सुबह से ही भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिल रही है. यह पर्व हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधा रानी के प्राकट्य उत्सव के रूप में मनाया जाता है. इस दिन श्रद्धालु श्रद्धा के साथ विधि विधान से राधा-कृष्ण की पूजा करते हैं और अपनी सामर्थ्य के अनुसार व्रत रखते हैं. जन्माष्टमी के व्रत का पारण तो मध्यरात्रि में पूजा-अर्चना के बाद किया जाता है तो ऐसे में आइए जानते हैं राधाष्टमी के व्रत का पारण कब करना चाहिए और इस व्रत के पारण में किन चीजों और नियमों का ध्यान रखना चाहिए…

राधाष्टमी व्रत का पारण कब करें?
राधाष्टमी व्रत के पारण को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों और संप्रदायों में कुछ अंतर देखने को मिलता है. कई धार्मिक परंपराओं में राधाष्टमी का व्रत पूरे दिन रखने के बाद अगले दिन नवमी तिथि में सूर्योदय के बाद पारण करने की परंपरा है. इस मान्यता के अनुसार इस साल 20 सितंबर 2026, रविवार को सुबह 6:08 बजे के बाद व्रत खोलना सबसे उत्तम रहेगा. हालांकि, कुछ परिवारों और वैष्णव परंपराओं में दोपहर की पूजा के बाद फलाहार या व्रत खोलने की अलग रीति भी प्रचलित है.

राधाष्टमी व्रत का पारण समय – रविवार, सुबह 6 बजकर 8 मिनट के बाद

पारण के समय किन बातों का रखें ध्यान?
पारण करने से पहले स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें. इसके बाद राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करें. भगवान को तुलसी दल डालकर सात्विक भोजन या फल-मिष्ठान का भोग लगाकर उसी प्रसाद से व्रत खोलने की परंपरा बताई गई है. धार्मिक विधि में अगले दिन पूजा के बाद भोजन करने और व्रत पूर्ण करने का उल्लेख मिलता है. पारण के दिन सात्विक भोजन करना शुभ माना जाता है. भोजन में प्याज-लहसुन आदि से परहेज रखने की परंपरा कई वैष्णव परिवारों में है. सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को अन्न, फल या अन्य वस्तुओं का दान भी किया जा सकता है.

राधाष्टमी मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं नमो भगवते राधाप्रियाय
मूल महामंत्र: ॐ ह्रीं श्रीराधायै स्वाहा
बीज मंत्र: ॐ ह्रीं श्रीं राधिकायै नमः
सरल मंत्र: ॐ श्री राधिकायै नमः
श्री राधा गायत्री मंत्र: ॐ ह्रीं श्रीराधिकायै विद्महे गान्धर्विकायै विधीमहि तन्नो राधा प्रचोदयात्

नोट: व्रत का पारण करने से पहले तुलसी की माला से 108 बार राधारानी के मंत्रों का जप अवश्य करें.

राधाष्टमी का महत्व
राधाष्टमी हिंदू धर्म में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व है. यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण की परम भक्त और उनकी शक्ति स्वरूपा मानी जाने वाली राधा रानी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है. ब्रजभूमि, बरसाना, वृंदावन और मथुरा में इस दिन भक्तों में विशेष उत्साह देखने को मिलता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, राधा रानी प्रेम, भक्ति, करुणा और समर्पण की प्रतीक हैं. कहा जाता है कि श्रीकृष्ण की भक्ति राधा के बिना अधूरी मानी जाती है. राधाष्टमी के दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं और राधा-कृष्ण की विधि-विधान से पूजा करते हैं. मंदिरों में विशेष श्रृंगार, भजन-कीर्तन और धार्मिक आयोजन किए जाते हैं.



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