Lucknow Hit & Run Case Opinion : कुछ रिश्ते टूटते हैं तो सिर्फ दिल नहीं टूटता, भरोसा भी टूट जाता है. लखनऊ के हिट एंड रन केस में अनामिका की कहानी कुछ ऐसी ही दिखाई देती है. वह कैमरे के सामने रोती है, अपने साथ हुए शोषण की बात करती है और सरकार से आरोपियों के खिलाफ बुलडोजर चलाने की मांग करती है. उसकी बातों में गुस्सा भी है, दर्द भी और शायद उस भरोसे के टूटने की टीस भी, जिसे उसने कभी अपना समझा था. पर इस मामले को सिर्फ एक तरफ से देखने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आएगी. शाहनवाज का साइड भी सुनना उतना ही जरूरी है. इस पूरे मामले में एक सवाल यह भी उठता है कि क्या किसी रिश्ते, दोस्ती या भरोसे में अपनी तरफ से बरती गई लापरवाही की भी कोई जिम्मेदारी बनती है?
इंस्टाग्राम पर अनामिका और शाहनवाज के कई ऐसे वीडियो हैं, जिसमें वह साफ कहती दिखाई दे रही है कि ये मेरा बॉयफ्रेंड है. मगर, अब कह रही है कि मुझे क्लब में मिला था. तब उसने मुझे अपना नाम आयुष ठाकुर बताया और साथ ही यह भी कहा कि आजमगढ़ से है. इतना ही नहीं कई और आरोप भी लगाए हैं. अनामिका के आरोप बहुत ही गंभीर हैं. अगर शाहनवाज ने अपनी पहचान छिपाकर रिश्ता बनाया, धमकाया, निजी वीडियो बनाए या उनका इस्तेमाल करके उसे प्रताड़ित किया, तो यह बहुत ही चिंताजनक बात है. जांच में जो भी आरोप सही साबित हों, उसके खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए.
क्या अनामिका ने जुटाई थी जानकारी?
पर सवाल यही है कि क्या अनामिका ने दोस्ती को आगे बढ़ाने से पहले शाहनवाज के बारे में कुछ जानकारी ली थी? यह सवाल किसी भी पीड़िता या अनामिका को कटघरे में खड़ा करने के लिए नहीं है. किसी भी महिला के साथ धोखा, हिंसा, धमकी या जबरदस्ती होती है तो उसकी जिम्मेदारी उसी व्यक्ति की है जिसने अपराध किया है. किसी की गलती या भरोसा किसी दूसरे को अपराध करने का अधिकार नहीं देता. अगर पीड़िता के अपने दावों के मुताबिक आरोपी ने अपनी पहचान छिपाई, लंबे समय तक उसे भ्रम में रखा और बाद में उसकी असली पहचान सामने आई, तो बस जहन में सवाल उठ जाता है कि रिश्ते में आगे बढ़ने से पहले पहचान और उसकी पृष्ठभूमि को लेकर कितनी सावधानी बरती गई?
पड़ताल करना भी जरूरी
सोशल मीडिया के दौर में जहां पहचान छिपाना आसान हो गया है, वहां भरोसा करने से पहले पड़ताल करना भी जरूरी है. अनामिका ने आरोप लगाया है कि उसके प्राइवेट वीडियो बनाए गए और उनका इस्तेमाल उसे बदनाम करने के लिए किया गया. अगर ये आरोप सही साबित होते हैं तो यह सरासर गंभीर क्राइम है. किसी महिला के सम्मान के साथ खिलवाड़ करना किसी भी हालत में जायज तो नहीं ठहराया जा सकता.
बुलडोजर एक्शन नहीं कानूनी न्याय जरूरी
मगर, बुलडोजर की मांग की बात की जाए तो गुस्से और पीड़ा में ऐसी मांग करना समझ में आता है, लेकिन न्याय का रास्ता बुलडोजर से नहीं, सबूत, जांच और अदालत के फैसले से तय होता है. अगर आरोप सच हैं तो आरोपियों पर कानून के तहत ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए जिससे पीड़िता को न्याय मिले और भविष्य में किसी और के साथ ऐसा करने की हिम्मत न हो.
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सबक शायद यही है कि रिश्ते में भरोसा जरूरी है, लेकिन आंख बंद करके भरोसा करना नहीं. हालांकि, अगर किसी के साथ धोखा हुआ है, तो उसे दोषी ठहराने के बजाय यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि कानून दोषी तक पहुंचे. अनामिका की बात सुनी जानी चाहिए तो शाहनवाज को भी सुना जाना चाहिए, मामले की सही जांच होनी चाहिए और जो भी दोषी साबित हो, उसके खिलाफ कानून के मुताबिक कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए.